दादू ग्रंथावली

 

 

 

 

 

 

संपादक

डॉ. बलदेव वंशी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशन संस्थान

नयी दिल्ली-110002

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

प्रकाशन संस्थान

4715/21, दयानन्द मार्ग, दरियागंज

नयी दिल्ली-110 002

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मूल्य : 500.00 रुपये

प्रथम संस्करण : सन् 2005

ISBN 81-7714-199-6

आवरण : जगमोहन सिंह रावत

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शब्द-संयोजन : कम्प्यूटेक सिस्टम, दिल्ली-110032

मुद्रक : बी. के. ऑफसेट, दिल्ली-110032

 

 

 

 

 

 

 

वर्तमान दादूपीठाचार्य

श्री गोपालदास जी महाराज को सादर समर्पित

 

 

 

 

 

 

 

 

दो शब्द

 

।। श्री दादू दयालवे नम:।।

 

दिनांक 11 मई, 2005

डॉ‑ श्री बलदेवजी वंशी,

महानिदेशक, अखिल भारतीय श्री दादू सेवक समाज,

नयी दिल्ली।

सादर सत्यराम!

हमें यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई कि श्री दादू ग्रंथावली का प्रकाशन किया जा रहा है। इस पुनीत कार्य के लिए आप सभी सज्जन जो इस कार्य से परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं, अभिनन्दनीय हैं।

आज का युग भौतिकता का युग है। इस भौतिक युग में काम, क्रोध, मद, लोभ आदि आसुरी तमोगुणों का सर्वत्रा प्राबल्य परिलक्षित हो रहा है एवं दैवी गुणों दया, करुणा, अहिंसा, प्रेम, सत्य आदि का तीव्र गति से क्षरण हो रहा है। परिणामस्वरूप भौतिक सुखों की मृगमरीचिका के पीछे दौड़ने के कारण मानव अपनी मानसिक शान्ति खोता जा रहा है। आज विश्व का वातावरण इतना प्रदूषित हो गया है कि जिससे सर्वत्रा अशान्ति, भय, विद्वेष एवं पारस्परिक संघर्ष का ऐसा जाल फैलता जा रहा है कि इससे निस्तार का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता।

विज्ञान की विनाशकारी एवं संहारक उपलब्धियों ने विश्व को विनाश के उस अन्तिम छोर तक पहुँचा दिया है जहाँ मानवता अश्रुपात करती हुई दिखाई दे रही है। आज मानव दानव हो गया है। मानवता विलुप्त होती जा रही है। आज पाशविक शक्तियों का ताण्डव नृत्य सर्वत्रा दिखाई दे रहा है। ऐसे अशान्त एवं भयंकर वातावरण में भयाक्रान्त मानवता के परित्रााण का एक ही उपाय है-त्यागी-तपस्वी सन्त-महात्माओं की वाणी का निरन्तर स्वाध्याय एवं अनुशीलन। सन्तों एवं शास्त्राों ने मानव मन की आत्मिक शान्ति के लिए दो ही स्थानों का प्रतिपादन किया है-आर्ष ग्रन्थों, रामायण एवं श्रीमद्भगवद्गीता तथा सन्तों की अनुभव वाणी। हमारे आर्ष ग्रन्थ यथा श्रीमद्भगवद् गीता की गूढ़ रहस्यात्मकता सर्वसाधारण मनुष्य के लिए बोधगम्य नहीं है। ऐसी स्थिति में रामायण, भगवद्गीता आदि ग्रन्थों के गूढ़ रहस्यों के अपने अनुभवों को सीधी-सरल एवं सुबोध भाषा में प्रकट करने वाले सन्तों की अमृतमयी वाणी ही इस भयावह विपत्तिा से निस्तार पाने का एकमात्रा उपाय है। सन्तों की वाणी का अवलम्बन प्राप्त कर जीवनयापन वाले मानव, मानसिक शान्ति प्राप्त कर सकते हैं। सन्त कबीर, रविदास, नामदेव, नानक, सूर, तुलसी, मीरा आदि महान् भक्त सन्तों की वाणी से करोड़ों लोगों ने शान्ति प्राप्त की है और अनेक लोग उस दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। इसी शृंखला में निरंजन निराकार ब्रह्म के परमोपासक ब्रह्मर्षि श्री दादू दयाल जी महाराज की अनुभव वाणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि-

भौतिक सुखों की प्राप्ति से ही मानव मन को आत्मिक शान्ति नहीं मिलेगी जब तक हम आध्यात्मिकता का आश्रय ग्रहण नहीं करेंगे। सबसे बड़ा धर्म मानवता एवं परोपकार है। मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं। सभी सन्त एवं सद्ग्रन्थ एक स्वर से उद्धोषणा करते हैं कि-

1. अष्टादस पुराणेषु व्यास्य वचनम् द्वय।

परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीडनम्॥ -वेद व्यास

2. हरि भज साफिल जीवना परोपकार समाय।

दादू मरणा तहाँ भला जहँ पशु पंखी खाय।। -दादू दयाल

3. निर्बल को ना सताइये, जाकी मोटी आह।

मरे बैल की चाम से, लौह भस्म हो जाए॥ -कबीर

मानव-मानव एवं प्राणीमात्रा के आत्मकल्याण, सद्भावना एवं भवसागर से जीवन नैया को पार लगाने वाली कतिपय साखियों के माध्यम से सन्तप्रवर दादू दयाल दिग्भ्रमित मानव का मार्गदर्शन करते हैं-

1. तन मन निर्मल आतमा, सब काहू की होय।

दादू विषय विकार की बात न बूझे कोय॥

2. आतम भाई जीव सब, एक पेट परिवार।

दादू मूल बिचारिये, दूजा कौन गँवार॥

3. राम नाम निज औषधी, काटहि कोटि विकार।

विषम व्याधि से ऊबरे, काया कंचर सार॥

अंत में हम श्री दादू ग्रंथावली पुस्तक प्रकाशन के सद्कार्य के लिए अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ एवं आशीर्वाद प्रेषित करते हुए हमारे परमोपास्य इष्टदेव श्री दादू दयाल महाराज एवं मेरे गुरुदेव एवं पूर्वाचार्य श्री श्री 1008 श्री हरिरामजी महाराज का पुण्य स्मरण करते हुए आपके इस सद्कार्य सफलता के लिए इन महान् सन्तों से आत्मनिवेदन करता हूँ। आशा है यह ग्रन्थ न केवल विद्वानों एवं मनीषियों के लिए अपितु दादू समाज, दादू सेवक वर्ग तथा मानव मात्रा के आत्मकल्याण की दृष्टि से अनुपम ग्रन्थ सिध्द होगा।

पुनश्च एक बार आप सभी बन्धुओं आप परिजनों के सुख-शान्ति, सुस्वास्थ्य, यश, वैभव एवं शान्ति की मंगलकामना करते हुए मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ। हरि तत् सत्! हरि तत् सत्!! हरि तत सत्!!!

-वर्तमान पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 महंत गोपालदास जी महाराज

 

 

 

 

 

 

भूमिका

 

 

भारतीय अध्यात्म, इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त ज्ञान-अनुभव नहीं है। यह सीधा, इन्द्रियातीत अनुभव है, जिसे स्वानुभूति कह सकते हैं। इसमें ज्ञान प्राप्त करने की सारी प्रक्रिया निष्काम-अनप्रयुक्त रह जाती है। परम तत्तव की तथा परमज्ञान की इस प्रक्रिया में वस्तुपरकता का अतिक्रमण होता है। भारतीय अध्यात्म अनुभव पराऐन्द्रिक धरातल पर घटित होता है, जबकि पश्चिमोन्मुख आधुनिक सोच, प्रकृति-विज्ञान या मानव-ज्ञानार्जित अनुभव प्रणालियों के धरातल से प्राय: आगे नहीं बढ़ता। भारतीय सन्तों ने अपनी 'अनुभव वाणी' को ऐन्द्रिक अनुभवों के आधार पर अर्जित नहीं किया अपितु पराऐन्द्रिकता के धरातल पर स्वानुभूति के रूप में उपलब्ध कियाहै।

कुछ आधुनिक चिन्तकों-विद्वानों का मानना है कि चरम सत्य की प्राप्ति, जो कि बुध्दि की पहुँच से बाहर है, यह अतीत की उस समय की अवधारणा है, जब बौध्दिक विकास की वर्तमान जैसी, विकसित वैज्ञानिक तर्कनायुक्त सोच उपलब्ध नहीं थी। किन्तु वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि वैज्ञानिक सोच की, भौतिक, वैचारिक सोच की बुलन्दियों, भारतीय चिन्तन-दर्शन पहले ही, पिछले गये युगों में पार कर आया था। और परा-लोक की, चिन्तन के सर्वोच्च शिखरों की मानवीय क्षमताओं की ध्वजाएँ वैदिक युग में ही फहरा दी गयी थीं। जहाँ ओम् और गायत्राी के जाप की सिध्दियाँ ब्रह्माण्डीय ज्ञान, खगोलीय गणनाओं और देशकाल की संवेदनीय चरम उपलब्धियों के चिद्द स्थापित हैं, वहाँ तक का सारा विज्ञान वर्तमान के लिए आधार-प्रस्थान-उड़ान का मंच बना है। साथ ही भव-भाव- भावना- सम्भावना का महासूत्रा आज भी दिशासूचक की भाँति मार्ग दिखा रहा है। समूचा जल तत्तव, जिस अनुपात में धरती में विद्यमान है, उसी अनुपात में मनुष्य की देह में भी है, जिसकी केन्द्रीय धुरी मनुष्य का हृदय-स्थल है। इसी स्थल पर धमक होने पर भव-से भाव जगते हैं। रस-सिध्दान्त भी और अनुभव जगत् भी इसी से सम्बध्द है। अत: सन्तों की वाणी इसी अनुभव का सुफल है। इसी से भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य में मूल अन्तर भी है-भारतीय काव्य हृदयोदभूत है-भावानुप्रेरित है और पाश्चात्य काव्य बौध्दिकता-वैचारिकता प्रसूत है।

सन्त का पूरा जीवन ही एक लम्बी प्रार्थना होती है। वह स्वयं के देखे को, आत्मसाक्षात्कार एवं अनुभव को ही प्रमाण मानता है। यह अनुभूति ही परम-आत्मा है। 'पुहुप बास ते पातरा' (कबीर) है परमात्मा का रूप। इस सूक्ष्म, ब्रह्माण्ड में जल-तत्तव की भाँति पूरित, ब्रह्मचेतना को स्वयं देखता भी है और सबको दिखाता भी है। उसका मार्ग अति कठिन है। दुर्गम ही नहीं, अगम है। सन्त बड़ी दुर्ध्दर्ष चेतना के दु:साहसी, विपरीत धारा के तैराक होते हैं। युगों की अन्धकार-काराओं को अन्तर के प्रकाश से आलोकित करने वाले प्रकाश-स्तम्भ हैं। मरजीवड़े हैं। मृत्यु के मुख से अमरता की मणि को जबरन निकालकर अपनी शिरोमण्0श्निा बना लेते हैं। अत: वे क्रान्ति नहीं, क्रान्ति को अति-क्रान्त करके संक्रान्ति लाते हैं। जीवन-जगत् के बाहरी (भौतिक) स्तरों पर घटित होने वाले परिवर्तन क्रान्ति कहलाते हैं, तो देह-मन-आत्मा (चेतना) के स्तरों पर होने वाले महापरिवर्तन संक्रान्ति कहलाते हैं। सार्वभौम कल्याणी, लाखों वर्षों की अथक चेतना-यात्राा में उपलब्ध संवेदनीय ज्ञान (वैदिक चेतना) के बोध-मंच पर खड़े होकर पुन: जागृति-समता-ममता लाने के प्रयास रहे हैं मध्ययुगीन सन्तों के, जो मात्रा भौतिकता, तमिा की अन्धी नींद में सोये हुए मानव को झकझोरकर पुन: जगाना चाहते हैं। मानव-अस्तित्व के तीनों स्तरों पर संक्रान्ति का आह्नान कर रहे हैं। क्योंकि मनुष्य को ही, इस जगत् में तीन जीवन स्तर-तीन अस्तित्व उपलब्ध हैं। इसी आशय से ओंकार भी भीतर-बाहर तीनों को झंकृत करता है। दादू का कथन है-

जाग रे सब रैन बिहाणी, जाए जनम अंजलि का पाणि।
घड़ि-घड़ि घड़ियाल बजावे, जे दिन जादू सो बहुरि न आवै॥

दादू मानव-जागरण के लिए सीधे ही उद्बोधन कर रहे हैं। मनुष्य सभ्यता के इतिहास की रात बीत चुकी है। जीवन-जन्म ऐसे रीत रहा है जैसे ऍंजुरी में से सहेजा हुआ जल रिस-रिसकर रीत जाता है। किन्तु ऐ भले मानुष तू किस पुरातन भ्रम में आज भी मन्दिर में घण्टे-घड़ियाल बजा-बजाकर सोए हुए भगवान को जगा रहा है और स्वयं तमिा की, भौतिकता-जड़ता की नींद में डूबा-सोया हुआ है। जबकि परम-आत्मा तुम्हारी अपनी ही देह में स्थित है, जिसे तुम अपने से बाहर मानकर तरह-तरह से पूजते फिर रहे हो। और उस अन्तर्यामी परमात्मा की आरती एवं पूजादि भी अपनी देह के भीतर ही करनी चाहिए। हमारा सतगुरु भी हमारे भीतर ही है उसकी पूजा-अर्चना भी भीतर ही सम्भव है। इस तथ्य को, सत्य को कोई-कोई विरला व्यक्ति ही समझता है, जो जागृत है-

पूजण हारे पास है, देही माहै देवं।

दादू ताकूं छाड़ि करि, बाहरि मांडी सेवं॥

दादू माहैं कीजै आरती, माहैं पूजा होइ

माहै सतगुर सेविए, बूझै बिरला कोई॥

यह तथ्य भी हम भारतीयों ने आज भुला दिया है कि चार युगों की अवधारणा भी कालान्तराल में ही नहीं बोध-स्तरों पर समझकर मनुष्य-जाति अपना और विश्व-परिवेश का उध्दार कर सकती है-

कलि श्यानों भवति संजिहानस्तु द्वापर:।
उतिष्ठंस्त्रोता भवति कृतं संपद्यते चरन॥
चरैवेति। चरैवेति।

-(ऐतरेय ब्राह्मण)

अर्थात् कलयुग का अर्थ है सोए होना। जग जाना द्वापर है। उठकर खड़े हो जाना त्रोता है। और चल देना कृतयुग-सतयुग है। अत: व्यक्ति, देश जाति को जागृत होकर चलते रहना चाहिए। मनुष्य का सृष्टि के साथ सम्बन्ध और सरोकार इससे अधिक सटीक अर्थों में और कैसे सम्भव हो सकता है-

हरि भज साफल जीवणा, पर उपकार समाए।
दादू मरणा तहां भला, जहां पशु पक्षी खए॥

जीने की सार्थकता-सफलता हरि के भजन और परोपकार-भाव में समाहित हो जाने में है। पर मात्रा इतना ही नहीं; इससे भी आगे जीवण तभी सफल-सार्थक माना जा सकता है जबकि मनुष्य की मृतक-देह भी-शव भी, काम का सिध्द हो। उस मृतक-देह को भी पशु-पक्षी खाकर अपनी भूख शान्त कर सकें। भूख की अग्नि भी बड़ा सत्य है। इसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। बल्कि सन्तों और अध्यात्म-पुरुषों ने जठराग्नि अर्थात् पेट की आग को इसलिए महत्तवपूर्ण माना क्योंकि भूख का यथार्थ, किसी भी काल में, किसी भी देश या जाति का आधारभूत यथार्थ होता है। अपवादों को, महानता के-सिध्दि के आयामों को छोड़कर यथार्थ, सामान्य जीवन का यही सत्य है। तो उसी यथार्थ को दादू यहाँ हमारे सामने रखते हुए कहते हैं कि पशु-पक्षियों तक के काम यदि हमारा शव आता है-तो वही मरना भला है। सार्थक है।

मृत्यु यदि बड़ा यथार्थ है तो जीवन, अस्तित्व उससे भी बड़ा यथार्थ है। सन्त दादू दयाल ने इस अस्तित्व की रक्षा, सँभाल और धरती पर विचरते सभी जीवों के सतत प्रवह को कायम रखने के चिन्तन को तथा मानव के भाई-भाई होने के सद् विचार को आगे बढ़ाया है। उनका प्रसिध्द कथन है-

आपा मेटे हरि भजै तन मन तजै विकार।
निर्वैरी सब जीव सूं, दादू यहु मत सार॥

सब जीवों से निर्वैरता अर्थात् मैत्राीभाव रखना भी उनके सिध्दान्तों की नींव है। आपा अर्थात् अहंकारभाव और तन तथा मन के विकारों को दूर करना ही पर्याप्त नहीं है, जीव-मात्रा के प्रति शत्राुभाव का त्याग करके मैत्राी और स्नेह भाव धारण करने की सीख दादू दयाल ने दी है। यही कारण है कि धर्म-पूजा पध्दति की स्थूलर्-मूत्ता परिपाटियों को उन्होंने त्याग दिया और निराकार, सार्वभौम, अणु-अणु में व्याप्त, निर्गुण ब्रह्म, अल्लाह, ईश्वर की सर्वव्यापकता का सन्देश दिया। इससे प्र्रभावित होकर उनके अनुयायियों की संख्या तेजी से बढ़ी। उनमें हिन्दू और मुसलमान-दोनों सम्प्रदायों के लोग थे। सभी प्रान्तों, वर्गों के लोगों को शान्ति, प्रेम और भाईचारे में अपार भरोसे और आनन्द की अनुभूति हुई। यह तथ्य सर्वविदित है कि उनके शिष्यों में स्वामी रज्जब (पठान, मुसलमान), स्वामी बखना (मुसलमान), स्वामी निजामशाह (मुसलमान) ही नहीं हुए अपितु स्वामी गरीबदास (दायमा, ब्राह्मण), स्वामी सुन्दरदास (बड़े, क्षत्रिाय), स्वामी सुन्दरदास (छोटे, खंडेलवाल, वैश्य), स्वामी जगन्नाथ (कायस्थ), स्वामी प्रागजन (चर्मकार, पीपावंशी), स्वामी जयमल जोगी (कूरम, क्षत्रिाय) आदि बावन शिष्यों की लम्बी सूची यही सिध्द करती है कि सन्त दादू ने सभी प्रकार की संकीर्णताओं (जातिगत, साम्प्रदायिक) को मानव-समाज में से मिटाने का सफल अभियान चला रखा था जो अपनी यथार्थवादी प्रकृति के कारण सचमुच क्रान्तिकारी था।

यह महज कहने की बात नहीं, प्रत्युत सन्त दादू जी के जीवन का महान सत्य और सन्देश है, जिसे उन्होंने अपने कर्म से-व्यवहार और आचरण से, सिध्द कर दिखाया। विचार को कर्म में परिणत करने की दूरी, समाज की सबसे बड़ी विडम्बना रही है। और आज तो और भी उदग्र रूप से सामने आ रही है। विडम्बनाओं की सभी रूपाकृतियाँ इसी से विकसित होकर विकराल रूप धारण कर रही हैं। किन्तु सन्त दादू दयाल ने सदियों पूर्व भूख और यथार्थ के विकट-विकराल रूप को देखकर-'सर्वे भवंतु सुखिना' के सिध्दान्त-चिन्तन को, अपने कर्म का अमली जामा पहनाकर, व्यवहार में प्रस्तुत कर दिया।

भारतीय चिन्तन में ब्रह्माण्ड और पिण्ड को तात्तिवक उपस्थिति की दृष्टि से, समान बताया गया है-यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे एवं यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे। दादू की साखी में समूचे ब्रह्माण्ड को ब्रह्मजल से पूरित कहा गया है-

सरवर भरया दह दिसि, पंछी प्यासा जाइ।
दादू गुरु परसाद बिन, क्यों जल पीवै आइ॥

जल से भरे तालाब से ब्रह्माण्ड की उपमा दी है दादू ने, क्योंकि तालाब हमारा परिचित बिम्ब है। किन्तु वह तो चारों ओर से मिट्टी से घिरा रहता है और तल में भी मिट्टी का आधार होता है। अत: दादू को 'दहदिसि' शब्द का उपयोग करना पड़ा कि यह तालाब-समूचा ब्रह्माण्ड दसों दिशाओं से जलापूरित है। इसमें चन्द्र, सूर्य, नक्षत्रामण्डल तक समाए हुए हैं। अर्थात् यहाँ कुछ भी ब्रह्मरहित नहीं है। विभिन्न धातु पदार्थ भी ब्रह्मांश हैं। किन्तु मनुष्य जीव यहाँ, ब्रह्मापूरित जल में रहता हुआ भी प्यासा ही चला जाता है। गुरु की कृपा होने पर ही वह इस जल का, आनन्द का पान करके तृप्ति प्राप्त कर सकता है। अर्थ हुआ कि मनुष्य के बाहर और भीतर दोनों ओर ब्रह्म का अस्तित्व है, फिर भी वह प्यासा ही जाता है। दादू समूचे प्राणी जगत् को चर्म-चक्षुओं की दृष्टि से नहीं, आत्मदृष्टि से देखने का आग्रह करते हैं-

चर्मदृष्टि देखे बहुत, आतम दृष्टि एकि।
ब्रह्मदृष्टि परिचय भया, तब दादू बैठा देखि॥

इसलिए दादू पूर्ण ब्रह्म को, ब्रह्माण्ड को ध्यान में लाने की, विचारने की बात करते हैं। जब समूचे ब्रह्माण्ड को चैतन्य एक इकाई माना जाएगा, तब सभी प्रकार के-हिंसा, हत्या, अन्याय, संवेदनहीनता के क्रम थम जाएँगे। धरती और धरती का जीवन आज इसीलिए रक्तरंजित है, क्योंकि ओछी, स्वार्थी, जड़वादी दृष्टि के व्यक्तियों, समाजों, देशों के कारण धरती पर जनजीवन, प्रकृतिजीवन उत्पीड़ित, दुखित, शोषित है। भूखा है। बेहाल है। विस्थापित है। कहना न होगा कि पाश्चात्य दृष्टि भोगवादी, जड़वादी है। इस कारण आज विश्व में एकतरफष बर्बर, व्यापक हिंसा बरपाने वाले युध्द हैं, विश्व के पिछड़े देशों को लूटने वाली शोषक, खुली बाजशर व्यवस्था-बाज़ारवाद है। असन्तुलन है। इन सब महामारियों, लाचारियों, दुश्वारियों को मिटाने का उपाय दादू यों समझाते हैं-

पूरण ब्रह्म बिचारिए, तब सकल आत्मा एक।
काया के गुण देखिए, तौ नाना बरण अनेक॥

किन्तु आज हो रहा है नितान्त उलट। काया के रूप, रंग, जाति, वर्ण, वंश, देश, प्रदेश आदि के विभिन्न भेद के आधार पर महा-मारण, महा-विनाश के आदिम, पाश्विक नर-संहार बे-खौफ, बेरोक-टोक बरपाये जाते हैं और राष्ट्रसंघ निष्क्रिय, निष्प्राण-सा टुकुर-टुकुर देखता रहता है। विश्व की अग्रणी शक्तियाँ, घातक से अतिघातक अस्त्रा-शस्त्रों का प्रदर्शन, विश्व-मण्डियों में करके, उन्हें बेचकर अपने देशों की समृध्दि को बढ़ाती रहती हैं। राष्ट्रसंघ की दृष्टि भी, समूचे मानव-परिवार को, उसके परिवेश को एक इकाई न मानकर खण्डों में लेती, सोचती है। फिर खण्डों को और भी खण्डित करती है। कभी पर्यावरण-दिवस, कभी बाल-दिवस, कभी नारी, कभी वृध्द-दिवस। सब खंड-खंड! जबकि दादू का कथन है-

खंडि खंडि करि ब्रह्म कौं, पखि पखि लीया बाँटि।
दादू पूरण ब्रह्म तजि, बँधे भरम की गाँठि॥

अनेक प्रकार के भ्रमों, भ्रमों की अनेक परतीय मूर्खताओं, दुष्टताओं, दुर्नीतियों से धरती एवं ब्रह्माण्ड का सुख, शान्ति सब विनष्ट हो रहे हैं। तामसिकता तथा स्वार्थों का तिमिर बढ़ रहा है। इसे दूर करने के लिए बिजली के प्रयोग, उपयोग एवं लट्टू तो बढ़ रहे हैं किन्तु स्नेहपूर्ण-तेल और बाती वाले दिये त्याग दिये गये हैं, जबकि दिये से दिया और दियों की लम्बी शृंखला प्रदीप्त की जा सकती है, पर लूट्ट से लट्टू नहीं जलाया जा सकता। इसी प्रकार आत्मज्ञान विकसित करके आत्मवान व्यक्तियों-मनुष्यों की संख्या बढ़ाकर, चेतनाविहीनता के अन्धकार को मिटाया जा सकता है। तिमिर मिटाया जा सकता है। दादू का कहना है कि बिल्लौरी काँच का-स्फटिक का, पत्थर का सूर्य बनाकर अन्धकार दूर करने के प्रयासों से कोई लाभ नहीं होगा, उससे केवल प्रदर्शनी शोभा बढ़ाई जा सकती है। धरती पर से अन्धकार को मिटाने के लिए सच्चे, वास्तविक सूर्य की दरकार होती है-

सूरिज फटिक पषाण का, ता सूं तिमर न जाइ।
साचा सूरिज परगटै, दादू तिमर नसाइ॥

सच्चा सूरज तभी उदय होगा, जब सत्व गुण के विकास में, आत्म जागृत, निर्भीक, सच्चे पूरे सन्त लोग, शूरवीर सामने आयेंगे; सती नारियाँ, बीरबानियाँ सामने आयेंगी। सन्त दादू की दो साखियाँ उध्दृत करना समीचीन होगा-

सूरा पूरा संत जन, साईं को सेवै।

दादू साहिब कारणै, सिर अपना देवै॥

सूरा जूझै खेत में, साईं सन्मुख आइ।

सूरे कौं साईं मिलै, तब दादू काल न खाइ॥

सच्चे सूरज को उदय करने के लिए, अपने-अपने युग-तिमिर के विनाश के लिए सतयुग में ऋषियों-देवों को जूझना पड़ा, तो त्रोता में राम को, द्वापर में कृष्ण को, बुध्द और महावीर को। इसी भाँति कलयुग में, मध्ययुग में कबीर, रैदास, नानक, मीरा, दादू, मलूक, पीपा आदि सन्तों को लड़ना पड़ा है। पूर्व के क्षितिज ने सूर्य को उदय किया और समूची धरा पर उसके आलोक को फैलाकर आदिम समयों के तिमिर को हटाया था। किन्तु आज वही पूर्व-क्षितिज तिमिर-बाध्दित हो रहा है। यह सबसे दुखद संदर्भ है। समूचा पूर्व और भारत (भा+रत) आज तम में रत है। सुप्त है। इसे पुन: जगाकर बाज़ारवादी नयी विश्व-व्यवस्था को आध्यात्मिक विश्व-व्यवस्था में लाना होगा। अत: मात्रा क्रान्ति नहीं, वेद ज्ञान सम्बन्धित सन्तों की वाणी का प्रकाश-सूर्य लेकर संक्रान्ति को सम्भव बनाना होगा।

दादू वाणी अपने स्नेह, सहृदयता, दया, सरलता, सहजता, मिठास आदि गुणों के कारण सन्त-साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। इसमें सन्त कबीर की आक्रामकता, अक्खड़ता, व्यंग्य-वक्रता और चुनौती की धार नहीं, प्रत्युत उदार आत्मीयता, सुधार की अमित आशावादिता उसके मूल में है। दादू वाणी में आग नहीं ऊर्जा है। ताप-उत्तााप नहीं, स्नेहिलता-स्निग्धता है। हमदर्द सुझावधर्मी, कन्धे पर अपनेपन से हाथ रखकर बोलती हुई हितैषी वरिष्ठता साधुता है-

तन मन निर्मल आत्मा, सब काहू की होय।
दादू विषय विकार की, बात न बूझे कोय॥

भाषागत सम्प्रेषण, भागवत सादगी, सत्यवादी सरलता की ऐसी मिसाल कि निरक्षर भी संस्कारशीलता के प्रवाह में डुबकी लगाने-नहाने को उतावला हो कूद पड़े।

वर्तमान युग के व्यक्ति का जीवन पहले से भी अधिक कठिन होता गया है। दु:ख, कष्ट, क्लेश भी पहले की अपेक्षा अधिक एवं सालने वाले। सभी चाहते सुख हैं किन्तु दुर्दान्त दु:खों में घिरते जाते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि पहले की अपेक्षा अधिक लोग अधिकाधिक स्वार्थी, निर्दयी, भावनाहीन, संवेदनाशून्य, नास्तिक होते जा रहे हैं। दादू का कथन है कि कोई दु:खी ही दूसरे दु:खी व्यक्ति का दर्द समझ और दूर कर सकता है। अपने स्वार्थ और सुख की नींद में, विषयों में डूबा हुआ व्यक्ति नहीं समझ सकता-

दरदहि बूझै दरदवंद, जाके दिल होवै।
क्या जाणै दादू दरद की, जो नींद भरि सोवै॥

जिसके पास दिल ही नहीं है ऐसा हृदयहीन व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का दर्द कैसे जानसकता है? कहना न होगा कि आज का व्यक्ति अपने स्वार्थ में दूसरों को दु:ख देकर सुखीहोना चाहता है। भौतिकवादी सोच के कारण वह ईश्वर की भक्ति भी छोड़ बैठा है-

दादू भावहीन जे पिरथवी, दया बिहूणा देस।
भगती नहीं भगवंत की, तहं कैसा परवेस॥

जिस धरती पर, जिस देश में भावनाहीन लोग रहते हों, जहाँ दयाभाव न हो, परमात्मा की भक्ति भी कोई न करता हो वहाँ भूलकर भी नहीं जाना चाहिए। आत्महीन परमात्महीन होते गये लोगों ने निर्बाध क्रूरता, हिंसा, हत्या के वर्तावोंवश धरती के जीवन को एक वृहद् हत्या-स्थल में नहीं बदल दिया है क्या? भारत में ही हिन्दू-मुसलमान का वैर कितना रक्त बहा चुका है। कबीर की भाँति दादू भी स्वयं को न हिन्दू मानते हैं और न मुसलमान और न हिन्दुओं के षड्दर्शनों को स्वीकार करते हैं-

दादू न हम हिन्दू होहिंगे, ना हम मूसलमान।

षट दरसन में हम नहीं, हम राते रहिमान॥

दोनों भाई हाथ पग, दोनों भाई कान।

दोनों भाई नैन हैं, हिन्दू मुसलमान॥

उक्त दूसरी साखी में दादू ने हिन्दू-मुसलमान-दोनों को भारत देश के दो हाथ-पैर, दो कान और दो ऑंखें ही नहीं बताया, भाई भी कहा है। एक ही माता के पेट से उत्पन्न, एक ही परिवार के सदस्य हैं सब जीव जगत्, सारा प्राणी जगत् ही एक परम पिता की सन्तान हैं। ज़रा सोचकर देखने पर दूसरा कोई नहीं मिलेगा। दूरी कहीं है ही नहीं-

आतम भाई जीव सब, एक पेट परिवार।
दादू मूल विचारिये, तो दूजा को न गँवार॥

समूचा जगत् ही ब्रह्म-पिता द्वारा उत्पन्न है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे आदि। इस प्रकार धरती पर विद्यमान समूचे जगत् के प्रति मानवीय संवेदनाएँ जगाने का महत् प्रयत्न दादू जी का लक्ष्य रहा है। इन विचारों को ग्रहण करने से हिंसा, हत्या, आतंक सब छूट सकते हैं। सभी बाहरी पूजा-पध्दतियाँ, नमाज, रोजा, माला, तिलक, मन्दिर, मस्जिद के विभेदों को भुलाकर एक ही निर्गुण तत्तव का राम-नाम का उच्चारण, उसे चाहे राम कहो या रहीम, कृष्ण कहो या करीम-यही सत्य है-

एकै अक्षर पीव का, सोई सत करि जाणि।

राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परमाणि॥

दादू सिरजनहार के, केते नाम अनंत।

चित आवै सो लीजिये, यौं साधू सुमिरैं संत॥

अर्थात् परमात्मा के अनन्त नाम हैं, जो चाहे जिसे जपे। हाँ, इतना ध्यान रहे कि हमारा मन ही माला है, गुरु उपदेश ही तिलक है।

इक्कीसवीं शताब्दी में विश्व में जो अमानवीय, हत्यारी, आतंकी प्रवृत्तिायाँ खुलकर, बेखौफ नंगी नाच रही हैं, उनके रहते सर्वत्रा व्याप्त भय मानव जाति में एक अपूर्व रोग बनकर छाया हुआ है। सब भीतर ही भीतर त्रास्त हैं। यह वस्तुत: कलिकाल या दुश्काल है। तृतीय विश्व-युध्द की आशंकित आहटें विश्व के भिन्न-भिन्न देशों-प्रदेशों में घटित होने वाली दुर्घटनाओं, शीत-ऊष्ण टकराहटों में देखने को मिलती हैं। महाविनाश की परिकल्पनाएँ ही सबको रोके हुए हैं। ऐसे हिंसा-आप्लावित कलि-काल का उपचार भी दादू वाणी में उपलब्धा है-

काला मुँह करि काल का, साईं सदना सुकाल।
मेघ तुम्हारे घरि घणा, बरसुह दीन दयाल॥

अर्थात् काल (कलिकाल, दुष्काल) का मुँह काला करो-मानव समाज के इस शत्राु को अपमानित और तिरस्कृत करो तथा सुकाल (शान्ति-समृध्दिपूर्ण काल) के लिए सब मिलकर प्रभु से प्रार्थना करो, जिससे सुख, शान्ति, समता, मानवीयता की सघन वर्षा हो, क्योंकि ऐसे मेघ केवल परमात्मा, दीनदयाल प्रभु की कृपा से ही बरसतेहैं।

समूचे ब्रह्माण्ड की चिन्ताओं को सहेजे हुए, 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' की लोक-कल्याणी चेतना का विकास करने वाले मानवीय संवेदना का मूल-मन्त्रा प्रसारित करने वाले सन्त हैं दादू दयाल जी। आज के जलते-झुलसते, भीतर-बाहर ध्वस्त होते संसार को बचाने की ही उपचारी विधियाँ दादू जी की वाणी में आद्यन्त विद्यमान हैं। समूची दादू वाणी ही यों वेद वाणी की भाँति सुधा-वर्षिणी है। 'सरवर भरया दह दिसि' की चेतना एवं विश्व-कल्याण की भावना से भरकर कही गई दादू जी की यह साखी वर्तमान संकटग्रस्त मानवता का मार्ग प्रशस्त करे। सुख-शान्ति के बादल गरजें, बरसें, धरती को सराबोर करें-

वसुधा सब फूले फलै, पिथरी अनंत अपार।
गगन गरजि जल थल भरै, दादू जै जैकार॥

अत: दादू ग्रंथावली में संकलित समूची वाणी, दादू जी की अनुभूति की सहज-स्वभाव अभिव्यक्ति है। हृदय की आनन्दावस्था, प्रकृति की आन्तरिक नि:सर्ग प्रवृत्तिा का ही अभिन्न अंश होने के कारण सदैव आधादिनी है। अपने प्रभाव में शान्त, निर्मल एवं आनन्दफलदायिनी है। इन अर्थों में तथा भारतीय ऋषियों द्वारा अर्जित सहों वर्षों के ज्ञान-वेद की भाँति वेदवाणी है। दादूपन्थी आचार्यों का मत तथा हमारा अनुभव है कि जो वेद में है, वह दादू वाणी में है।

'दादू ग्रंथावली' में हमने 'श्री दादू अनुभव वाणी' का मुख्य आधार ग्रहण किया है, जिसका सम्पादन आचार्य प्रवर महाराज पन्थ के उन्नीसवें आचार्य श्री हरिराम जी ने किया था (प्रकाशक : श्री दादू जी सेवा समिति, श्री दादू मन्दिर, बड़ा गाँव, जिला झुंझुनू, राजस्थान, संस्करण, सं‑ 2053) आचार्यश्री 17 जुलाई, 2001 को ब्रह्मलीन हो गये। उन्हीं की प्रेरणा-प्रोत्साहन-स्नेहाशीश हमें इतना विपुल रूप में प्राप्त हुआ कि भीलवाड़ा में नये दादू मन्दिर भवन के लोकार्पण के अवसर पर हम उनकी इतनी आन्तरिकता का प्रसाद पा सके कि वहाँ के बिड़ला परिवारों के यहाँ जाते समय हमें सदैव साथ रखा। सम्मान दिलाया। वहाँ से नारायणा वापसी पर अपने वाहन में साथ लाये। ढाई-तीन घण्टे की यात्राा में अपने जीवन के कुछ अछूते संस्मरण सुनाये जिन्हें बाद में मेरे द्वारा सम्पादित पुस्तक, स्मरणांजलि में संकलित किया गया है। इस 'स्मरणांजलि' के प्रकाशन में तथा हमें आचार्यश्री से मिलवाने का सारा श्रेय अखिल भारतीय श्री दादू सेवक समाज के अध्यक्ष श्री अशोक बुवानीवाला को जाता है।

पाठकों-अध्येताओं की सहायतार्थ कठिन साखियों की बोधगम्यता के लिए कठिन पारिभाषिक शब्दों के अर्थ एवं पर्याय परिशिष्ट में दिये गये हैं। प्रयत्न रहा है कि जो अर्थ दादू सम्प्रदाय में मान्य हों, उन्हें ही लिया जाय। इस कारण
'
श्री दादू वाणी' वैद्य राम प्रकाश स्वामी जी द्वारा सम्पादित का भी सहयोग लिया गया है। स्वामी रामप्रकाश जी वैद्य का इस लेखक को वरदहस्त प्राप्त रहा है। उनके सम्पर्क में आने के सौभाग्य पर गर्व है। नारायणा के आयोजनों में तथा भीलवाड़ा में नये दादू द्वारा के आयोजन के समय आचार्य हरिराम जी तथा वैद्य जी के साथ मन्त्राासीन होने के क्षणों को अपने किन्हीं अलक्षित सुकृत्यों का फल मानता हूँ।

श्री दादू वाणी 'अनभेवाणी' भी कहलाती है, जिन अर्थों में दोहा छन्द 'साखी' कहलाती है। आत्म और जगत् के सम्मिलित अनुभव इसमें समाहित हैं तो इस अनुभव की साक्षी भरने से दोहा साखी हो जाता है। अत: स्वत: स्फूर्त वाणी में व्यापक भारतीय विविध भाषा-प्रदेशों के जीवन साक्ष्य, वहाँ की भाषाओं-मारवाड़ी, राजस्थानी, मेवाती, गुजराती, सिन्धी, मराठी, पंजाबी, सरायकी, संस्कृत, अरबी-फारसी आदि के रूप में समाहित हैं, इससे हिन्दी की समग्र-व्यापक शक्ति का परिचय मिलता है। हाँ इतना अवश्य ध्यान देना होगा कि सन्तों ने और दादू ने भी अपने अनुभवों से कुछ पारम्परिक शब्दों में नये अर्थ भरे हैं। जैसे 'मोटे' शब्द का अर्थ बड़े, भारी, परमात्मा आदि प्रसंगानुसार लिये गये हैं। इसी प्रकार 'दुहेला' एवं 'दुहेली' शब्दों के प्रयोग भी प्रसंगानुसार लिये हैं।

अत: दादू ग्रंथावली श्रध्दालु भक्तों, सेवकों, जिज्ञासुओं को सौंपते हुए हमें अत्यन्त हर्ष का अनुभव हो रहा है। हम श्री हरीशचन्द्र शर्मा, प्रकाशक-'प्रकाशन संस्थान' का आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने दादू ग्रंथावली का प्रकाशन बड़े मनोयोग एवं सुरुचिपूर्ण ढंग से किया है। पाठकों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।

 

सम्पर्क : ए-3/283, -डॉ‑ बलदेव वंशी

पश्चिम विहार, नयी दिल्ली-110063 (महानिदेशक : अखिल भारतीय श्री दादू

दूर‑ : 011-25268501 सेवक समाज एवं संयोजक :

मोबा‑ 9810749703 दादू शिखर सम्मान समिति)


 

 

 

 

 

 

जीवन-चरित्रा

 

 

भारत अनन्त काल से अध्यात्म का, ऋषियों, मुनियों, महात्माओं और सन्तों का देश रहा है। भारत की इस पुण्य-भूमि पर समय-समय पर महान और अवतारी पुरुष प्रकट होते रहते हैं। सन्त शिरोमणि श्री दादूदयाल नामदेव, कबीर, रैदास, नानक जैसे ही महान सन्त थे। कहते हैं कि अहमदाबाद नगर में लोदीराम नाम के नागर ब्राह्मण थे। वह सब प्रकार से सुखी और साधन सम्पन्न होते हुए भी पुत्रा के अभाव से बहुत दु:खी थे। एक दिन एक वृध्द सन्त ने उन्हें दर्शन दिये और उनका दु:ख जानकर कहा कि कल साबरमती नदी में तुम्हें जल पर तैरता हुआ एक बालक मिलेगा। तुम उसे अपना पोष्य पुत्रा मानकर पालन करना। वह एक ब्रह्म-ज्ञानी लोक-कल्याणकारी सिध्द महापुरुष होगा। सन्त के कथन के अनुसार विक्रम संवत् 1601 की फाल्गुन शुक्ल अष्टमी गुरुवार को दादू जी महाराज कमलदल के ऊपर तैरते हुए प्रकट हुए। इस प्रकार उन्होंने यही संकेत दिया कि इस नश्वर भौतिक संसार में कमलदल की तरह निर्लेप रहना चािहए। श्री दादू जी महाराज स्वयं भी आजीवन संसार से निर्लिप्त रहे। ग्यारह वर्ष की आयु में काँकरिया तालाब में खेलते समय अचानक एक वृध्द साधु ने उन्हें दर्शन दिये और अगम अगाध ब्रह्म के दर्शन कराए। बालक दादू के मस्तक पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम संसार को निर्गुण, निराकार ब्रह्म की उपासना का उपदेश देकर दु:खों से मुक्ति दिलाओ। यही दादू जी की गुरुदीक्षा थी। उनके जीवन का प्रवाह भगवद भक्ति की दिशा की ओर मुड़ गया। दादू जी की एक साखी में इसका उल्लेख इस प्रकार है-

दादू गैब माँहि गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद।
मस्तक मेरे कर धरया, दष्या अगम-अगाध॥

उन्नीसवें वर्ष में श्री दादू जी महाराज ने अहमदाबाद छोड़ दिया और राजस्थान की ओर चल पड़े। मार्ग में आबू पर्वत होते हुए उन्होंने माणकदास तथा ज्ञानदास को अपना ध्येय बताया और उन्हें अध्यात्म की प्रेरणा दी।

करड़ाला निवास-दादू स्वयं धर्म-प्रचार करते हुए आबू पर्वत पधारे। वहाँ से करड़ाला होते हुए पुष्कर पहुँचे। पुष्कर से बारह किलोमीटर दूर करड़ाला पहाड़ (कल्याणपुर पर्वत) को अपना साधना-स्थल बनाया। यहीं एक ककेड़े के वृक्ष के नीचे तथा एक विशाल शिलाखण्ड के निकट ध्यानस्थ रहा करते। इस पर्वतमाला की एक चोटी पर साधना-भ्रष्ट एक प्रेत रहता था। वह लोगों को डराता और दु:ख दिया करता था। इस प्रेत को प्रेतयोनि से दादू जी ने मुक्त किया। करड़ाला धाम की पहाड़ी की तलहटी में दादूद्वारा, छतरी तथा आश्रम बना हुआ है। पंच तीर्थों में करड़ाला प्रथम धाम के रूप में जाना जाता है। यहीं पीथा नामक डाकू के कुकृत्य छुड़वाकर उसे निकट की पहाड़ी पर 'महारास लीला' के दर्शन कराये और सद्मार्ग पर लगाया। पीथा ने भी प्रतिज्ञा की-

गंग यमुन उलटी बहे, पश्चिम को ऊगे भान।
पीथा चोरी ना करे, 'गुरु दादू' की आन॥

सांभर में साधना-दादू जी की महिमा दूर-दूर तक फैलती गयी। यहाँ से सन्त दादूदयाल जी अजमेर, भीलवाड़ा, चित्ताौड़ होते हुए सांभर पहुँचे जोकि नमक की झील होने के कारण बहुत प्रसिध्द है। इस झील के मध्य एक टेकड़ी पर कुटिया बनाकर रहने लगे। प्राय: 6 वर्ष तक यहाँ साधना व प्रवचनों द्वारा प्रसिध्दि प्राप्त की। नगर के निकट होने के कारण उनके दर्शनों और धर्म उपदेश सुनने के लिए हिन्दू-मुसलमान आदि विभिन्न सम्प्रदायों के लोग आने लगे थे। यहीं उन्होंने 'समत्वयोग' की अनुभूति की। शुध्द चैतन्य-परब्रह्म परमात्मा उनका उपास्य था। निरंजन राम तथा 'सत्य' उनके उपदेशों का केन्द्र होता। निर्गुण आधार की प्रधानता के कारण उनकी सर्वप्रियता बढ़ती गयी-

अलह राम छूटा भ्रम मोरा।

हिन्दू तुर्क भेद कुछ नाहीं, देखूँ दर्शन तोरा॥टेक॥

सोई प्राण पिंड पुनि सोई, सोई लोही मासा।

सोई नैन नासिका सोई, सहजैं कीन्ह तमासा॥

श्रवणों शब्द बाजता सुनिये, जिह्ना मीठा लागे।

सोई भूख सबन को व्यापे, एक युक्ति सोई जागे॥

सोई संधि बँध पुनि सोई, सोई सुख सोई पीरा।

सोई हस्त पाँव पुनि सोई, सोई एक शरीरा॥

यहु सब खेल खालिक हरि तेरा, तैं हि एक कर लीना।

दादू जुगति जान कर ऐसी, तब यहु प्राण पतीना॥

सांभर नगर में दोनों ही पक्षों कुछ अग्रणी लोगों को दादू जी की बढ़ती हुई ख्याति और प्रतिष्ठा से विद्वेष जागा। उन्होंने हर सम्भव तरीके से उन्हें दबाने के प्रयास किये एवं समाप्त करने का निश्चय किया। किन्तु सन्त दादू निर्भय, निर्विकार रहकर अपने मार्ग पर चलते रहे। अपने पीव के गुणगान करते रहे-

एकै अक्षर पीव का, सोई सत करि जाणि।
राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परमाणि॥

उनके उपास्य निर्गुण राम थे। 'राम' शब्द का प्रयोग दादू ने 'प्रणव' की तरह किया है। निर्गुण उपासना में सुमिरण निर्गुण के वाचक नाम के रटने से होता है। फिर चाहे 'ओंकार' हो या 'राम' या 'कृष्ण' या 'रहीम'-कोई-सा नाम हो। इसलिए सन्त दादू ने कहा है-

दादू सिरजनहार के, केते नाम अनंत।
चित आवै सो लीजिये, यौं साधु सुमिरैं संत॥

शिष्य परम्परा-दादू जी के निर्गुण ब्रह्म के विचारों से प्रभावित होकर हर वर्ण और वर्ग के लोग, हिन्दू और मुसलमान उनके शिष्य बने। सर्वप्रथम शिष्य बड़े सुन्दरदासजी हुए जिनका पूर्व का नाम भौमा सिंह था। वह बीकानेर राज्य के राजवंशी थे। वह एक योध्दा थे और तत्कालीन राजा की ओर से काबुल की ओर युध्द करने गये तो पीछे उनकी पत्नी उनकी वीरगति की मिथ्या खबर सुनकर सती हो गयी। भौमा सिंह ने लौटकर जब पत्नी के शरीर-त्यागने की बात जानी तो विक्षुब्ध होकर गृहस्थ का परित्याग कर दिया। दादू महाराज की शरण में आ गये। दीक्षा ली और घाटड़े (अलवर) के पहाड़ी प्रदेश में ध्यान में लीन हो गये। इनकी परम्परा में आगे चलकर 'वीरवेशी' नागा समुदाय अस्तित्व में आया। ईश्वर की आराधना के साथ परोपकार, देश-रक्षा और राज्य-रक्षा में विभिन्न लड़ाइयों में नागा समुदाय सदैव बड़ा काम आया। इसके बाद वषना जी, टीला जी, जग्गा जी आदि पचास के लगभग शिष्य तो सांभर में ही बन चुके थे। 1619 से 1631 के मध्य दादू जी सांभर में रहकर आमेर चले गये। इनके सर्वप्रसिध्द शिष्यों में रज्जब जी, छोटे सुन्दरदास जी, जयत जी आदि हुए हैं, जिनकी साधना, तपस्या, सत्य और वाणी से दादू-सम्प्रदाय का नाम दूर-दूर तक फैल गया।

आमेर निवास-आमेर उस समय राजस्थान की राजधानी थी। आमेर की पहाड़ी पर दादू जी ने एक मन्दिर बनवाया, जो आज भी दादू पन्थियों का मुख्य तीर्थ स्थान माना जाता है। उस समय वहाँ के राजा भगवन्तदास जी थे। आमेर में ही रज्जबजी, मोहन जी मेवाड़ा, मोहन जी दफतरी आदि प्रसिध्द शिष्य बने। यहीं दादू जी की वाणी को पद्यमय रूप में मोहन जी दफतरी ने लिपिबध्द करना आरम्भ किया था।

गावहु मंगलाचार, आज वधावणा ये,

स्वप्नों देख्यो साँच, पीव घर आवणा ये॥टेक॥

भाव कलश जल प्रेम का, सब सखियन के शीश।

गावत चली वधावणा, जै जै जै जगदीश॥

पदम कोटि रवि झिलमिले, अंग अंग तेज अनंत।

विकस वदन विरहिनि मिली, घर आये हरि कंत॥

सुंदरि सुरति शृंगार कर, सन्मुख परसे पीव।

मो मंदिर मोहन आविया, वारूं तन मन जीव॥

कमल निरंतर नरहरी, प्रकट भये भगवंत।

जहाँ विरहिनि गुण वीनवे, खेले फाग वसंत॥

वर आयो विरहिनि मिली, अरस परस सब अंग।

दादू सुंदरि सुख भया, जुग जुग यहु रस रंग॥

(अर्थात् हे सखियो! आज वृध्दि के मंगलगीत गाओ क्योंकि जिन प्रभु को हम स्वप्न में देखती थीं वह सचमुच में हृदय-मन्दिर में पधार गये हैं, उन्हें प्रत्यक्ष रूप से देख लिया है।)

ऐसे अनेक सरस पदों को यहाँ लिपिबध्द ही नहीं किया जाता रहा बल्कि रसविभोर होकर इनका गायन भी होता था। आनन्द भी लूटा जाता था। इस प्रकार अद्वैत निर्गुण निराकार ब्रह्म राम में मन लगाने की सीख दादू देते हैं। मन को राम में ऐसे घुला-मिला देना चाहिए जैसे पानी में नमक घुलकर, रस रूप में परिणत हो जाता है-

जब मन लागे राम सौं, तब अनत काहे को जाय।
दादू पाणी लौंण ज्यों, ऐसे रहै समाय॥

अकबर से भेंट-सम्राट अकबर की राजधानी सीकरी में थी। वहीं दादू जी की भेंट सम्राट अकबर से हुई बताते हैं। दादू जी के शिष्य माधवदास जी के माध्यम से राजा भगवन्तदास से कहकर अकबर ने दादू जी को निमन्त्राण भेजा। जब दादू जी अकबर के दरबार में पहुँचे तो अकबर अपने दरबारियों के साथ बैठा था। पर अपने बैठने का प्रबन्ध न देखकर दादू जी ने क्षणभर विचार किया ही था कि अकबर ने कहा कि हम तुरन्त एक साथ कुछ बातों का उत्तार चाहते हैं। पहला प्रश्न था-

''खुदा की जात क्या है?''

''उसका अंग क्या है?''

''उसका वजूद कैसा है?''

''उसका रंग कैसा है?''

तब दादू जी ने उत्तार दिया-

इश्क खुदा की जात है, इश्क खुदा का रंग।
इश्क खुदा-इ-वजूद है, इश्क खुदा का अंग॥

यह उत्तार सुनकर अकबर ने तुरन्त खड़े होकर क्षमा याचना की, उन्हें उचित स्थान दिया। अकबर इतना प्रभावित हुआ कि उसने चालीस दिनों तक दादू जी के साथ सत्संग किया। इस क्रम में अकबर द्वारा यह प्रश्न करने पर कि तीन गुणों और पाँच भूतों की किस क्रम से रचना हुई? अर्थात् कौन पहले और कौन बाद में बना? दादू जी ने उत्तार दिया-

एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समरथ सोय।
आगे पीछे वो करे, जे बल-हीणा होय॥

दादू जी की अमृतमयी वाणी के प्रभाव में अकबर ने 'गोहत्या बन्दी' का फरमान जारी किया और उनकी प्रशस्ति में उन्हें अल्लाह और खुदा का नूर जशहिर किया-

दादू नूर अल्लाह है, दादू नूर खुदाय।
दादू मेरा पीव है, कहै अकबर शाह॥

संवत् 1640 में अकबर बादशाह का सत्संग समाप्त कर महाराज दादूदयाल जी सीकरी से चलकर दौसा कस्बे में पहुँचे। दौसा से कुछ दूरी पर एक सुन्दर सरोवर के तट पर एक पीपल के वृक्ष के नीचे दादू जी विश्राम कर रहे थे। वह वृक्ष सूखा था। महाराज की दृष्टि उस पर पड़ते ही वह हरा हो गया। इस घटना को सुनकर परमानन्दजी, जो कि छोटे सुन्दरदास जी के पिता थे, पुत्रा को साथ लेकर दादू जी से मिलने आये। दादू जी ने सुन्दरदास के सिर पर हाथ रखा। सुन्दरदास दादू जी के शिष्य हो गये। इन्होंने बाद में सुन्दर विलास, ज्ञान समुद्र आदि ग्रन्थों की रचना की और बहुत ख्याति अर्जित की।

मोरड़ा ग्राम में वट-वृक्ष-आमेर से दादू जी टहटड़ा ग्राम व सांभर में सत्संग करते व भ्रमण करते हुए करड़ाला पधारे और वहाँ कुछ दिन प्रवास करके निकट के मोरड़ा नामक ग्राम में विणजारा जाति के आग्रह पर पधारे। यहाँ वह बड़ के पेड़ के नीचे रुके थे। निकट ही एक तालाब है। यह पेड़ 'दयाल जी का वट' और तालाब 'दयाल-सागर' नाम से प्रसिध्द है।

नारायणा धाम में त्रिापोलिया-यहाँ से चलकर दादू महाराज नरेना (नारायणा) पहुँचे। वहाँ के राजा ने दादू जी के सम्मान स्वरूप विश्राम के लिए त्रिापोलिया स्थान चुना। अभी सात दिन ही हुए थे कि आठवें दिन वहाँ एक सर्प प्रकट हुआ। सर्प ने अपने फन से दादू जी को वहाँ से उठने का संकेत किया। दादू जी ने इसे ब्रह्म आदेश मानकर उसके साथ प्रस्थान किया। सर्प के पीछे-पीछे चल पड़े। इस सर्प ने एक खेजड़े के वृक्ष के नीचे जाकर बैठने का संकेत दिया। दादू जी वहीं बैठ गये। वह खेजड़ा, नारायणा में आज भी विद्यमान है।

दादू जी की ख्याति सब दिशाओं में तीव्रता से फैलती देखकर प्रभावित होकर राजा जगमल ने दादू जी की सहमति से उनके लिए नारायणा में एक मन्दिर बनवाया। यह मन्दिर दादू पन्थियों का प्रमुख तीर्थ स्थान बन गया। यहीं पर एक भव्य भवन बना जो दादूद्वारा के नाम से प्रसिध्द है। दादू जी के एक शिष्य जैतजी के समय में गुरु गोविन्द सिंह जी इस आश्रम में उनसे मिलने आये थे। इस आश्रम के निकट प्रांगण में, दादू जी के शिष्यों की ग्यारह समाधियाँ बनी हुई हैं, जो 'छतरियाँ' के नाम से विख्यात हैं। नारायणा धाम में बहुत बड़े मेले जुटते हैं : श्री दादू जी के प्रकट दिवस पर और श्री जयत-जयन्ती पर, जिनमें गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब से हजारों भक्त एकत्रा होते हैं। आश्रम के अहाते में ही संग्रहालय है। यहाँ दादू जी का पलंग, खड़ाऊँ आदि सुरक्षित रखी गयी हैं, तो उनके शिष्यों की वाणियों के ग्रन्थ-पाण्डुलिपियाँ, वीणा आदि वाद्ययन्त्रा भी सुरक्षित हैं।

दादू राम अगाध है, अविगत लखै न कोइ।
निर्गुण सगुण का कहै, नाम विलम्ब न होइ॥

दादू राम अगाध है, बेहद लख्या न जाय।
आदि अंत नहिं जाणिये, नाम निरंतर गाय॥

दादू राम सँभालि ले, जब लग सुखी शरीर।
फिर पीछैं पछिताहिगा, जब तन मन धरै न धीर॥

दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम।
सुख सागर चलि जाइये, दादू तेज बेकाम॥

दादू जी का स्पष्ट कथन है कि जो भी दृश्यमान भौतिक पदार्थ है वह अवश्य ही दु:ख का कारण है, उसके आकर्षण में उस पदार्थ में ही जो अटक गया है वह दु:ख का भागी बनेगा। और जो उस पदार्थभोग के प्रवाह में पड़ गया, उसी के साथ बहने लग गया, उसे दु:खों से मुक्ति नहीं मिल सकती। उस पदार्थभोग के साथ यदि राम का नाम मन में रख लिया जाये तो दु:खों का निवारण हो जाता है। क्योंकि राम तो सुख का अगाध सागर है। अत: दादू जी कहते हैं कि सुख के सागर राम की शरण में चले जाइये तो राम का कभी अन्त नहीं-इसलिए सुख का अन्त नहीं होगा। भौतिकता का अन्त है। राम के नाम से मिलने वाले सुख अनन्त हैं।

दादू का प्रसिध्द कथन है कि यह सारा ब्रह्माण्ड परम ब्रह्म चेतना से भरा हुआहै-

सरवर भरया दह दिसि, पंखी प्यासा जाइ।
दादू गुरु परसाद बिन क्यूँ जल पीवै आइ॥

यह सारा ब्रह्माण्ड ब्रह्मचेतना से परिपूर्ण है। पूर्व, पश्चिम, उत्तार, दक्षिण-इन चार दिशाओं के मध्य चार अन्य दिशाएँ मिलाकर आठ दिशाएँ हुईं तथा धरती और आकाश-ये दो दिशाएँ और मिलाकर दस दिशाएँ हैं। यहाँ सर्वत्रा ब्रह्मचेतना जल की तरह भरी है। और हम जीवात्माएँ पक्षी की भाँति हैं जो इस ब्रह्म सरोवर में रहते हुए भी प्यासे ही यहाँ से चले जाते हैं। जीव की इस जगत् में रहते हुए दु:खी, निराश रहने की यही विडम्बना है। सद्गुरु की कृपा हो जाने से, ज्ञान प्राप्त कर लेने पर हम ब्रह्माण्ड रूपी जल का पान करके आनन्दित हो सकते हैं, अन्यथा दु:खी, निराश और प्यासा ही इस संसार से जाना होता है।

सन्त दादूदयाल ने तन, मन और आत्मा की निर्मलता देने वाली वाणी से अपने समय के दु:खों-तनावों को और मनुष्य-मनुष्य में फैले विद्वेष, ऊँच-नीच और सम्प्रदायगत भेदभाव को मिटाने के प्रयास आजीवन किये, तभी लोगों ने प्यार और लाड़ भरे शब्दों में उन्हें 'दादू' कहा और कभी 'दयाल'। उनकी वाणी के अमृत में युग की कालिमा को नष्ट करने का अक्षय प्रकाश भरा हुआ है और ममता भरे हृदय में सात समुद्रों जैसा अगाध प्यार। दीन, हीन, निर्बल, दु:खी पर अपना प्यार न्यौछावर करने के कारण वह 'दादू' कहलाये और अपराधियों, विरोधियों पर भी दया करने के कारण 'दयाल'। सन्त कबीर के महाप्रस्थान के कुल छब्बीस वर्ष बाद अवतरित हुए दादू के लिए कबीर अत्यन्त प्रिय रहे हैं-

साँचा शब्द कबीर का, मीठा लागे मोय।
दादू सुनताँ परम सुख, केता आनन्द होय॥

कबीर की भाँति ही दादू ने अपनी वाणी में निर्गुण भक्ति को अपनाया तथा जाति व सामाजिक रूढ़ियों का खण्डन किया। साम्प्रदायिक वैमनस्य को दूर करके हिन्दू-मुसलमान के मध्य एकात्मकता एवं सौमनस्य बढ़ाने के अनथक प्रयास किये। दादू प्रेम और करुणा की गंगा बहाने वाले, परमात्मा के नूर को धरती पर उतार लाने वाले अनोखे सन्त थे। श्री दादूदयाल जी 58 वर्ष 2 मास और 15 दिन की अवस्था पूरी करके शुभ मिति ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी, शनिवार, संवत् 1660 वि‑ को परब्रह्म में लीन हुए। ऐहिक लीला की समाप्ति से पूर्व के उनके आदेश के अनुसार उनके शरीर को सभी शिष्यों ने एक सुन्दर पालकी में विराजमान किया। संकीर्तन करते हुए नरेना से पूर्व की दिशा में दस मील पर स्थित भैराणा पहाड़ के पास ले गये। वहीं 'खोल' में पालकी रखकर 'अन्त्येष्टि संस्कार' के सम्बन्ध में विचार करने लगे। उसी समय उनके शिष्य टीला जी को पहाड़ के मध्य महाराज के दर्शन हुए। टीला जी ने वहाँ उपस्थित सभी सन्तों को महाराज के दर्शन कराये। 'सत्यराम'-शब्द द्वारा अभिवादन करके महाराज दादूदयालजी अनर््तध्यान हो गये। पालकी में देह को ढूँढ़ा तो वहाँ केवल पुष्प मिले। सन्त दादू जी के शिष्य रज्जब जी ने सत्य कहा है-

गुरु दादू अरु कबीर की, काया भई कपूर।
रज्जब अज्जब देखिया, सगुणहि निर्गुण नूर॥

और दादू जी के ये शब्द सार्थक हो उठे-

साध कँवल हरि बासना, संत भँवर संग आय।
दादू परिमल ले चले, मिले राम कूँ जाय॥

दादू जी के सिध्दान्तों का सार-कथन, जो व्यवहार में लाना अपेक्षित है तथा जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपना जीवन सुख एवं आनन्द से परिपूर्ण कर सकता है-

तन मन निर्मल आत्मा, सब काहू की होय।
दादू विषय विकार की, बात न बूझै कोय॥

भौतिक वैश्वीकरण से उत्पन्न वर्तमान मानवी संकट के समय भी आध्यात्मिक वैश्वीकरण की अमित सम्भावनाएँ जगाती मध्ययुगीन भारतीय सन्त दादू की वाणी अपने स्नेह, सहृदयता, दया, सरलता, सहजता, मधुरता आदि गुणों के कारण्ा सन्त साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। इसमें सन्त कबीर की आक्रामकता, अक्खड़ता, व्यंग्य-वक्रता और चुनौती की धार नहीं, प्रत्युत उदार आत्मीयता, सुधार की अमित आशावादिता उसके मूल में है। दादू की वाणी में आग नहीं, ऊर्जा है। ताप-उत्तााप नहीं, स्नेहिलता- स्निग्धता है। सुझावधर्मी, कन्धे पर अपनेपन से हाथ रखकर बोलती हुई हितैषी वरिष्ठता, साधुता है।

तन मन निर्मल आत्मा सब काहू की होय।
दादू विषय विकार की बात न बूझे कोय॥

भाषागत बोधगम्यता, भावगत सादगी, सत्यवादी सरलता की ऐसी मिसाल कि निरक्षर भी अपनी सहज संस्कारशीलता के प्रवाह में इसमें डुबकी लगाने को उतावला हो कूद पड़े।

कबीर और नानक के बाद सर्वाधिक व्यापक जनाधार वाले तथा ख्यातनामा सन्त हैं दादूदयाल। इनके बावन प्रमुख शिष्यों और अप्रधान शिष्यों, सन्तों की तथा सम्प्रदायाचार्यों की सूची देखने से ही यह तथ्य प्रमाणित हो जाता है।

सन्त कवि दादूदयाल जी की दृष्टि, सोच, चिन्ता और चिन्तन समग्रतावादी है। सन्तों की विशिष्ट परम्परा में वह जाज्वल्यमान नक्षत्रा की भाँति चमक रहे हैं। उनकी वाणी में बड़ी विविधता और जीवन्तता है। बड़ा स्नेह और प्रकाश है। विषयगत विविधता बड़ी मुग्धकारी है।


 

 

 

अनुक्रम

 

 

साखी भाग

श्री गुरुदेव का अंग

सुमिरण का अंग

विरह का अंग

परिचय का अंग

जरणा का अंग

हैरान का अंग

लै का अंग

निहकर्मी पतिव्रता का अंग

चेतावनी का अंग

मन का अंग

सूक्ष्म जन्म का अंग

माया का अंग

साँच का अंग

भेष का अंग

साधु का अंग

मधय का अंग

सारग्राही का अंग

विचार का अंग

विश्वास का अंग

पीव पहचान का अंग

समर्थता का अंग

शब्द का अंग

जीवित मृतक का अंग

शूरातन का अंग

काल का अंग

सजीवन का अंग

पारिख का अंग

उपजन का अंग

दया निर्वैरता का अंग

सुन्दरी का अंग

कस्तूरिया मृग का अंग

निन्दा का अंग

निगुणा का अंग

विनती का अंग

साक्षी भूत का अंग

बेली का अंग

अबिहड़ का अंग

 


अथ श्री स्वामी दादू दयाल जी की ग्रंथावली

साखी भाग

अथ श्री गुरुदेव का अंग।।1।।

दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरु देवत:।

वन्दनं सर्व साधावा, प्रणामं पारंगत:।।1।।

परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनं।

निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनं।।2।।

गुरु प्राप्ति और फल

दादू गैब माँहि गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद।

मस्तक मेरे कर धारया, दख्या अगम अगाधा।।3।।

दादू सद्गुरु सहज में, कीया बहु उपकार।

निर्धान अनवँत कर लिया, गुरु मिलिया दातार।।4।।

दादू सद्गुरु सूं सहजैं मिल्या, लीया कंठ लगाइ।

दया भई दयालु की, तब दीपक दिया जगाइ।।5।।

दादू देखु दयालु की, गुरु दिखाई बाट।

ताला कूंची लाइ करि, खोले सबै कपाट।।6।।

सद्गुरु सामर्थ्य

दादू सद्गुरु अंजन बाहिकर, नैन पटल सब खोले।

बहरे कानों सुनने लागे, गूंगे मुख सों बोले।।7।।

सद्गुरु दाता जीव का, श्रवण शीश कर नैन।

तन मन सौंज सँवारि सब, मुख रसना अरु बैन।।8।।

राम नाम उपदेश करि, अगम गवन यहु सैन।

दादू सद्गुरु सब दिया, आप मिलाये अैन।।9।।

सद्गुरु कीया फेरिकर, मन का औरै रूप।

दादू पंचों पलट कर, कैसे भये अनूप।।10।।

साचा सद्गुरु जे मिले, सब साज सँवारै।

दादू नाव चढाय कर, ले पार उतारै।।11।।

सद्गुरु पशु मानुष करै, मानुष तैं सिध्द सोइ।

दादू सिध्द तैं देवता, देव निरंजन होइ।।12।।

दादू काढे काल मुख, अंधो लोचन देय।

दादू ऐसा गुरु मिल्या, जीव ब्रह्म कर लेय।।13।।

दादू काढे काल मुख, श्रवणहु शब्द सुनाय।

दादू ऐसा गुरु मिल्या, मृतक लिये जिवाय।।14।।

दादू काढे काल मुख, गूंगे लिये बुलाय।

दादू ऐसा गुरु मिल्या, सुख में रहे समाय।।15।।

दादू काढे काल मुख, महर दया कर आय।

दादू ऐसा गुरु मिल्या, महिमा कही न जाय।।16।।

सद्गुरु काढे केश गहि, डूबत इहि संसार।

दादू नाव चढायकरि, कीये पैली पार।।17।।

भव सागर में डूबतां, सद्गुरु काढे आय।

दादू खेवट गुरु मिल्या, लीये नाव चढाय।।18।।

दादू उस गुरुदेव की, मैं बलिहारी जाउं।

जहाँ आसन अमर अलेख था, ले राखे उस ठांउं।।19।।

ज्ञानोत्पत्तिा

आतम माँहीं ऊपजै, दादू पंगुल ज्ञान।

कृत्रिाम जाय उलंघि कर, जहाँ निरंजन थान।।20।।

आत्म बोधा बंझ का बेटा, गुरुमुख उपजै आय।

दादू पंगुल पंच बिन, जहाँ राम तहँ जाय।।21।।

गुरु शब्द

साचा सहजैं ले मिले, शब्द गुरु का ज्ञान।

दादू हमकूं ले चल्या, जहाँ प्रीतम का स्थान।।22।।

दादू शब्द विचार करि, लागि रहै मन लाय।

ज्ञान गहैं गुरुदेव का, दादू सहज समाय।।23।।

दया बिनती

दादू सद्गुरु शब्द सुनाय कर, भावै जीव जगाय।

भावै अन्तर आप कहि, अपने अंग लगाय।।24।।

दादू बाहर सारा देखिए, भीतर कीया चूर।

सद्गुरु शब्दों मारिया, जाण न पावे दूर।।25।।

दादू सद्गुरु मारे शब्द सों, निरखि निरखि निज ठौर।

राम अकेला रह गया, चित्ता न आवे और।।26।।

दादू हम को सुख भया, साधा शब्द गुरु ज्ञान।

सुधिा बुधिा सोधाी समझिकरि, पाया पद निर्वान।।27।।

सद्गुरु शब्द बाण

दादू शब्द बाण गुरु साधु के, दूर दिशंतर जाय।

जिहिं लागे सो ऊबरे, सूते लिये जगाय।।28।।

सद्गुरु शब्द मुख सों कह्या, क्या नेड़े क्या दूर।

दादू सिख श्रवणों सुन्या, सुमिरन लागा सूर।।29।।

करनी बिना कथनी

शब्द दूधा, घृत राम रस, मथ कर काढे कोइ।

दादू गुरु गोविन्द बिन, घट-घट समझ न होइ।।30।।

शब्द दूधा घृत राम रस, कोइ साधु बिलोवणहार।

दादू अमृत काढ ले, गुरुमुख गहै विचार।।31।।

घीव दूधा में रम रह्या, व्यापक सब ही ठौर।

दादू बकता बहुत है, मथि काढे ते और।।32।।

कामधोनु घट जीव है, दिन-दिन दुर्बल होय।

गोरू ज्ञान न उपजै, मथि नहिं खाया सोय।।33।।

योगाभ्यास

साचा समरथ गुरु मिल्या, तिन तत दिया बताय।

दादू मोटा महाबली, घट घृत मथिकर खाय।।34।।

मथि करि दीपक कीजिए, सब घट भया प्रकास।

दादू दीया हाथ करि, गया निरंजन पास।।35।।

दीयै दीया कीजिए, गुरुमुख मारग जाय।

दादू अपने पीव का, दरशन देखै आय।।36।।

दादू दीया है भला, दिया करो सब कोइ।

घर में धारया न पाइये, जे कर दिया न होइ।।37।।

दादू दीये का गुण ते लहैं, दीया मोटी बात।

दीया जग में चाँदणा, दीया चाले साथ।।38।।

निर्मल गुरु का ज्ञान गहि, निर्मल भक्ति विचार।

निर्मल पाया प्रेम रस, छूटे सकल विकार।।39।।

निर्मल तन मन आत्मा, निर्मल मनसा सार।

निर्मल प्राणी पंच करि, दादू लंघे पार।।40।।

परापरी पासै रहै, कोई न जाणै ताहि।

सद्गुरु दिया दिखाय करि, दादू रह्या ल्यौ लाय।।41।।

शिष्य जिज्ञासा

जिन हम सिरजे सो कहाँ, सद्गुरु देहु दिखाय।

दादू दिल अरवाह का, तहँ मालिक ल्यौ लाय।।42।।

मुझ ही में मेरा धाणी, पड़दा खोल दिखाय।

आतम सौं परमातमा, परगट आणि मिलाय।।43।।

भरि-भरि प्याला प्रेम रस, अपने हाथ पिलाय।

सद्गुरु के सदिकै किया, दादू बलि-बलि जाय।।44।।

सरवर भरिया दह दिशा, पंखी प्यासा जाय।

दादू गुरु परसाद बिन, क्यों जल पीवे आय।।45।।

मान-सरोवर मांहि जल, प्यासा पीवे आय।

दादू दोष न दीजिए, घर-घर कहण न जाय।।46।।

गुरु तथा शिष्य

दादू गुरु गरवा मिल्या, ताथैं सब गम होय।

लोहा पारस परसतां, सहज समाना सोय।।47।।

दीन गरीबी गहि रह्या, गरवा गुरु गंभीर।

सूक्षम शीतल सुरति मति, सहज दया गुरु धाीर।।48।।

सो धाी दाता पलक में, तिरै तिरावण जोग।

दादू ऐसा परम गुरु, पाया किहिं संजोग।।49।।

दादू सद्गुरु ऐसा कीजिए, राम रस माता।

पार उतारे पलक में, दर्शन का दाता।।50।।

देवे किरका दरद का, टूटा जोड़े तार।

दादू सांधो सुरति को, सो गुरु पीर हमार।।51।।

दादू घायल होय रहे, सद्गुरु के मारे।

दादू अंग लगाय करि, भव सागर तारे।।52।।

दादू साचा गुरु मिल्या, साचा दिया दिखाइ।

साचे को साचा मिल्या, साचा रह्या समाइ।।53।।

साचा सद्गुरु सोधिाले, साँचे लीजे साधा।

साचा साहिब सोधिा कर, दादू भक्ति अगाधा।।54।।

सन्मुख सद्गुरु साधु सौं, सांई सौं राता।

दादू प्याला प्रेम का, महा रस माता।।55।।

सांई सौं साचा रहै, सद्गुरु सौं शूरा।

साधाू सौं सन्मुख रहै, सो दादू पूरा।।56।।

सद्गुरु मिलै तो पाइये, भक्ति मुक्ति भण्डार।

दादू सहजैं देखिए, साहिब का दीदार।।47।।

दादू सांई सद्गुरु सेविये, भक्ति मुक्ति फल होय।

अमर अभय पद पाइये, काल न लागे कोय।।58।।

गुरु बिना ज्ञान नहीं

इक लख चन्दा आण घर, सूरज कोटि मिलाय।

दादू गुरु गोविंद बिन, तो भी तिमर न जाय।।59।।

अनेक चंद उदय करे, असंख्य सूर प्रकास।

एक निरंजन नाम बिन, दादू नहीं उजास।।60।।

दादू कदि यहु आपा जायगा, कदि यहु बिसरे और।

कदि यहु सूक्षम होयगा, कदि यहु पावे ठौर।।61।।

विषम दुहेला जीव को, सद्गुरु तैं आसान।

जब दरवे तब पाइये, नेड़ा ही अस्थान।।62।।

गुरु ज्ञान

दादू नैन न देखे नैन को, अन्तर भी कुछ नाँहि।

सद्गुरु दर्पण कर दिया, अरस परस मिल माँहि।।63।।

घट-घट राम रतन है, दादू लखे न कोइ।

सद्गुरु शब्दों पाइये, सहजैं ही गम होइ।।64।।

जब ही कर दीपक दिया, तब सब सूझन लाग।

यूं दादू गुरु ज्ञान तैं, राम कहत जन जाग।।65।।

आत्मार्थी भेष

दादू मन माला तहाँ फेरिये, जहाँ दिवस न परसे रात।

तहाँ गुरु बानाँ दिया, सहजै जपिये तात।।66।।

दादू मन माला तहाँ फेरिये, जहाँ प्रीतम बैठे पास।

आगम गुरु तैं गम भया, पाया नूर निवास।।67।।

दादू मन माला तहँ फेरिये, जहाँ आपै एक अनन्त।

सहजै सो सद्गुरु मिल्या, जुग-जुग फाग बसन्त।।68।।

दादू सद्गुरु माला मन दिया, पवन सुरति सूँ पोइ।

बिन हाथों निश दिन जपै, परम जाप यूँ होइ।।69।।

दादू मन फकीर मांही हुआ, भीतर लीया भेख।

शब्द गहै गुरुदेव का, माँगे भीख अलेख।।70।।

दादू मन फकीर सद्गुरु किया, कहि समझाया ज्ञान।

fuल आसन बैस कर, अकल पुरुष का धयान।।71।।

दादू मन फकीर जग तैं रह्या, सद्गुरु लीया लाय।

अहनिशि लागा एक सौं, सहज शून्य रस खाय।।72।।

दादू मन फकीर ऐसे भया, सद्गुरु के परसाद।

जहाँ का था लागा तहाँ, छूटे वाद विवाद।।73।।

ना घर रह्या न वन गया, ना कुछ किया कलेश।

दादू मनहीं मन मिल्या, सद्गुरु के उपदेश।।74।।

भ्रम विधवंस

दादू यहु मसीत यहु देहुरा, सद्गुरु दिया दिखाय।

भीतरि सेवा बन्दगी, बाहर काहे जाय।।75।।

कस्तूरिया मृग

दादू मंझे चेला मंझे गुरु, मंझे ही उपदेश।

बाहरि ढूढैं बावरे, जटा बधााये केश ।।76।।

मन का दमन

मन का मस्तक मूंडिये, काम-क्रोधा के केश।

दादू विषै विकार सब, सद्गुरु के उपदेश।।77।।

दादू पड़दा भरम का, रह्या सकल घट छाय।

गुरु गोविन्द कृपा करैं, तो सहजैं ही मिट जाय।।78।।

सूक्ष्म मार्ग

जिहिं मत साधु उध्दरैं, सो मत लीया शोधा।

मन लै मारग मूल गहि, यह सद्गुरु का परमोधा।।79।।

दादू सोई मारग मन गह्या, जिहिं मारग मिलिये जाय।

वेद कुरानों ना कह्या, सो गुरु दिया दिखाय।।80।।

विचार

मन भुवंग यहु विष भरया, निर्विष क्यौं ही न होइ।

दादू मिल्या गुरु गारुड़ी, निर्विष कीया सोइ।।81।।

एता कीजे आप तैं, तन मन उनमनि लाय।

पंच समाधाी राखिये, दूजा सहज सुभाय।।82।।

दादू जीव जंजालौं पड़ गया, उलझा नौ मण सूत।

कोई इक सुलझे सावधाान, गुरु बाइक अवधाूत।।83।।

मन निरोधा

चंचल चहुँ दिशि जात है, गुरु बाइक सों बंधिा।

दादू संगति साधु की, पार-ब्रह्म सों संधिा।।84।।

गुरु अंकुश माने नहीं, उदमद माता अंधा।

दादू मन चेतै नहीं, काल न देखै फंधा।।85।।

दादू मारया बिन माने नहीं, यह मन हरि की आन।

ज्ञान खड़ग गुरुदेव का, ता संग सदा सुजान।।86।।

जहाँ तैं मन उठि चले, फेरि तहाँ ही राखि।

तहँ दादू लै लीन करि, साधु कहें गुरु साखि।।87।।

दादू मन ही सूं मल ऊपजै, मन ही सूं मल धाोय।

सीख चले गुरु साधु की, तो तू निर्मल होय।।88।।

दादू कच्छब अपने कर लिये, मन इन्द्रिय निजठौर।

नाम निरंजन लागि रहु, प्राणी परहरि और।।89।।

मन के मतै सब कोइ खेले, गुरुमुख विरला कोइ।

दादू मन की माने नहीं, सद्गुरु का शिष्य सोइ।।90।।

सब जीवों को मन ठगै, मन को विरला कोइ।

दादू गुरु के ज्ञान सौं, सांई सन्मुख होइ।।91।।

दादू एक सूं लै लीन होना, सबै सयानप येह।

सद्गुरु साधु कहत हैं, परम तत्तव जप लेह।।92।।

सद्गुरु शब्द विवेक बिन, संयम रहा न जाय।

दादू ज्ञान विचार बिन, विषय हलाहल खाय।।93।।

घर-घर घट कोल्हू चले, अमीं महा रस जाय।

दादू गुरु के ज्ञान बिन, विषय हलाहल खाय।।94।।

शिष्य प्रबोधा

सद्गुरु शब्द उलंघ करि, जिन कोई शिष्य जाय।

दादू पग-पग काल है, जहाँ जाइ तहँ खाय।।94।।

सद्गुरु बरजे शिष्य करे, क्यों कर बंचे काल।

दह दिशि देखत बहि गया, पाणी फोड़ी पाल।।96।।

दादू सद्गुरु कहै सु शिष्य करे, सब सिध्द कारजहोय।

अमर अभय पद पाइये, काल न लागे कोय।।97।।

दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो हम तैं जिन होइ।

सद्गुरु लाजे आपणा, साधु न माने कोइ।।98।।

दादू 'हूं' की ठाहर 'है' कहो, 'तन' की ठाहर 'तूं'

'री' की ठाहर 'जी' कहो, ज्ञान गुरु का यूँ।।99।।

गुरु ज्ञान

दादू पंच स्वादी पंच दिशि, पंचे पंचों बाट।

तब लग कह्या न कीजिये, गह गुरु दिखाया घाट।।100।।

दादू पंचों एक मत, पंचों पूरया साथ।

पंचों मिल सन्मुख भये, तब पंचों गुरु की बाट।।101।।

सद्गुरु विमुख ज्ञान

दादू ताता लोहा तिणे सूँ, क्यों कर पकडया जाय।

गहन गति सूझे नहीं, गुरु नहीं बूझे आय।।102।।

गुरु विमुख कसौटी

दादू अवगुण गुण कर माने गुरु के, सोई शिष्य सुजान।

सद्गुरु अवगुण क्यों करे, समझे सोई सयान।।103।।

सोने सेती वैर क्या, मारे घण के घाइ।

दादू काट कलंक सब, राखे कंठ लगाइ।।104।।

पाणी माँही राखिये, कनक कलंक न जाइ।

दादू गुरु के ज्ञान सौं, ताइ अग्नि में बाहि।।105।।

दादू माँही मीठा हेत कर, ऊपर कड़वा राखि।

सद्गुरु शिष्य को सीख दे, सब साधाूं की साखि।।106।।

गुरु शिष्य प्रबोधा

दादू कहेशिष्य भरोसे आपणै, ह्नै बोली हुसियार।

कहेगा सो बहेगा, हम पहली करैं पुकार।।107।।

दादू सद्गुरु कहैं सु कीजिये, जे तूं शिष्य सुजान।

जहाँ लाया तहाँ लाग रहु, बूझे कहाँ अजान।।108।।

गुरु पहले मन सौं कहैं, पीछे नैन की सैन।

दादू शिष्य समझैं नहीं, कहि समझावै बैन।।109।।

कहे लखे सो मानवी, सैन लखे सो साधा।

मन की लखे सु देवता, दादू अगम अगाधा।।110।।

कठोरता

दादू कहि-कहि मेरी जीभ रही, सुन-सुन तेरे कान।

सद्गुरु बपुरा क्या करे, जो चेला मूढ अजान।।111।।

गुरु शिष्य प्रबोधा

एक शब्द सब कुछ कह्या, सद्गुरु शिष्य समझाय।

जहँ लाया तहँ लागे नहीं, फिर-फिर बूझे आय।।112।।

ज्ञान लिया सब सीख सुनि, मन का मैल न जाय।

गुरु बिचारा क्या करे, शिष्य विषय हलाहल खाय।।113।।

सद्गुरु की समझे नहीं, अपने उपजे नाँहि।

तो दादू क्या कीजिए, बुरी व्यथा मन माँहि।।114।।

 

असद् गुरु

गुरु अपंग पग पंख बिन, शिष्य शाखा का भार।

दादू खेवट नाव बिन, क्यों उतरेंगे पार।।115।।

दादू संशा जीव का, शिष्य शाखा का साल।

दोनों को भारी पड़ी, होगा कौन हवाल।।116।।

अंधो अंधाा मिल चले, दादू बन्धा कतार।

कूप पड़े हम देखते, अंधो अंधाा लार।।117।।

पर प्रबोधा

सोधाी नहीं शरीर की, औरों को उपदेश।

दादू अचरज देखिया, ये जाँयेंगे किस देश।।118।।

सोधाी नहीं शरीर की, कहैं अगम की बात।

जान कहावें बापुड़े, आयुधा लीये हाथ।।119।।

सत्यासत्य गुरु परीक्षा लक्षण

दादू माया मांहैं काढि कर, फिर माया में दीन्ह।

दोऊ जन समझै नहीं, एको काज न कीन्ह।।120।।

दादू कहै सो गुरु किस काम का, गहि भरमावे आन।

तत्तव बतावे निर्मला, सो गुरु साधु सुजान।।121।।

तूं मेरा हूँ तेरा, गुरु शिष्य कीया मंत।

दोनों भूले जात हैं, दादू विसरा कंत।।122।।

दुहि-दुहि पीवे ग्वाल गुरु, शिष्य है छेली गाय।

यह अवसर यों ही गया, दादू कहि समझाय।।123।।

शिष गोरू गुरु ग्वाल है, रक्षा कर कर लेय।

दादू राखे जतन करि, आनि धाणी को देय।।124।।

झूठे अंधो गुरु घणे, भरम दिढावें आय।

दादू साचा गुरु मिले, जीव ब्रह्म हो जाय।।125।।

झूठे अंधो गुरु घणे, बंधो विषय विकार।

दादू साचा गुरु मिले, सन्मुख सिरजनहार।।126।।

झूठे अंधो गुरु घणे, भरम दिढावें काम।

बंधो माया मोह सों, दादू मुख सों राम।।127।।

झूठे अंधो गुरु घणे, भटकैं घर-घर बार।

कारज को सीझे नहीं, दादू माथे मार।।128।।

बेखर्च व्यसनी

दादू भक्त कहावें आपको, भक्ति न जाने भेव।

सपने हीं समझे नहीं, कहाँ बसे गुरुदेव।।129।।

भ्रम विधवंस

भरम करम जग बंधिाया, पंडित दिया भुलाय।

दादू सद्गुरु ना मिले, मारग देइ दिखाय।।130।।

दादू पंथ बतावें पाप का, भरम कर्म विश्वास।

निकट निरंजन जे रहै, क्यों न बतावें तास।।131।।

विचार

दादू आपा उरझे उरझिया, दीसे सब संसार।

आपा सुरझे सुरझिया, यहु ज्ञान विचार।।132।।

गुरु मुख कसौटी

साधु का ऍंग निर्मला, तामें मल न समाय।

परम गुरु परगट कहैं, तातैं दादू ताय।।133।।

चेतावनी

राम नाम गुरु शब्द सों, रे मन पेलि भरंम।

निहकरमी सूं मन मिल्या, दादू काटि करंम।।134।।

सूक्ष्म मार्ग

दादू बिन पायन का पंथ है, क्यों कर पहुँचे प्रान।

विकट घाट औघट खरे, माँहि शिखर असमान।।135।।

मन ताजी चेतन चढे, ल्यौ की करे लगाम।

शब्द गुरु का ताजणा, कोई पहुँचे साधु सुजान।।136।।

 

पारख लक्षण

साधाों सुमिरण सो कह्या, जिहिँ सुमिरण आपा भूल।

दादू गहि गम्भीर गुरु, चेतन आनँद मूल।।137।।

स्वार्थी परमार्थी

दादू आप सवारथ सब सगे, प्राण सनेही नाँहि।

प्राण सनेही राम है, कै साधु कलि माँहि।।138।।

सुख का साथी जगत् सब, दुख का नाहीं कोइ।

दुख का साथी सांइया, दादू सद्गुरु होइ।।139।।

सगे हमारे साधु हैं, शिर पर सिरजनहार।

दादू सद्गुरु सो सगा, दूजा धांधा विकार।।140।।

दया निर्वैरता

दादू के दूजा नहीं, एकै आतम राम।

सद्गुरु शिर पर साधु सब, प्रेम भक्ति विश्राम।।141।।

उपजनि

दादू शुधा बुधा आत्मा, सद्गुरु परसे आय।

दादू भृंगी कीट ज्यौं, देखत ही हो जाय।।142।।

दादू भृंगी ज्यौं, सद्गुरु सेती होय।

आप सरीखे कर लिये, दूजा नाँही कोय।।143।।

दादू कच्छप राखे दृष्टि में कुंजों के मन माँहिं।

सद्गुरु राखे आपणा, दूजा कोई नाँहिं।।144।।

बच्चों के माता पिता, दूजा नाँहीं कोइ।

दादू निपजे भाव सूं, सद्गुरु के घट होइ।।145।।

बेपरवाही

एकै शब्द अनन्त शिष्य, जब सद्गुरु बोलै।

दादू जड़े कपाट सब, दे कूँची खोलै।।146।।

बिन ही किये होय सब, सन्मुख सिरजनहार।

दादू कर कर को मरे, शिष्य शाखा शिर भार।।147।।

सूरज सन्मुख आरसी, पावक किया प्रकास।

दादू सांई साधु बिच, सहजैं निपजै दास।।148।।

मन इन्द्रिय निग्रह

दादू पंचों ये परमोधा ले, इनहीं को उपदेश।

यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश।।149।।

अमर भये गुरु ज्ञान सौं, केते इहिं कलि माँहि।

दादू गुरु के ज्ञान बिन, केते मरि-मरि जाँहि।।150।।

औषधिा खाइ न पछ रहे, विषम व्याधिा क्यों जाय।

दादू रोगी बावरा, दोष वैद्य को लाय।।151।।

वैद्य व्यथा कहे देखि कर, रोगी रहे रिसाय।

मन माँही लीये रहै, दादू व्याधिा न जाय।।152।।

दादू वैद्य बिचारा क्या करे, रोगी रहे न साँच।

खाटा मीठा चरपरा, माँगे मेरा वाच।।153।।

गुरु उपदेश

दुर्लभ दरशन साधु का, दुर्लभ गुरु उपदेश।

दुर्लभ करिबा कठिन है, दुर्लभ परस अलेख।।154।।

दादू अविचल मंत्रा, अमर मंत्रा अखै मंत्रा,

अभय मंत्रा, राम मंत्रा, निजसार।

संजीवन मंत्रा, सबीरज मंत्रा, सुंदर मंत्रा, शिरोमणिमंत्रा,

निर्मल मंत्रा, निराकार।

अलख मंत्रा, अकल मंत्रा, अगाधा मंत्रा, अपार मंत्रा,

अनंत मंत्रा, राया।

नूर मंत्रा, तेज मंत्रा, ज्योति मंत्रा, प्रकाश मंत्रा, परम

मंत्रा, पाया।

उपदेश दीक्षा (दादू गुरु राया)।।155।।

दादू सब ही गुरु किये, पशु पंखी बन राय।

तीन लोक गुण पंच सौं, सब ही माँहि खुदाय।।156।।

जो पहली सद्गुरु कह्या, सो नैनहुँ देख्या आइ।

अरस परस मिलि एक रस, दादू रहे समाइ।।157।।

 

।।इति गुरुदेव का अंग सम्पूर्ण।।


अथ सुमिरण का अंग।।2।।

दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरु देवत:।

वन्दनं सर्व साधावा, प्रणामं पारंगत:।।1।।

एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाणि।

राम नाम सद्गुरु कह्या, दादू सो परवाणि।।2।।

पहली श्रवण द्वितीय रसन, तृतीय हिरदै गाय।

चतुर्थी चिंतन भया, तब रोम-रोम ल्यौ लाय।।3।।

मन प्रबोधा

दादू नीका नाम है, तीन लोक तत सार।

रात दिवस रटबौ करी, रे मन इहै विचार।।4।।

दादू नीका नाम है, हरि हिरदै न विसार।

मूर्ति मन माँहीं बसे, श्वासैं श्वास सँभार।।5।।

श्वासैं श्वास सँभालतां, इक दिन मिलि है आय।

सुमिरण पैंडा सहज का, सद्गुरु दिया बताय।।6।।

दादू नीका नाम है, सो तू हिरदै राखि।

पाखंड प्रपंच दूर कर, सुनि साधु जन की साखि।।7।।

दादू नीका नाम है, आप कहै समझाय।

और आरंभ सब छाड़ि दे, राम नाम ल्यौ लाय।।8।।

राम भजन का सोच क्या, करतां होइ सो होय।

दादू राम सँभालिये, फिर बूझिये न कोय।।9।।

नाम चेतावनी

राम तुम्हारे नाम बिन, जे मुख निकसे और।

तो इस अपराधाी जीव को, तीन लोक कित ठौर।।10।।

छिन-छिन राम सँभालतां, जे जिव जाय तो जाय।

आतम के आधाार को, नाहीं आन उपाय।।11।।

सुमिरण माहात्म्य

एक महूरत मन रहै, नाम निरंजन पास।

दादू तब ही देखतां, सकल करम का नास।।12।।

सहजैं ही सब होइगा, गुण इन्द्री का नास।

दादू राम सँभालतां, कटै कर्म के पास।।13।।

नाम चिंतावणी

एक राम के नाम बिन, जीवन की जलनी न जाय।

दादू केते पचि मुये, करि करि बहुत उपाय।।14।।

दादू एक राम की टेक गहि, दूजा सहज सुभाय।

राम नाम छाडै नहीं, दूजा आवै जाय।।15।।

नाम अगाधाता

दादू राम अगाधा है, परिमित नाँही पार।

अवर्ण वर्ण न जाणिये, दादू नाम अधाार।।16।।

दादू राम अगाधा है, अविगति लखै न कोइ।

निर्गुण सगुण का कहै, नाम विलम्ब न होइ।।17।।

दादू राम अगाधा है, बेहद लख्या न जाय।

आदि अंत नहिं जाणिये, नाम निरंतर गाय।।18।।

दादू राम अगाधा है, अकल अगोचर एक।

दादू नाम विलंबिये, साधाू कहैं अनेक।।19।।

दादू एकै अल्लह राम है, समर्थ सांई सोय।

मैदे के पकवान सब, खातां होय सु होय।।20।।

सगुण निर्गुण ह्नै रहे, जैसा है तैसा लीन।

हरि सुमिरण ल्यौ लाइये, का जाणौं का कीन।।21।।

नाम चित्ता आवे सो लेय

दादू सिरजनहार के, केते नाम अनंत।

चित आवै सो लीजिये, यूँ साधाू सुमरैं संत।।22।।

दादू जिन प्राण पिंड हम कूं दिया, अंतर सेवैं ताहि।

जे आवै औसाण शिर, सोई नाम संबाहि।।23।।

चिंतावणी

दादू ऐसा कौण अभागिया, कछू दिढावे और।

नाम बिना पग धारन कौं, कहो कहाँ है ठौर।।24।।

सुमिरण नाम महिमा माहात्म्य

दादू निमष न न्यारा कीजिए, अंतर तैं उर नाम।

कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम।।25।।

मन प्रबोधा

दादू जे तैं अब जाण्या नहीं, राम नाम निज सार।

फिर पीछे पछिताहिगा, रे मन मूढ गँवार।।26।।

दादू राम सँभालि ले, जब लग सुखी शरीर।

फिर पीछैं पछिताहिगा, जब तन मन धारै न धाीर।।27।।

दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम।

सुख सागर चलि जाइये, दादू तज बेकाम।।28।।

दादू दरिया यह संसार है तामें राम नाम जिननाव।

दादू ढील न कीजिए, यहु औसर यहु डाव।।29।।

सुमिरण नाम नि:संशय

मेरे संशा को नहीं, जीवण-मरण का राम।

सपनैं ही जिन बीसरै, मुख हिरदै हरिनाम।।30।।

सुमिरण नाम विरह

दादू दुखिया तब लगै, जब लग नाम न लेह।

तब ही पावन परम सुख, मेरी जीवनि येह।।31।।

सुमिरण नाम परीक्षा लक्षण

कछू न कहावै आपकौं, सांई कूं सेवै।

दादू दूजा छाडि सब, नाम निज लेवै।।32।।

सुमिरण नाम नि:संशय

जे चित चहुँटे राम सौं, सुमिरण मन लागै।

दादू आतम जीव का, संशा सब भागै।।33।।

सुमिरण नाम चिंतावणी

दादू पिव का नाम ले, तौ हि मिटे शिर साल।

घड़ी महूरत चालणां, कैसी आवै कालि।।34।।

सुमिरण बिना श्वास न ले

दादू औसर जीव तैं, कह्या न केवल राम।

अंतकाल हम कहैंगे, जम वैरी सौं काम।।35।।

दादू ऐसे महँगे मोल का, एक श्वास जे जाय।

चौदह लोक समान सो, काहे रेत मिलाय।।36।।

अमोलक श्वास

सोइ श्वास सुजाण नर, सांई सेती लाइ।

करि साटा सिरजनहार सूं, महँगे मोल बिकाइ।।37।।

व्यर्थ जीवन

जतन करे नहिं जीव का, तन मन पवना फेरि।

दादू महँगे मोल का, द्वै दोवटी इक सेर।।38।।

सफल जीवन

दादू रावत राजा राम का, कदे न विसारी नाँव।

आतम राम सँभालिये, तो सु बस काया गाँव।।39।।

निरंतर सुमिरण

दादू अहनिश सदा शरीर में हरि, चिन्तत दिन जाय।

प्रेम मगन लै लीन मन, अन्तर गति ल्यौ लाय।।40।।

निमष एक न्यारा नहीं, तन मन मंझि समाय।

एक अंग लागा रहै, ताकूं काल न खाय।।41।।

दादू पिंजर पिंड शरीर का, सुवटा सहज समाय।

रमता सेती रमि रहै, विमल-विमल जश गाय।।42।।

अविनाशी सूं एक ह्नै, निमष न इत उत जाय।

बहुत बिलाई क्या करे, जे हरि-हरि शब्द सुनाय।।43।।

दादू जहाँ रहूँ तहँ राम सूं, भावै कंदलि जाय।

भावै गिरि परबत रहूँ, भावै गेह बसाय।।44।।

भावै जाइ जलहरि रहूँ, भावै शीश नवाय।

जहाँ तहाँ हरि नाम सूं हिरदै हेत लगाय।।45।।

मन प्रबोधा

दादू राम कहे सब रहत है, नख शिख सकल शरीर।

राम कहे बिन जात है, समझी मनवा वीर।।46।।

दादू राम कहे सब रहत है, लाहा मूल सहेत।

राम कहे बिन जात है, मूरख मनवा चेत।।47।।

दादू राम कहे सब रहत है, आदि अन्त लौं सोय।

राम कहे बिन जात है, यहु मन बहुरि न होय।।48।।

दादू राम कहे सब रहत है, जीव ब्रह्म की लार।

राम कहे बिन जात है, रे मन हो हुशियार।।49।।

परोपकार

हरि भज साफल जीवणा, पर उपकार समाय।

दादू मरणा तहाँ भला, जहाँ पशु पक्षी खाय।।50।।

सुमिरण

दादू राम शब्द मुख ले रहै, पीछै लागा जाय।

मनसा वाचा करमना, तिहिं, तत सहजि समाय।।51।।

दादू रचि मचि लागे नाम सौं, राते माते होय।

देखेंगे दीदार कूं, सुख पावैंगे सोय।।52।।

चेतावणी

दादू सांई सेवै सब भले, बुरा न कहिये कोइ।

सारौं माँही सो बुरा, जिस घट नाम न होइ।।53।।

दादू जियरा राम बिन, दुखिया इहि संसार।

उपजै विनशै खपि मरे, सुख दुख बारंबार।।54।।

राम नाम रूचि ऊपजे, लेवे हित चित लाय।

दादू सोई जीयरा, काहे जमपुरि जाय।।55।।

दादू नीकी बरियाँ आय करि, राम जप लीन्हा।

आतम साधान सोधिा करि, कारज भल कीन्हा।।56।।

दादू अगम वस्तु पानैं पड़ी, राखी मांझि छिपाय।

छिन-छिन सोई संभालिये, मति वै बीसर जाय।।57।।

सुमिरण नाम माहात्म्य

दादू उज्ज्वल निर्मला, हरि रँग राता होय।

काहे दादू पचि मरे, पानी सेती धाोय।।58।।

शरीर सरोवर राम जल, माँहैं संयम सार।

दादू सहजैं सब गये, मन के मैल विकार।।59।।

दादू राम नाम जलं कृत्तवा, स्नानं सदा जित:।

तन मन आतम निर्मलं, पचं भू पापं गत:।।60।।

दादू उत्ताम इन्द्री निग्रहं, मुच्यते माया मन:।

परम पुरुष पुरातनं, चिन्तते सदा तन:।।61।।

दादू सब जग विष भरा, निर्विष विरला कोय।

सोई निर्विष होयगा, जाके नाम निरंजन होय।।62।।

दादू निर्विष नाम सौं, तन मन सहजैं होय।

राम निरोगा करेगा, दूजा नाहीं कोय।।63।।

ब्रह्मभक्ति जब ऊपजे, तब माया भक्ति विलाय।

दादू निर्मल मल गया, ज्यूँ रवि तिमिर नशाय।।64।।

मन हरि भाँवरि

दादू विषय विकार सूं, जब लग मन राता।

तब लग चित्ता न आवई, त्रिाभुवनपति दाता।।65।।

दादू का जाणौं कब होयगा, हरि सुमिरण इकतार।

का जाणौं कब छाड़ि है, यह मन विषय विकार।।66।।

है सो सुमिरण होता नहीं, नहीं सु कीजे काम।

दादू यहु तन यौं गया, क्यूँ करि पाइये राम।।67।।

सुमिरण नाम महिमा माहात्म्य

दादू राम नाम निज मोहनी, जिन मोहे करतार।

सुर नर शंकर मुनि जना, ब्रह्मा सृष्टि विचार।।67।।

दादू राम नाम निज औषधाी, काटे कोटि विकार।

विषम व्याधिा तैं ऊबरे, काया कंचन सार।।69।।

दादू निर्विकार निज नाम ले, जीवन इहै उपाइ।

दादू कृत्रिाम काल है, ताके निकट न जाइ।।70।।

सुमिरण

मन पवना गहि सुरति सौं, दादू पावे स्वाद।

सुमिरण माँहीं सुख घणा, छाडि देहु बकवाद।।71।।

नाम सपीड़ा लीजिए, प्रेम भक्ति गुण गाय।

दादू सुमिरण प्रीति सौं, हेत सहित ल्यौ लाय।।72।।

प्राण कमल मुख राम कहि, मन पवना मुख राम।

दादू सुरति मुख राम कहि, ब्रह्म शून्य निज ठाम।।73।।

दादू कहतां सुनता राम कहि लेतां देतां राम।

खातां पीतां राम कहि, आत्म कमल विश्राम।।74।।

ज्यों जल पैसे दूधा में, ज्यों पाणी में लौंण।

ऐसे आतम राम सौं, मन हठ साधो कौंण।।75।।

दादू राम नाम में पैसि करि, राम नाम ल्यो लाय।

यह इकंत त्राय लोक में, अनत काहे को जाय।।76।।

मधय

ना घर भला न वन भला, जहाँ नहीं निज नाम।

दादू उनमनी मन रहै, भला तो सोई ठाम।।77।।

नाम महिमा माहात्म्य

दादू निर्गुणं नामं मई, हृदय भाव प्रवर्ततं।

भरमं करमं किल्विषं, माया मोहं कंपितम्ड्ड78।।

कालं जालं सोचितं, भयानक जम किंकरं।

हरषं मुदितं सद्गुरं, दादू अविगत दर्शनं।।79।।

दादू सब सुख स्वर्ग पयाल के, तोल तराजू बाहि।

हरि सुख एक पलक का, ता सम कह्या न जाइ।।80।।

सुमिरण नाम पारख लक्षण

दादू राम नाम सब को कहे, कहिबे बहुत विवेक।

एक अनेकौं फिर मिलै, एक समाना एक।।81।।

दादू अपणी अपणी हद्द में, सबको लेवे नांउ।

जे लागे बेहद्द सौं, तिनकी मैं बलि जांउ।।82।।

सुमिरण नाम अगाधाता

कौण पटंतर दीजिए, दूजा नाहीं कोय।

राम सरीखा राम है, सुमिरयां ही सुख होय।।83।।

अपनी जाणे आप गति, और न जाणे कोइ।

सुमिर-सुमिर रस पीजिए, दादू आनँद होइ।।84।।

करणी बिना कथणी

दादू सब ही वेद पुराण पढि, नेटि नाम निधर्ाार।

सब कुछ इनहीं माँहि है, क्या करिये विस्तार।।85।।

नाम अगाधाता

पढ-पढ थाके पंडिता, किनहुँ न पाया पार।

कथ-कथ थाके मुनि जना, दादू नाम अधाार।।86।।

निगम हि अगम विचारिये, तउ पार न पावे।

तातैं सेवक क्या करे, सुमिरण ल्यौ लावे।।87।।

कथनी बिना करणी

दादू अलिफ एक अल्लाह का, जे पढ जाणै कोइ।

कुरान कतेबां इलम सब, पढकर पूरा होइ।।88।।

दादू यहु मन पिंजरा, माँही मन सूवा।

एक नाम अल्लाह का, पढ हाफिज हूवा।।89।।

सुमिरण नाम पारख लक्षण

नाम लिया तब जाणिये, जे तन मन रहै समाइ।

आदि अंत मधय एक रस, कबहूँ भूलि न जाइ।।90।।

विरह पतिव्रत

दादू एकै दशा अनन्य की, दूजी दशा न जाइ।

आपा भूलै आन सब, एकै रहै समाइ।।91।।

सुमिरण विनती

दादू पीवे एक रस, बिसरि जाय सब और।

अविगत यहु गति कीजिए, मन राखो इहि ठौर।।92।।

आतम चेतन कीजिए, प्रेम रस पीवे।

दादू भूले देह गुण, ऐसै जन जीवे।।93।।

सुमिरण नाम अगाधाता

कहि कहि केते थाके दादू, सुनि सुनि कहु क्या लेय।

लूंण मिले गलि पाणियाँ, ता सम चित यौं देय।।94।।

दादू हरि रस पीवतां, रती विलम्ब न लाय।

बारंबार सँभालिये, मति वै बीसरि जाय।।95।।

सुमिरण नाम विरह

दादू जागत सपना ह्नै गया, चिन्तामणि जब जाय।

तब ही साचा होत है, आदि अन्त उर लाय।।96।।

नाम न आवे तब दुखी, आवे सुख सन्तोष।

दादू सेवक राम का, दूजा हरख न शोक।।97।।

मिलै तो सब सुख पाइए, बिछुरे बहु दुख होय।

दादू सुख दुख राम का, दूजा नाहीं कोय।।98।।

दादू हरि का नाम जल, मैं मीन ता माँहि।

संग सदा आनन्द करे, विछुरत ही मर जाँहि।।99।।

दादू राम विसार करि, जीवें किहिं आधाार।

ज्यौं चातक जल बूँद कूँ, करे पुकार पुकार।।100।।

हम जीवें इहि आसिरे, सुमिरण के आधाार।

दादू छिटके हाथ तैं, तो हमको वार न पार।।101।।

पति-व्रत निष्काम सुमिरण

दादू नाम निमित राम हि भजे, भक्ति निमित भज सोय।

सेवा निमित सांई भजे, सदा सजीवन होय।।102।।

नाम सम्पूर्ण

दादू राम रसायन नित चवै, हरि है हीरा साथ।

सो धान मेरे सांइयां, अलख खजीना हाथ।।103।।

हिरदै राम रहे जा जन के, ताको ऊरा कौन कहै।

अठ सिधिा नौ निधिा ताके आगे, सन्मुख सदा रहै।।104।।

वंदित तीनों लोक बापुरा, कैसे दरश लहै।

नाम निसान सकल जग उपरि, दादू देखत है।।105।।

दादू सब जग नीधाना, धानवंता नहिं कोय।

सो धानवंता जानिये, जाके राम पदारथ होय।।106।।

संगहि लागा सब फिरे, राम नाम के साथ।

चिन्तामणि हिरदै बसे, तो सकल पदारथ हाथ।।107।।

दादू आनँद आतमा, अविनाशी के साथ।

प्राणनाथ हिरदै बसे, तो सकल पदारथ हाथ।।108।।

पुरुष प्रकाशित

दादू भावे तहाँ छिपाइये, साच न छाना होय।

शेष रसातल गगन धा्रू, परकट कहिये सोय।।109।।

दादू कहाँ था नारद मुनिजना, कहाँ भक्त प्रहलाद।

परकट तीनों लोक में, सकल पुकारैं साधा।।110।।

दादू कहाँ शिव बैठा धयान धारि, कहाँ कबीरा नाम।

सौ क्यूँ छाना होयगा, जे रु कहेगा राम।।111।।

दादू कहाँ लीन शुकदेव था, कहाँ पीपा रैदास।

दादू साचा क्यों छिपे, सकल लोक परकास।।112।।

दादू कहाँ था गोरख थरथरी, अनंत सिधाों का मंत।

परकट गोपीचन्द है, दत्ता कहैं सब संत।।113।।

अगम अगोचर राखिए, कर कर कोटि जतन।

दादू छाना क्यों रहै, जिस घट राम रतन।।114।।

दादू स्वर्ग पयाल में, साचा लेवे नाम।

सकल लोक शिर देखिए, परकट सब ही ठाम।।115।।

सुमिरण लांबि रस

सुमिरण का संशय रह्या, पछितावा मन माँहि।

दादू मीठा राम रस, सगला पीया नाँहि।।116।।

दादू जैसा नाम था, तैसा लीया नाँहि।

हौंस रही यहु जीव में, पछितावा मन माँहि।।117।।

सुमिरण नाम चिंतावणी

दादू शिर करवत बहै, बिसरे आतम राम।

माँहि कलेजा काटिये, जीव नहीं विश्राम।।118।।

दादू शिर करवत बहै, राम हृदै थें जाय।

माँहि कलेजा काटिये, काल दशों दिशि खाय।।119।।

दादू शिर करवत बहै, अंग परस नहिं होय।

माँहि कलेजा काटिये, यहु व्यथा न जाणे कोय।।120।।

दादू शिर करवत बहै, नैनहुँ निरखे नाँहि।

माँहि कलेजा काटिये, साल रह्या मन माँहि।।121।।

जेता पाप सब जग करे, तेता नाम बिसारे होइ।

दादू राम सँभालिये, तो येता डारे धाोइ।।122।।

दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही मोटी मार।

खंड-खंड कर नाखिये, बीज पड़े तिहिं बार।।123।।

दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही झ्रपै काल।

शिर ऊपर करवत बहै, आइ पड़े जम जाल।।124।।

दादूजबही राम बिसारिये, तब ही कँध विनाश।

पग-पग परले पिंड पड़े, प्राणी जाइ निराश ।।125।।

दादू जब ही राम बिसारिए, तब ही हाना होय।

प्राण पिंड सर्वस गया, सुखी न देख्या कोय।।126।।

नाम सम्पूर्ण

साहिबजी के नाम मां, विरहा पीड़ पुकार।

ताला-बेली रोवणा, दादू है दीदार।।127।।

सुमिरण विधिा

साहिबजी के नाम मां, भाव भक्ति विश्वास।

लै समाधिा लागा रहे, दादू सांई पास।।128।।

साहिबजी के नाम मां, मति बुधिा ज्ञान विचार।

प्रेम प्रीति सनेह सुख, दादू ज्योति अपार।।129।।

साहिबजी के नाम मां, सब कुछ भरे भंडार।

नूर तेज अनन्त है, दादू सिरजनहार।।130।।

जिसमें सब कुछ सो लिया, निरंजन का नांउ।

दादू हिरदै राखिये, मैं बलिहारी जांउ।।131।।

 

।।इति सुमिरण का अंग सम्पूर्ण।।


अथ विरह का अंग।।3।।

दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरु देवत:।

वन्दनं सर्व साधावा, प्रणामं पारंगत:।।1।।

रतिवंती आरति करे, राम सनेही आव।

दादू औसर अब मिलै, यहु विरहनि का भाव।।2।।

पीव पुकारे विरहनी, निश दिन रहै उदास।

राम राम दादू कहै, ताला-वेली प्यास।।3।।

मन चित चातक ज्यौं रटै, पिव पिव लागी प्यास।

दादू दरशन कारणै, पुरवहु मेरी आस।।4।।

दादू विरहनि दुख कासनि कहे, कासनि देइ संदेश।

पंथ निहारत पीव का, विरहनि पलटे केश।।5।।

विरहनि दुख कासनि कहै, जानत है जगदीश।

दादू निशदिन विरही है, विरहा करवत शीश।।6।।

शब्द तुम्हारा ऊजला, चिरिया क्यों कारी।

तुंहीं तुंहीं निश दिन करूँ, विरहा की जारी।।7।।

विरहनी-विलाप

विरहनि रोवे रात-दिन, झूरै मन ही माँहि।

दादू औसर चल गया, प्रीतम पाये नाँहि।।8।।

दादू विरहनि कुरलै कूंज ज्यों, निशदिन तलफत जाय।

राम सनेही कारणै, रोवत रैनि बिहाय।।9।।

पासे बैठा सब सुने, हमको जवाब न देय।

दादू तेरे शिर चढे, जीव हमारा लेय।।10।।

सबको सुखिया देखिए, दुखिया नाँहीं कोय।

दुखिया दादू दास हे, ऐन परस नहिं होय।।11।।

साहिब मुख बोले नहीं, सेवक फिरे उदास।

यहु वेदन जिय में रहे, दुखिया दादू दास।।12।।

पिव बिन पल-पल जुग भया, कठिन दिवस क्यों जाय।

दादू दुखिया राम बिन, काल रूप सब खाय।।13।।

दादू इस संसार में, मुझ सा दुखी न कोइ।

पीव मिलन के कारणैं, मैं जल भरिया रोइ।।14।।

ना वह मिले न मैं सुखी, कहो क्यों जीवन होय।

जिन मुझ को घायल किया, मेरी दारू सोय।।15।।

दरशन कारण विरहनी, वैरागनि होवे।

दादू विरह वियोगिनी, हरि मारग जोवे।।16।।

विरह उपदेश

अति गति आतुर मिलन को, जैसे जल बिन मीन।

सो देखे दीदार को, दादू आतम लीन।।17।।

छिन विछोह

राम विछोही विरहनी, फिर मिलण न पावे।

दादू तलफै मीन ज्यों, तुझ दया न आवे।।18।।

दादू जब लग सुरति समिटे नहीं, मन निश्चल नहीं होहि।

तब लग पिव परसे नहीं, बड़ी विपति यहु मोहि।।19।।

ज्यों अमली के चित अमल है, शूरे के संग्राम।

निर्धान के चित धान बसे, यौं दादू के राम।।20।।

ज्यों चातक के चित जल बसे, ज्यों पानी बिन मीन।

जैसे चन्द चकोर है, ऐसे दादू हरि सौं कीन।।21।।

ज्यों कुजर के मन वन बसे, अनल पक्षि आकास।

यों दादू का मन राम सौं, ज्यों वैरागी वनखंड वास।।22।।

भँवरां लुबधाी वास का, मोह्या नाद कुरंग।

यों दादू का मन राम सौं, ज्यों दीपक ज्योति पतंग।।23।।

श्रवणा राते नाद सौं, नैन राते रूप।

जिह्ना राती स्वाद सौं, त्यों दादू एक अनूप।।24।।

विरह उपदेश

देह पियारी जीव को, निशि दिन सेवा माँहि।

दादू जीवन मरण लों, कबहुँ छाड़ी नाँहि।।25।।

देह पियारी जीव को, जीव पियारा देह।

दादू हरि रस पाइये, जे ऐसा होय सनेह।।26।।

दादू हरदम माँहि दिवान, सेज हमारी पीव है।

देखूँ सो सुबहान, यह इश्क हमारा जीव है।।27।।

दादू हरदम माँहि दिवान, कहूँ दरूने दरद सौं।

परद दरूने जाइ, जब देखूँ दीदार कौं।।28।।

विरह विनती

दादू दरूने दरदवंद, यहु दिल दरद न जाय।

हम दुखिया दीदार के, महरवान दिखलाय।।29।।

मूये पीड़ा पुकारता, वैद्य न मिलिया आय।

दादू थोड़ी बात थी, जे टुक दरश दिखाय।।30।।

दादू मैं भिखारी मंगता, दर्शन देहु दयाल।

तुम दाता दुख भंजता, मेरी करहु सँभाल।।31।।

छिन विछोह

क्या जीये में जीवणा, बिन दरशन बेहाल।

दादू सोई जीवणा, परगट परसन लाल।।32।।

इहि जग जीवन सो भला, जब लग हिरदै राम।

राम बिना जो जीवना, सो दादू बेकाम।।33।।

विरह विनती

दादू कहु दीदार की, सांई सेती बात।

कब हरि दरशन देहुगे, यह अवसर चल जात।।34।।

व्यथा तुम्हारे दरश की, मोहि व्यापै दिन-रात।

दुखी न कीजे दीन को, दरशन दीजे तात।।35।।

दादू इस हियड़े यह साल, पिव बिन क्योंहि न जायसी।

जब देखूँ मेरा लाल, तब रोम-रोम सुख आइसी।।36।।

तूं है तैसा प्रकाश करि, अपना आप दिखाय।

दादू को दीदार दे, बलि जाउं विलम्ब न लाय।।37।।

दादू पिवजी देखें मुझको, हूँ भी देखूँ पीव।

हूँ देखूँ देखत मिले, तो सुख पावे जीव।।38।।

विरह कसौटी

दादू कहै-तन मन तुम पर वारणै, कर दीजे कै बार।

जे ऐसी विधिा पाइये, तो लीजे सिरजनहार।।39।।

विरह पतिव्रत

दीन दुनी सदके करूँ, टुक देखण दे दीदार।

तन मन भी छिन-छिन करौं, भिस्त दोजख भी वार।।40।।

विरह कसौटी

दादू हम दुखिया दीदार के, तू दिल तैं दूर न होइ।

भावै हमको जाल दे, होना है सो होइ।।41।।

विरह पतिव्रता

दादू कहै-जे कुछ दिया हमको, सो सब तुम ही लेहु।

तुम बिन मन माने नहीं, दरश आपणा देहु।।42।।

दूजा कुछ माँगैं नहीं, हमको दे दीदार।

तूं है तब लग एक टग, दादू के दिलदार।।43।।

विरह विनती

दादू कहैतूं है तैसी भक्ति दे, तूं है तैसा प्रेम।

तूं है तैसी सुरति दे, तूं है तैसा क्षेम।।44।।

विरह कसौटी

दादू कहैसदके करूँ शरीर को, बेर-बेर बहु भंत।

भाव-भक्ति हित प्रेम ल्यौ, खरा पियारा कंत।।45।।

दादू दरशन की रली, हमको बहुत अपार।

क्या जाणूँ कब ही मिले, मेरा प्राण अधाार।।46।।

दादू कारण कंत के, खरा दुखी बेहाल।

मीरा मेरा मिहर करि, दे दर्शन दर हाल।।47।।

ताल-बेली प्यास बिन, क्यों रस पीया जाय।

विरहा दरशन दरद सौं, हमको देहु खुदाय।।48।।

ताला-बेली पीड़ सौं, विरहा प्रेम पियास।

दर्शन सेती दीजिए, विलसे दादू दास।।49।।

दादू कहैहमको अपना आप दे, इश्क मुहब्बत दर्द।

सेज सुहाग सुख प्रेम रस, मिल खेलें लापर्द।।50।।

विरह उपदेश

प्रेम भक्ति माता रहे, तालाबेली अंग।

सदा सपीड़ा मन रहे, राम रमे उन संग।।51।।

विरह विनती

प्रेम मगन रस पाइये, भक्ति हेत रुचि भाव।

विरह विश्वास निज नाम सौं, देव दयाकर आव।।52।।

गई दशा सब बाहुड़े, जे तुम प्रगटहु आय।

दादू ऊजड़ सब बसे, दर्शन देहु दिखाय।।53।।

हम कसिये क्या होइगा, विड़द तुम्हारा जाय।

पीछैं ही पछिताहुगे, तातैं प्रकटहु आय।।54।।

छिन विछोह

मींयां मैंडा आव घर, वांढी वत्ताां लोइ।

डुखंडे मुंहिडे गये, मराँ विछोहै रोइ।।55।।

विरह पतिव्रत

है सो निधिा नहिं पाइये, नहिं सु है भरपूर।

दादू मन माने नहीं, तातैं मरिये झूर।।56।।

विरही विरह लक्षण परीक्षा

जिस घट इश्क अल्लाह का, तिस घट लोही न माँस।

दादू जियरे जक नहीं, सिसके श्वासों श्वास।।57।।

रती रब ना बीसरै, मरै सँभाल सँभाल।

दादू सुहदायी रहे, आशिक अल्लह नाल।।58।।

दादू आशिक रब्बदा, शिर भी डेवे लाहि।

अल्लह कारण आपको, साड़े अन्दर भाहि।।59।।

विरह-कसौटी

भोरे-भोरे तन करै, वंडे कर कुरबाण।

मिट्ठा कोड़ा ना लगे, दादू तोहूँ साण।।60।।

विरही विरह-लक्षण

जब लग शीश न सौंपिये, तब लग इश्क न होय।

आशिक मरणे ना डरे, पिया पियाला सोय।।61।।

विरह पतिव्रत

तैं डीनोंई सभु, जे डीये दीदार के।

उंजे लहदी अभु, पसाई दो पाण के।।62।।

बिचौं सभो डूर कर, अन्दर बिया न पाय।

दादू रत्ताा हिकदा, मन मुहब्बत लाय।।63।।

विरह उपदेश

इश्क मुहब्बत मस्त मन, तालिब दर दीदार।

दोस्त दिल हरदम हरजू, यादगार हुशियार।।64।।

विरह लक्षण

दादू आशिक एक अल्लाह के, फारिग दुनियाँ दीन।

तारिक इस औजूद तैं, दादू पाक यकीन।।65।।

आशिकां रह कब्ज करदां, दिल वजां रफतन्द।

अल्लह आले नूर दीदम, दिल हि दादू बन्द।।66।।

शब्द

दादू इश्क अवाज सौं, ऐसे कहै न कोय।

दर्द मुहब्बत पाइये, साहिब हासिल होय।।67।।

विरही विरह-लक्षण

कहाँ आशिक अल्लाह के, मारे अपने हाथ।

कहाँ आलम औजूद सौं, कहैं जबाँ की बात।।68।।

दादू इश्क अल्लाह का, जे कबहूँ प्रगटे आय।

तोतन-मनदिन अरवाह का, सब पड़दा जलजाय।।69।।

विरह-जिज्ञासु-उपदेश

अरवाहे सिजदा कुनंद, वजूद रा चि:कार।

दादू नूर दादनी, आशिकां दीदार।।70।।

विरह ज्ञानाग्नि

विरह अग्नि तन जालिये, ज्ञान अग्नि दौं लाय।

दादू नख-शिख पर जले, तब राम बुझावे आय।।71।।

विरह अग्नि में जालिबा, दरशन के तांई।