आइए पढ़ते हैं : ज्ञानेंद्रपति की कविताएँ
भाषांतर इस पखवारे (13 जून 2017) संपादकीय परिवार
कविताएँ
लाल सिंह दिल

प्रवासी मजदूर

प्रवासी मजदूर हैया हैया
का गीत अलापते
मोटा तार खींचते
एक साथ जोर लगाने के लिए वे
गीत-सा गाते
पास से नीले शाल वाली मक्खनी लड़की
हँसती-हँसती गुजरती है।

दूरी

ये रास्ते धरती और मंगल के नहीं
जिन्हें राकेट नाप सकते हैं
ना यह रास्ते
दिल्ली और मास्को या वाशिंगटन के हैं
जिनको आप रोज नापते हैं
यह दूरी
जो हमारे और तुम्हारे बीच है
तीरों के नापने की है।

नाच

जब मजदूरिन तवे पर
दिल को पकाती है
चाँद शीशम के बीच से हँसता है
बालक छोटे को बाप
बैठकर बहलाता है
कटोरी बजाता है
और बालक जब दूसरा बड़ा
करधनी का घुँघरू बजाता है
और नाचता है
ये गीत नहीं मरते
ना ही दिलों से नाच मरते हैं।

भारतीय संस्कृति

कोई संस्कृति नहीं
सिर्फ एक भारतीय संस्कृति।
शेष सब नदियाँ
इसी सागर में
आ मिलती हैं।
हाथी के पाँव में
सबके पाँव आ जाते हैं।
डाकुओं की संस्कृति
भारतीय संस्कृति नहीं है।

बाबुल तेरे खेतों में

बाबुल तेरे खेतों में
कभी-कभी मैं नाच उठती हूँ
हवा के झोंके की तरह
यूँ ही भूल जाती हूँ
कि खेत तो हमारे नहीं रहे
कुछ दिन का टिकने का बहाना
मुकदमा हार बैठे हैं
पैसे की कमी से
स्लीपर टूट चुके हैं
भरवड़ा उग आया है
बाबुल तेरे खेतों में
ट्रैक्टर दौड़ेंगे किसी दिन
बाबुल तेरे खेतों में।

दस निबंध
हजारी प्रसाद द्विवेदी

लेकिन मेरे मानने-न-मानने से होता क्‍या है? ईसवी सन के आरंभ के आस-पास अशोक का शानदार पुष्‍प भारतीय धर्म, साहित्‍य और शिल्‍प में अद्भुत महिमा के साथ आया था। उसी समय शताब्दियों के परिचित यक्षों और गंधर्वों ने भारतीय धर्म साधना को एकदम नवीन रूप में बदल दिया था। पंडितों ने शायद ठीक ही सुझाया है कि गंधर्व और कंदर्प वस्‍तुतः एक ही शब्‍द के भिन्‍न-भिन्‍न उच्‍चारण हैं। कंदर्प देवता ने यदि अशोक को चुना है तो यह निश्चित रूप से एक आर्येतर सभ्‍यता की देन है। इन आर्येतर जातियों के उपास्‍य वरुण थे, कुबेर थे, बज्रपाणि यक्षपति थे। कंदर्प कामदेवता का नाम हो गया है, तथापि है वह गंधर्व का ही पर्याय। शिव से भिड़ने जाकर एक बार यह पिट चुके थे, विष्‍णु से डरते रहते थे और बुद्धदेव से भी टक्‍कर लेकर लौट आए थे। लेकिन कंदर्प देवता हार माननेवाले जीव न थे। बार-बार हारने पर भी वह झुके नहीं। नए-नए अस्‍त्रों का प्रयोग करते रहे। अशोक शायद अंतिम अस्‍त्र था। बौद्ध धर्म को इस नए अस्‍त्र से उन्‍होंने घायल कर दिया, शैवमार्ग को अभिभूत कर दिया और शक्ति साधना को झुका दिया। वज्रयान इसका सबूत है, कौल साधना इसका प्रमाण है और कापालिक मत इसका गवाह है। (अशोक के फूल)

व्याख्यान
गगन गिल
इक्कीसवीं शताब्दी में कविता

लंबी कहानी
योगेंद्र आहूजा
मनाना

कहानियाँ
दिनेश भट्ट
मुआवजा
दुबे जी की ईमानदारी
 अंतिम बूढ़े का लॉफ्टर डे
 
आलोचना
पल्लव

सौ वरियाँ दा जीवणा
(भीष्म साहनी की आत्मकथा ‘आज के अतीत’ पर एकाग्र)

विशेष
पीयूष कुमार द्विवेदी
उपन्यासों में बनारस

यात्रा संस्मरण
संतोष श्रीवास्तव
अब वे कैसे कहेंगे ‘पथिक फिर आना’

कविताएँ
मणि मोहन
भारती सिंह

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
प्रो. आनंद वर्धन शर्मा
फोन - 07152 - 252148
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समन्वयक
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ISSN 2394-6687

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