आइए पढ़ते हैं : जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति :: कामायनी
संपादकीय गीत कविता पर एकाग्र परंपरा

कविता का सर्वांगीण सौंदर्य
बुद्धिनाथ मिश्र

पिछली सदी में हिंदी का समृद्ध काव्य-मंच उन तमाम सारस्वत रातों और संध्याओं का साक्षी रहा है, जब मंच से सिद्ध और प्रसिद्ध कवि काव्यपाठ करते थे और काव्यप्रेमी श्रोता रात-रात भर शब्द-स्वर की उस दुर्लभ काव्यधारा में बेसुध होकर अवगाहन करते रहते थे। यह क्रम 'सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक' चलता था। यह इसलिए कि कविता दुनिया के हर कोने में 'वाचिक परंपरा' की ही वारिस रही है। भारत में तो इसकी हजारों वर्ष लंबी मानव-श्रृंखला है। यहाँ तक कि भारत के जिस एकमात्र कवि रवींद्रनाथ टैगोर को नोबेल प्राइज मिला है, वह इसी परंपरा के वारिस होने के कारण। सन् 1913 में 'गीतांजलि' को नोबेल पुरस्कार देते समय भी कविता की गीतात्मक काव्यधारा को पुनर्परिभाषित किया गया था, क्योंकि यह पुरस्कार भारत के उस 'संगीतकार, चित्रकार कवि' को दिया जाना था, जो नई कविता के यूरोपीय दायरे से बाहर था, लेकिन एशिया महाद्वीप में सर्वाधिक प्रभावशाली था और उसे पुरस्कार देने का मतलब यूरोपीय चौहद्दी तक सीमित नोबेल प्राइज का एशिया महाद्वीप में पाँव बढ़ाना था।
   संयोगवश, 1913 के बाद कविता को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता पूरे 103 वर्षों के बाद आज यानी 2016 में पडी, जब साहित्य का नोबेल प्राइज अमेरिका के 'साहित्यिक कलाकार' बॉब डिलन को दिया गया, जो हमारे असमिया कवि-गायक भूपेन हजारिका की परंपरा का कवि है। भूपेनदा की भाँति ही वह सामयिक विषयों पर गत साठ के दशक से गीत लिखता रहा है और उसे संगीतबद्ध कर सबको सुनाता भी रहा है। पिछली सदी के वरेण्य कवि शैलेंद्र के शब्दों में कहें तो कह सकते हैं - 'काम नए नित गीत बनाना / गीत बनाके जहाँ को सुनाना / कोई ना मिले तो अकेले में गाना।' कुछ वर्ष पहले तक बॉब डिलन के काव्य को जब कोई इंग्लिश कविता के पाठ्यक्रम में शुमार करना चाहता था, तो समीक्षक लोग उसे कवि मानने से ही इनकार कर देते थे। साहित्य का यह नोबेल पुरस्कार उसे कवि के रूप में नहीं, बल्कि 'साहित्यिक कलाकार' के रूप में दिया गया है यानी पिछली सदी में कविता ने जो नए लोकप्रिय संगीत के साथ मिलकर अपने समय को प्रभावित करने का बीड़ा उठाया है, उसी के फलस्वरूप नोबेल समिति को साहित्य के दायरे का विस्तार करना पड़ा है। बॉब डिलन को 'हमारे समय के अंग्रेजी साहित्य का शेक्सपियर' इसलिए कहा जा रहा है कि शेक्सपियर के नाटकों की भाँति ही वह भी अपना काव्य सुनने-सुनाने के लिए लिखता है, न कि पढ़ने के लिए।
    ...यदि कविता को हिमगिरि-शृंखला मान लिया जाए, तो गीत उसका कैलाश शिखर है, जहाँ योगीश्वर शिव का वास है और जहाँ कविता का सर्वांगीण सौंदर्य प्रस्फुटित होता है। प्रारंभ में अंग्रेजी की देखादेखी गीत के कई विभाग किए गए गए। लंबे निबंधात्मक गीतों को प्रगीत नाम दिया गया। संगीत-प्रधान गीतों को गान कहा गया और शब्द-प्रधान गीतों को गीत। फिर 'नई कविता' (अंग्रेजी की न्यू पोयट्री) के अनुसरण में नई कहानी लिखी गई, तब आधुनिक बोध से युक्त गीत 'नवगीत' कहलाए'। कुछ बंधुओं ने 'जनगीत' 'समकालीन गीत' आदि नाम से अपना सिक्का चलाना चाहा, मगर जन-स्वीकृति केवल 'गीत' व 'नवगीत' को ही मिली।
    कवि सम्मेलनों में श्रेष्ठ कविजन इसी नीति से काव्यपाठ करते रहे हैं। मुशायरे में यह बात नहीं है। वहाँ शायर शेर की पहली पंक्ति को इतना खींचते हैं, जैसे अजान दे रहे हों। वैसे भी, शायरों का काव्यपाठ नातिया-कलाम की प्रस्तुति से अत्यधिक प्रभावित होता है, जबकि गीत-कवियों का काव्यपाठ सामान्यतः निर्धारित परिधि में ही होता है। उनके पारंपरिक काव्यपाठ में शब्द और स्वर का अद्भुत संतुलन होता है। आधुनिक हिंदी गीत सांस्कृतिक नवजागरण के दौर में अंग्रेजी लिरिक के अनुसरण में अग्रसर हुआ। यूनान में गिटार-नुमा 'लायर' वाद्ययंत्र पर गाए जानेवाले काव्य को लिरिक कहा गया। हिंदी में वह प्रत्यक्ष संगीतात्मक आधार नहीं रहा, मगर शब्दों में अंतर्निहित ध्वनि-संगीत ने गीत को समाज से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। वैष्णव कवियों के पदों को समाज के बीच लाने में संगीतज्ञ भक्तों की भूमिका उल्लेखनीय रही है। विद्यापति के पदों को संगीतबद्ध करने के लिए मिथिला-नरेश ने अपने दरबारी संगीतकारों को निर्देश दिया था। नवाबों ने वही प्रयत्न गजल की गायकी के लिए किया, जिसका लाभ आज भी गजल विधा को मिल रहा है। इस समय के सुगम संगीत में अधिकतर गायक या तो भजन गाते हैं या गजल पर आ जाते हैं, क्योंकि इन दोनों का रास्ता पहले से बना हुआ है। छायावाद के बाद आनेवाले साहित्यिक गीतों को संगीत-बद्ध करने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया, जिससे वह समाज में संगीत के माध्यम से नहीं जा सका। यह तो कहिए, गीतकारों के शब्दों का वह जादू था कि लोग केवल काव्यपाठ सुनने के लिए कई-कई मील से आते थे और अपने प्रिय कवियों को सुनने के लिए रात-रात भर इंतजार करते थे। काव्यमंचों को ग्लैमर नेपाली, बच्चन, रंग, नीरज, भारत भूषण, सोम ठाकुर जैसे गीतकारों ने दिया, लेकिन उसकी मुनाफा-वसूली हास्य कवि-कलाकारों ने की।
    मूल बात यह है कि यदि इन अर्थवान नए गीतों को संगीतबद्ध कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हवाले किया जाय, तो फिल्मी गीतों के उत्तरोत्तर बढ़ रहे प्रदूषण से थोड़ी मुक्ति मिल सकती है। लेकिन, दृष्टिहीनता के कारण, आज साहित्यिक गीतों को संगीत या अन्य ललित कलाओं से जोड़ने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है, न सरकारी अकादमियों की ओर से, न स्वैच्छिक संस्थाओं की ओर से। अधिक से अधिक यही हुआ है कि विभिन्न गीतकारों ने अपने प्रयास से कुछ सामूहिक गीत संग्रह निकाल दिए हैं। लेकिन, इससे काम नहीं चलने का। कालजयी कविता को सही प्रकार से केंद्र में स्थापित करने के लिए अनेक मोर्चों पर बड़े पैमाने पर काम करने होंगे, वह भी निष्काम भाव से। तभी कीचड़ में फँसी कविता की गाड़ी को बाहर निकाला जा सकता है।
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अवनीश सिंह चौहान
अश्वघोष
आनंद वर्धन
इसाक ‘अश्क’
उदयशंकर सिंह उदय
ओम धीरज
ओम प्रकाश नौटियाल
ओमप्रकाश तिवारी
ओमप्रकाश सिंह
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गुलाब सिंह
जगदीश व्योम
जगदीश श्रीवास्तव
जय चक्रवर्ती
जयकृष्ण राय तुषार
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निर्मल शुक्ल
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मधु प्रसाद
मधु शुक्ला
मधुकर अस्थाना
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ISSN 2394-6687

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