आइए पढ़ते हैं : रवींद्रनाथ टैगोर का उपन्यास :: आँख की किरकिरी
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार - 2017 (4 अगस्त 2017), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

बच्चे धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं
अच्युतानंद मिश्र

(अमेरिकी युद्धों में मारे गए, यतीम और जिहादी बना दिए गए उन असंख्य बच्चों के नाम)

सच के छूने से पहले
झूठ ने निगल लिया उन्हें

नन्हें हाथ
जिन्हें खिलौनों से उलझना था
खेतों में बम के टुकड़े चुन रहे हैं

वे हँसते हैं
और एक सुलगता हुआ
बम फूट जाता है

कितनी सहज है मृत्यु यहाँ
एक खिलौने की चाभी
टूटने से भी अधिक सहज
और जीवन, वह घूम रहा है
एक पहाड़ से रेतीले विस्तार की तरफ

धूल उड़ रही है

वे टेंट से बाहर निकलते हैं
युद्ध का अट्ठासिवाँ दिन
और युद्ध की रफ्तार
इतनी धीमी इतनी सुस्त
कि एक युग बीत गया

अब थोड़े से बच्चे
बचे रह गए हैं

फिर भी युद्ध लड़ा जाएगा
यह धर्म युद्ध है

बच्चे धर्म की तरफ हैं
और वे युद्ध की तरफ

सब एक दूसरे को मार देंगे
धर्म के खिलाफ खड़ा होगा युद्ध
और सिर्फ युद्ध जीतेगा

लेकिन तब तक
सिर्फ रात है यहाँ
कभी-कभी चमक उठता है आकाश
कभी-कभी रोशनी की एक फुहार
उनके बगल से गुजर जाती है
लेकिन रात और
पृथ्वी की सबसे भीषण रात
बारूद बर्फ और कीचड़ से लिथड़ी रात
और मृत्यु की असंख्य चीखों से भरी रात
पीप, खून और मांस के लोथड़ो वाली रात
अब आकार लेती है

वे दर्द और अंधकार से लौटते हैं
भूख की तरफ

भूख और सिर्फ भूख
बच्चे रोटी के टुकड़ों को नोच रहे हैं
और वे इनसानी जिस्मों को

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दस कहानियाँ
ज़किया ज़ुबैरी

हिंदी के जिन कथाकारों ने प्रवासी जीवन को अपनी रचनात्मकता का विषय बनाया है उनमें ज़किया ज़ुबैरी का प्रमुख स्थान है। यहाँ उनकी दस चर्चित कहानियाँ - कच्चा गोश्त, ढीठ मुस्कुराहटें..., बेचारी ईडियट...!, बस एक कदम..., बाबुल मोरा..., मेरे हिस्से की धूप, साँकल, सीप में बंद घुटन..., हरी दूब की कच्ची सुगंध और मारिया दी जा रही हैं। यह कहानियाँ लेखक की रचनात्मकता और कथा कौशल का बखूबी पता देती हैं। इन कहानियों में पूरब और पश्चिम की संस्कृति और जीवन-मूल्यों का द्वंद्व तो है ही पर इससे अधिक यह कहानियाँ पश्चिमी मूल्यों और आधुनिक दृष्टि को लेकर अपनाए गए एक बेशर्म अवसरवाद का भी पता देती हैं। इन कहानियों के अनेक पुरुष चरित्र अपने लिए तो पश्चिमी मूल्यों और तद्जनित आजादी की बात करते हैं पर स्त्रियों को लेकर उनका विचार और व्यवहार बेहद पिछड़ा है। इन कहानियों से गुजरना इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कहानियाँ प्रवासी स्त्रियों की स्थिति और पीड़ा को पूरी सघनता के साथ स्वर देती हैं। हमें उम्मीद है कि यह कहानियाँ पाठकों को अपनी सी लगेंगी और उनके भीतर एक जरूरी तोड़-फोड़ को अंजाम देंगी।

निबंध
प्रयाग शुक्ल
पंख, पंखुड़ियाँ, तितलियाँ, वृक्ष...

विशेष
रोहिणी अग्रवाल
साहित्य की स्त्री दृष्टि

विमर्श
सुप्रिया पाठक
राष्ट्र, आख्यान एवं राष्ट्रवाद की परिधि में जेंडर के प्रश्न
रणेंद्र
आंतरिक उपनिवेशवाद : उपेक्षा की मार और मुंडा भाषा परिवार

देशांतर
कहानी
अंतोन चेखव
दुख
कविता
जून जॉर्डन
कविता मेरे अधिकारों के विषय में

कविताएँ
घनश्याम कुमार देवांश

कुछ और कहानियाँ
हरी चरण प्रकाश
चींटियों की आवाज
पहली पंक्ति के पीछे
सिनीवाली शर्मा
चलिए अब...
हंस अकेला रोया

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ISSN 2394-6687

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