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गांधी साहित्य (15 जून 2018), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
मोहनदास करमचंद गांधी

प्रथम खंड : 3. दक्षिण अफ्रीका में हिंदुस्तानियों का आगमन

पिछले प्रकरण में हम यह देख चुके हैं कि अँग्रेज नेटाल में आकर कैसे बसे थे। वहाँ उन्होंने जुलुओं से कुछ अधिकार और रिआयतें प्राप्त कीं। अनुभव से उन्होंने यह समझ लिया कि नेटाल में गन्ने, चाय और कॉफी का सुंदर उत्पादन हो सकता है। बड़े पैमाने पर ये फसलें पैदा करने के लिए हजारों मजदूरों की जरूरत थी। सौ-पचास अँग्रेज परिवार ऐसी सहायता के बिना ये फसलें पैदा नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने हबशियों को काम करने के लिए ललचाया और डराया भी। परंतु अब गुलामी का कानून रद हो चुका था, इसलिए वे इस प्रयत्न में सफल हो सकने जितना बल हबशियों पर आजमा नहीं सके। हबशियों की बहुत मेहनत करने की आदत नहीं होती। छह माह की साधारण मेहनत से वे अपना निर्वाह भलीभाँति कर सकते हैं। तब फिर किसी मालिक के साथ वे लंबी मुद्दत के लिए क्यों बँधें? लेकिन जब तक स्थायी मजदूर न मिलें तब तक अँग्रेज अपना यह ध्येय पूरा नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने भारत सरकार के साथ पत्र-व्यवहार आरंभ किया और मजदूरों की पूर्ति के लिए हिंदुस्तान की सहायता माँगी। भारत सरकार ने नेटाल की माँग स्वीकार की और उसके फलस्वरूप हिंदुस्तानी मजदूरों का पहला जहाज १६ नवंबर, १८६० को नेटाल पहुँचा। दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह के इतिहास में वह तारीख उल्लेखनीय मानी जायगी; क्योंकि यदि यह घटना न घटी होती तो दक्षिण अफ्रीका में हिंदुस्तानी न पहुँचे होते और वहाँ सत्याग्रह की लड़ाई भी न हुई होती। और उस स्थिति में यह इतिहास लिखने की आवश्यकता ही खड़ी न हुई होती।

मेरी दृष्टि से नेटाल के अँग्रेजों की यह माँग स्वीकार करने में भारत सरकार ने गंभीरता से सोचा नहीं। हिंदुस्तान के अँग्रेज अधिकारी जाने-अनजाने नेटाल के अपने भाइयों के पक्ष में हो गए। यह सच है कि इकरारनामें में मजदूरों की रक्षा की यथासंभव अधिक से अधिक शर्तें दाखिल करके उनके खाने-पीने की सामान्य सुविधाएँ कर दी गई थीं। परंतु उसमें इस बात का पूरा खयाल तो नही ही रखा गया कि इस प्रकार सुदूर देश में जाने वाले अनपढ़ मजदूरों पर यदि कोई दुख या संकट आ पड़े, तो उससे वे कैसे मुक्ति पा सकेंगे। और इन प्रश्नों पर तो बिलकुल नहीं सोचा गया कि हिंदुस्तानी मजदूरों के धर्म का वहाँ क्या होगा अथवा वे अपनी नीति की रक्षा वहाँ कैसे करेंगे? हिंदुस्तान के अँग्रेज अधिकारियों ने यह भी नहीं सोचा कि कानून से भले ही गुलामी की प्रथा का अंत आ गया हो, परंतु मालिकों के हृदय से दूसरों को गुलाम बनाने का लोभ तो दूर नहीं हुआ है। अधिकारियों को यह बात समझनी चाहिए थी, परंतु वे समझे नहीं...

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कहानियाँ
शर्मिला बोहरा जालान

बहुत बुरी दुनिया के बहुत खराब वक्त में बच्ची से किशोरी बन रहीं लड़कियाँ, जिंदगी की मुख्य धारा से फिसल फिसल जा रहे निम्न और मध्यवर्गीय लोग, मन के भीतर जो मन है उस मन में दूर तक पसरा निर्जन - मुख्यतः यही शर्मिला जालान का कथालोक है जो उन्हें दूसरी लेखिकाओं से थोड़ा अलग करता है। उनके पात्र प्रतिकार नहीं करते, वे जिंदगी की जंग में भी नहीं उतरते। वे बहुत गहरी वेदना में तड़पते हुए सोचते हैं, हमारे साथ इतनी बदसलूकी, इतनी बदनीयत और इतनी यातना क्यों है? ये कहानियाँ स्थूल यथार्थ के उलट चेतना में चल रही छटपटाहट को पकड़ने की कोशिश करती हैं। इन कहानियों में गहरे उतर कर ही उस स्त्री की वेदना के तारों को स्पर्श किया जा सकता है जो बंगाल के भद्रलोक वाले समाज में मार तमाम पाबंदियों के बीच आवाजाही कर रही हैं।-धीरेंद्र अस्थाना

आलोचना
रवि रंजन
अरथ अमित अति आखर थोरे
(रामविलास शर्मा का कवि-कर्म)
सौंदर्यात्मक संवेदनशीलता की कविता
(केदारनाथ सिंह का कवि-कर्म)

विमर्शँ
मिथिलेश कुमार
जे.सी. कुमारप्पा का आर्थिक चिंतन
विशेष योग्यता वाले समूहों के मानवाधिकार का सवाल

विशेष
रामानुज अस्थाना
तमिल साहित्य की अद्वितीय कृति ‘तिरुक्कुरल’
डॉ. वंदना भारती
टी.एस. इलियट की परंपरा एवं निर्वैयक्तिकता की अवधारणा

व्यंग्य
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मेरे लेखन के स्वर्णिम क्षण

भाषांतर - कविताएँ
काज़ी नज़रुल इस्लाम

कविताएँ
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कुछ और कहानियाँ
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जलकुंभी
वे दस मिनट
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इतिहासबिद्ध
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ISSN 2394-6687

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