आइए पढ़ते हैं : गोपालराम गहमरी की जासूसी कहानी :: गुप्तकथा
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मराठी कविताएँ
प्रफुल्ल शिलेदार

चींटी

एक चींटी
सीधी मेरे सामने खड़ी होकर
जोर-जोर से चिल्ला कर बता रही है
मेरे पीठ पीछे जो बाँध है
वह ऊँचा हो रहा है
और फूटने वाला है मेंढक के पेट की तरह
चींटी की आवाज को
मैं हमेशा अनसुना करता हूँ
मन ही मन हँसता रहता हूँ
उसका व्याकुल होकर बताना
उसी के जैसा हल्का लगता है
बिल्कुल धूल की खाक जैसा हल्का
उसका हमेशा मुझे इस तरह बताना
मुझे परेशान करता है
उसकी हँसी मैं सह नहीं सकता
और तो और वह इतनी महीन है
कि उसे मैं
अपने पाँव के गठीले अँगूठे से
रगड़ भी नहीं सकता
फिर भी वह हमेशा दिखती रहती है
इतनी साफ कि मानो किसी लेंस से उसे देख रहा हूँ
शायद मेरे ही आँख की पुतली पर
वह रहती होगी
मैं उसे नजरअंदाज भी नहीं कर सकता
क्योंकि वह जोर-जोर से जो कहती है
वो सब धीरे-धीरे सच साबित होता है।

उपन्यास में झाँक कर देखा

उपन्यास में झाँक कर देखा
गहरे कुएँ जैसी सुरंग के तल में
लेखक जगमगाता उजाला सजाए हुए था
सारे किरदार रोजमर्रा की जिंदगी जी रहे थे
प्रसंगों का रहट चल रहा था
इतनी उत्कटता से किरदार जीवन जी रहे थे
जितना हम अपनी जिंदगी में भी कभी नहीं जीते
भाषा में चमक थी
निराशा में भी धार थी
घास के पत्तों के भी कई प्रसंग थे
कभी किसी के पीठ तले
कभी सिर के नीचे
कोमल तलवों के नीचे
मजबूत जूतों तले
खिल उठने ओस से भारी होने चकित होने
रौंदे जाने उखाड़ कर फेंके जाने के
कई प्रसंग थे
जमीदोज होने के बावजूद
एक हरा पत्ता
सिर उठाने की हिम्मत दिखा रहा था
पीले पत्ते तो मिट्टी में मिलने की आस लगाए थे
मैं बारीकी से मुआयना करने लगा
कि क्या मैं भी इसी में कहीं रेंगता हुआ दिखता हूँ
ढूँढ़ते-ढूँढ़ते गहरे कुएँ के तल तक पहुँच गया
वहाँ से ऊँचे उठे कुएँ के मुँह को
ढकने वाला आकाश ताकने लगा
मैं देखने लगा कि
क्या उस आकाश में मैं कहीं उड़ रहा हूँ !

( मराठी से हिंदी अनुवाद स्वयं कवि के द्वारा। और कविताएँ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

यात्रा, यात्री और वृत्तांत
(व्याख्यान)
गगन गिल

हमारे आस-पास अब इतना शोर है कि सिर्फ यात्रा के दौरान हमें वह मद्धिम सी आवाज सुनाई पड़ती है, आदिम सृष्टि की। कैसी भी यात्रा हो, किसी खंडहर की, अनजान देश की, समुद्र-पर्वत या जंगल-झरने की - हर यात्रा में एक बिंदु आता है, जब यात्री अपने भीतर एक स्पंदन महसूस करता है, सृष्टि की बुदबुदाहट। लेकिन हर कोई उसे नहीं कह पाता। जो कह पाता है, वही लेखक है। इसलिए ये तीनों चीजें अलग हैं - यात्रा, यात्री, लेखक। अगर आप अपने जीवन में सिर्फ एक काम कर पाएँ, यात्रा, तो भी वह काफी है। दरअसल जितना यह धरती, इसकी धुरी हमें अपनी ओर खींचती है, उससे कहीं ज्यादा ऊपर की चीजें - आसमान, हवा, चिड़ियाँ, स्वर्ग की कल्पनाएँ। जिसने भी हवाई जहाज बनाया, चिड़िया की तरह उड़ने के लिए था। वह जमीन और जल पर सबसे तेज भागेगा, यह बाद में पता चला।

संस्मरण
दिवाकर मुक्तिबोध
वे कहीं गए हैं, बस आते ही होंगे

कहानियाँ
काशीनाथ सिंह
जंगलजातकम्
मनोज रूपड़ा
अनुभूति
वंदना राग
विरासत
रवि बुले
कैरेक्टर
कुणाल सिंह
शोकगीत
शेषनाथ पांडेय
तारीख

विमर्श
आरती
विकास बैंक की ई.एम.आई-याँ
राजमार्गों की ओर मुँह फेरकर

सिनेमा
अमितेश कुमार
कहानी और सिनेमाई रूपांतरण
(‘यही सच है’ और ‘रजनीगंधा’ के बीच एक सहज संवाद)

कविताएँ
मंजूषा मन
हरीश पाराशर ‘ऋषु’

कुछ और कहानियाँ
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(कुलपति)

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ISSN 2394-6687

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