आइए पढ़ते हैं : महेंद्र भल्ला की कहानियाँ
देशांतर इस पखवारे कविता


जर्मन कविताएँ

अनुवाद : प्रतिभा उपाध्याय

हितार्थ
गोएथे

कवियों को नहीं पसंद चुप रहना,
चाहते हैं वे भीड़ दिखाना,
हाँ, होनी चाहिए तारीफ और आलोचना
मानता नहीं कोई गद्य में,
तथापि भरोसा करते हैं हम अक्सर एकांत में,
खयालों में शांत उपवन में।
यही गलत किया मैंने, यही प्रयास किया मैंने,
इसी पीड़ा को भोगा मैंने और इसे जिया मैंने,
यहाँ सिर्फ फूल हैं गुलदस्ते में;
और बुढ़ापा जवानी की तरह,
और अवगुण सद्गुण की तरह,
छोड़ देता है स्वयं इन्हें गीतों में।

जब नाजी कम्युनिस्टों को खा गए
मार्टिन नीम्योलर

जब नाजी कम्युनिस्टों को खा गए,
मैं चुप रहा; क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था।
जब उन्होंने सामाजिक लोकतंत्रवादियों को कैद किया,
मैं चुप रहा; क्योंकि मैं सामाजिक लोकतंत्रवादी नहीं था।
जब वे मजदूर संघों पर झपटे,
मैंने कोई विरोध नहीं किया, क्योंकि मैं मजदूर संघवादी नहीं था।
जब वे यहूदियों को खा गए,
मैंने कोई विरोध नहीं किया; क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।
जब वे मुझे खाने आए,
तब विरोध करने के लिए कोई बचा ही नहीं था।

कोहरे में
हरमन हेस्से

अनूठा है कोहरे में भटकना !
अकेला है हर झाड़ और पत्थर,
कोई पेड़ नहीं देखता किसी दूसरे को,
हर कोई अकेला है।
मित्रों से भरा था मेरा संसार,
जब रोशन था मेरा जीवन,
अब जब कोहरा छा रहा है,
कोई प्रकट नहीं होता।
सच में, कोई नहीं है समझदार,
नहीं जानता है अँधेरे को,
अँधेरा अपरिहार्य और निस्तब्ध है
यह उसे सबसे अलग करता है।
अनूठा है कोहरे में भटकना,
एकाकी होना ही जीवन है,
नहीं जानता कोई आदमी दूसरे को,
हर कोई अकेला है।

कम और अधिक
क्लेमेन्स ब्रेतानो

सोचो कम, सुनो अधिक;
बोलो कम, देखो अधिक;
सिखाओ कम, सीखो अधिक;
लिखो कम, पढ़ो अधिक;
कम पर रखो भरोसा, प्रयास करो अधिक;
झगड़ो कम, सहन करो अधिक;
ललचाओ कम, अनुभव करो अधिक;
आशा करो कम, पाओ अधिक;
घृणा करो कम, प्यार करो अधिक;
चिढ़ो कम, प्रसन्न हो अधिक;
उपहास करो कम, शांत रहो अधिक;
दुख दो कम, सांत्वना दो अधिक;
निष्कर्ष निकालो कम, विचार करो अधिक;
आदेश दो कम, काम करो अधिक


कविताएँ
उदय प्रकाश

जब सारी सत्ताएँ साथ छोड़ जाती हैं, या उनके फैसलों का शोर चारों ओर गूँज रहा होता है, तो वह कविता ही है, जहाँ अपनी आवाज साफ सुनाई देती है। कविता कभी भी, पराजय, विध्वंस, आत्महीनता और गहरे दुखों के पल में भी हाथ और साथ नहीं छोड़ती। वह एक ऐसे निरापद दिक-काल का निर्माण करती है, जहाँ पूँजी से लेकर राजनीति, धर्म, नस्ल, जाति, मास-मीडिया और तकनीक की तमाम संगठित सत्ताओं की हिंसा और अन्याय के विरुद्ध किसी वंचना या विराग में डूबा एक गरीब या फकीर अपना कोई सबसे मानवीय, नैतिक और पवित्र फैसला सुनाता है। दिक और काल, समय और यथार्थ, निजता और समूह, व्यक्ति और सत्ता-प्रणालियों के बारे में कोई धीमा, मंद, निजी निर्णय। एक ऐसा अस्फुट एकालाप, जो बहुत करीब से, ध्यान लगाकर ही सुना जा सकता है। (उदय प्रकाश)

कहानियाँ
मनोहर श्याम जोशी
उसका बिस्तर
सृंजय
माप
प्रभात रंजन
हिडेन फैक्ट
आशुतोष
पिता का नाच
शेषनाथ पांडेय
चादर

नाटक
भिखारी ठाकुर
गबरघिचोर

काव्य परंपरा
रोहिणी अग्रवाल
'बरजी मैं काही की नाहिं रहूँ'

1857
अर्नेस्ट जोन्स
हिंदुस्तान का संघर्ष
रामकृष्ण पांडेय
1857 और विष्णुभट्ट गोडसे

विशेष
राजकुमार
पंचायत का सपना

हमारी हिंदी
बसंत त्रिपाठी
राष्ट्रभाषा हिंदी और डॉ. अंबेडकर
राजकिशोर
हिंदी के क्रियोलीकरण के विरुद्ध

सिनेमा
रमा
‘स्त्री-अस्मिता’ के नाम रहा हिंदी सिनेमा का वर्ष-2014

बाल साहित्य - नाटक
मनोहर चमोली ‘मनु’
जंगल में स्कूल नहीं

कविताएँ - भाषांतर
सुकृता पाल कुमार


पूर्णिमा का चाँद
शमशेर बहादुर सिंह

चाँद निकला बादलों से पूर्णिमा का।
             गल रहा है आसमान।
एक दरिया उमड़ कर पीले गुलाबों का
            चूमता है बादलों के झिलमिलाते
स्‍वप्न जैसे पाँव।

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ISSN 2394-6687

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