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भाषांतर इस पखवारे देशांतर

कविताएँ
गायत्रीबाला पंडा

कोणार्क

बिना हलचल हुए
वर्ष पर वर्ष
स्थिर मुद्रा में खड़े रहना ही
हमारी अभिनवता, कोई कहता।
हमारी नग्नता ही हमारा प्रतिवाद
और दूसरा स्वर जुड़ता।
उल्लास और आर्तनाद को माँग-माँग
पत्थर बन गए,
हेतु होते विस्मय का,
पथिक का, पर्यटक का।
प्राचुर्य और पश्चात्ताप में गढ़ा
एक कालखंड
क्या हो सकता है कोणार्क?
समय है निरुत्तर।

आदिवासी

तुम्हारे सिर पर फरफर
पताका उड़ते समय
धरती पर खड़े हो
क्या सोचते हो तुम
देश के बारे में!

फरफर पताका उड़ना
हो कोई नाम, उत्सव का
जैसे छब्बीस जनवरी
या पंद्रह अगस्त
तुम जो समझते स्वाधीनता का अर्थ
अर्थ गणतंत्र का
हम नहीं समझते, समझ नहीं पाते।

इतना मान होता तब तो!
झुक कर साल के पत्ते
चुगते समय
कंधे पर बच्चा झुला
पहाड़ चढ़ते समय
कपड़े उतार झरने में
नहाते समय
भर पेट हँड़िया पी
माताल हो नाचते समय
शिकार के पीछे बिजली-सा
झपटते समय
तुम्हारे हाई पिक्सेल कैमरे में
जो हमारे फोटो उठा लेते
कौशल से
उसका भाव कितना देश-विदेश में?
जानना कोई काम नहीं आता हमारे।
फोटो झूलती बधाई हो कर
तुम्हारी बैठक में,
होटल में, ऑफिस में,
होर्डिंग बन एयरपोर्ट पर
और राजरास्ते पर।
हमारे फोटो, हम देख नहीं पाते
कभी भी।
जैसे देश हमारा
पता नहीं कहाँ होता मानचित्र में।

हमारे लिए देश कहने पर
केवड़ा, तेंदू, साल, महुवा
हमारे लिए देश कहने पर
झरने का पानी, डूमा, डूँगर, हमारे लिए देश कहने पर
पेड़ का कोटर, जड़ी मूली, कुरई के फूल।
देश तुम्हारा, पताका बन
तुम्हारे सिर पर
फर फर उड़ते समय
हमारे सिर पर
चक्कर काट रहे गीधों का दल।

देश तुम्हारा जन-गण-मन हो
चोखा सुर होते समय
हम भागते-फिरते हाँफते
बाघ के पीछे, जो
झाँप लेता हमारा आहार।

देश तुम्हारा बत्तीस बाई पच्चीस की होर्डिंग में
आँखें चुँधिया देते समय
हम ढूँढ़ने निकलते स्वयं को
जंगल में।

देश तुम्हारा भव्य एम ओ यू बन
फाइल में लटकते समय
जीवन लटका होता हमारा
कभी सूखी आम की गुठली में
तो कभी पके तेंदू के टुकड़े पर।

आप सभ्य समाज के आधिवासी
हम हैं आदिम अधम आदिवासी।
सच कहेंगे ज्ञान ही नत्थीपत्र में।
             (अनुवाद : शंकरलाल पुरोहित)

धरोहर
सरस्वती की कहानी
 श्रीनारायण चतुर्वेदी

'सरस्वती' ने हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य की अनुपम सेवा की है। मासिक पत्रिकाओं में सरस्वती का मूर्धन्य स्थान रहा है। आचार्य द्विवेदी जी तथा 'सरस्वती' के मणि-कांचन-योग पर सौभाग्यशालिनी राष्ट्र-भाषा को सदा गर्व रहेगा। इस सुयोग के प्रेरक स्व. बाबू चिंतामणि घोष की हिंदी-सेवा को कौन भुला सकता है?
                                                                                 - वियोगी हरि

   

साहित्य के क्षेत्र में पत्र-पत्रिकाओं का महत्व कभी भी कम नहीं होता, किंतु हिंदी साहित्य के इतिहास में 'सरस्वती' की जो महिमा है, वह एकांत विलक्षण और अद्वितीय है। 'सरस्वती' के जरिए पुण्य-श्लोक पंडित महावीरप्रसाद जी द्विवेदी ने हिंदी भाषा और साहित्य की इतनी अधिक सेवा की कि हिंदी साहित्य के एक युग का नाम ही द्विवेदी युग पड़ गया। सरस्वती मात्र एक पत्रिका नहीं, साहित्य की यशस्विनी संस्था रही है। जिस गौरव के साथ हम नागरी प्रचारिणी सभा और हिंदी साहित्य सम्मेलन को याद करते हैं, उसी गौरव से हम सरस्वती की सेवाओं का भी उल्लेख करते हैं।
                                                                     - रामधारी सिंह दिनकर

नोबेल पुरस्कार विशेष
गीत चतुर्वेदी
प्रूस्त, पैट्रिक मोदियानो और नोबेल पुरस्कार

डायरी
मलाला युसूफजई
मलाला की डायरी

देशांतर
कहानियाँ
मार्क ट्वेन
भाग्य
वोल्फगांग बोर्शर्ट
रोटी
रोबेर्तो बोलान्यो
फोन काल्स
जोआओ गुइमारेस रोसा
नदी का तीसरा किनारा

व्याख्यान
मारियो वार्गास ल्योसा
पढ़ने और उपन्यास की प्रशंसा में

संस्मरण
मनमोहन सरल
धर्मयुग का समय :
पत्रकारिता से जुड़ी यादें, कुछ कड़वी, कुछ मीठी

निबंध
डॉ. श्रीराम परिहार
कहाँ से शुरू हुए; कहाँ पहुँचे

परंपरा से संवाद
अजित कुमार सिंह
अंगद की आत्मकथा

आलोचना
पंकज पराशर
भूमंडलीकृत सदी में कविता का सामाजिक पाठ

कविताएँ
हिंदी
अरुण देव
जनपदीय हिंदी
मनोज भावुक

सीलिया के नाम एक प्रेमगीत
बेन जानसन

तुम्हारे मादक नेत्रों की हाला
मुझे करती है गाफिल वह मधुशाला

तृप्त होने दो मुझे उन मदिरा के प्यालों से
या रीते प्यालों पर धर दो चुंबन अधरों से
होगी अगर तुम्हारे मादक नेत्रों की हाला
सच स्पर्श भी न होगा मदिरा का प्याला

आत्मा के गर्भ में जब जागती है प्यास
व्याकुल कर देती है प्रेम की आस
तुम्हारे आत्मिक प्रेम की ज्वाला में
होम है यह - विषमयी द्राक्ष दुहिता

गुलाबों का मैंने भेजा था गुलदस्ता
शपथ है श्वास की, गंध और गमक की
न जाने क्यों लौटा दिया तुमने !
पर उसमें अब भी आ रही है गंध

ताजे गुलाबों की ! ...नहीं ,,,
तुम्हारे श्वास की... प्रेम की !!!
                  (अनुवाद - किशोर दिवसे)

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