आइए पढ़ते हैं : चंद्रकांत देवताले की कविताएँ
धारावाहिक प्रस्तुति (14 दिसंबर 2018), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
मोहनदास करमचंद गांधी

प्रथम खंड : 12. सत्‍याग्रह का जन्‍म

यहूदियों की उस नाटक-शाला में 11 सितंबर, 1906 को हिंदुस्‍तानियों की सभा हुई। ट्रान्‍सवाल के भिन्‍न भिन्‍न शहरों से प्रतिनिधियों को सभा में बुलाया गया। परंतु मुझे यह स्‍वीकार करना चाहिए कि जो प्रस्‍ताव मैंने तैयार किए थे, उनका पूरा अर्थ तो मैं खुद भी उस समय समझ नहीं पाया था। मैं इस बात का अनुमान भी उस समय नहीं लगा सका था कि उन प्रस्‍तावों को पास करने के परिणाम क्‍या आएँगे। सभा हुई। नाटक-शाला में पाँव रखने की भी जगह न रही। सब लोगों के चेहरों पर मैं यह भाव देख सकता था कि कुछ नया काम हमें करना है, कुछ नयी बात होनेवाली है। ट्रान्‍सवाल ब्रिटिश इंडियन एसोसियेशन के अध्‍यक्ष श्री अब्‍दुल गनी सभा के सभापति-पद पर आसीन थे। वे ट्रान्‍सवाल के बहुत ही पुराने हिंदुस्‍तानी निवासियों में से एक थे। वे महमद कासम कमरुद्दीन नामक विख्‍यात पेढ़ी के साझेदार थे और उसकी जोहानिसबर्ग की शाखा के व्‍यवस्‍थापक थे। सभा में जितने प्रस्‍ताव पास हुए थे उनमें सच्‍चा प्रस्‍ताव तो एक ही था। उसका आशय इस प्रकार था : 'इस बिल के विरोध में सारे उपाय किए जाने के बावजूद यदि वह धारासभा में पास हो ही जाए, तो हिंदुस्‍तानी उसके सामने हार न मानें और हार न मानने के फलस्‍वरूप जो जो दुख भोगने पड़ें उन सबको बहादुरी से सहन करें।'

यह प्रस्‍ताव मैंने सभा को अच्‍छी तरह समझा दिया। सभा ने शांति से मेरी बात सुनी। सभा का सारा कामकाज हिंदी में या गुजराती में ही चला, इसलिए किसी को कोई बात समझ में न आए ऐसा तो हो ही नहीं सकता था। हिंदी न समझनेवाले तमिल और तेलुगु भाइयों को इन भाषाओं के बोलनेवाले लोगों ने सारी बातें पूरी तरह समझा दीं। नियमानुसार प्रस्‍ताव सभा के समक्ष रखा गया। अनेक वक्‍ताओं ने उसका समर्थन भी किया। उनमें एक वक्‍ता सेठ हाजी हबीब थे। वे भी दक्षिण अफ्रीका के बहुत पुराने और अनुभवी निवासी थे। उनका भाषण बड़ा जोशीला था। आवेश में आकर वे यहाँ तक बोल गए कि, ''यह प्रस्‍ताव हमें खुदा को हाजिर मान कर पास करना चाहिए। हम नामर्द बनकर ऐसे कानून के सामने कभी न झुकें। इसलिए मैं खुदा की कसम खाकर कहता हूँ कि इस कानून के सामने मैं कभी सिर नहीं झुकाऊँगा। मैं इस सभा में आए हुए सब लोगों को यह सलाह देता हूँ कि वे भी खुदा को हाजिर मानकर ऐसी कसम खाएँ।''

इस प्रस्‍ताव के समर्थन में अन्‍य लोगों ने...

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तेरह कहानियाँ
चित्रा मुद्गल

चित्रा मुद्गल हिंदी की उन विरल कथाकारों में से हैं जिन्होंने हाशिए पर के जीवन और समाज को अपने साहित्य के केंद्र में रखा है। गरीबी, अभाव और अपराध के बीच पिसता झोपड़पट्टी का जीवन हो, अकेले पड़ रहे बूढ़े और बच्चे हों, अपनी अस्मिता के लिए संघर्षरत स्त्रियाँ हों या कि रोजी-रोटी की तलाश में महानगरों का नरक भोग रहे मजदूर हों, सभी उनकी रचनाओं में केंद्रीय जगह पाते रहे हैं। चित्रा जी की लेखकीय संवेदना जब इन चरित्रों को अपनी कहानियों में रचती है तब ये एकदम पारदर्शी हो उठते हैं और हमें वह सब कुछ साफ साफ दिखाई देने लगता है जो हमारी आँखों से छुपा हुआ था। अभी चित्रा जी को 2018 के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। हमारे लिए यह दोहरी खुशी की बात इसालिए भी है कि वे इस समय विश्वविद्यालय परिवार का हिस्सा हैं। उन्हें बधाई देते हुए यहाँ पर उनकी तेरह कहानियाँ प्रस्तुत की जा रही हैं। इन कहानियों में चित्रा जी के लेखन की वह समस्त विशेषताएँ मौजूद हैं जिनके लिए वह समूचे हिंदी कथा साहित्य में अलग से पहचानी जाती हैं।

संस्मरण
अखिलेश
एक सतत एंग्री मैन

आलोचना
सुबोध शुक्ल
प्राण का है मृत्यु से कुछ मोल सा : शमशेर बहादुर सिंह
मिट्टी, फूल और लोहा बनती कविता : केदारनाथ अग्रवाल
पल-पल का हिसाब लेती कविता : भगवत रावत

बाल साहित्य
त्रिलोक सिंह ठकुरेला
दस कविताएँ

देशांतर - कहानियाँ
गाब्रिएल गार्सिया मार्केज
संत
सफेद बर्फ पर लाल खून की धार

विशेष
सुरेश वर्मा
स्क्रीन युग में कैमरा व माइक्रोफोन पर डर को दूर कर अभिव्यक्ति में सुधार के उपाय

विमर्श
अमरेंद्र कुमार शर्मा
नवजागरण में कलाएँ : एक संक्षिप्त यात्रा परिदृश्य

कविताएँ
नीरज पांडेय
यदुवंश यादव

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
प्रो. आनंद वर्धन शर्मा
फोन - 07152 - 252148
ई-मेल : pvctomgahv@gmail.com

समन्वयक
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फोन - 09970244359
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ISSN 2394-6687

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