आइए पढ़ते हैं : कुँवर नारायण की कविताएँ
बाल साहित्‍य इस पखवारे (14 जुलाई 2017) संपादकीय परिवार

क्यों?
सोहनलाल द्विवेदी

१.
क्यों बच्चों को नहीं सुहाता,
पढ़ना-लिखना, शाला जाना?
खेल-कूद में मन लगता,
दिन भर घर में धूम मचाना?
क्यों भाती मन को रंगरेली?
सुलझाए यह कौन पहेली?

२.
क्यों पतंग उड़ती है ऊपर?
क्यों न कभी नीचे को आती?
और गेंद फेंको जो ऊपर,
तो वह फौरन नीचे आती,
चोट लगाते ठेला-ठेली,
सुलझाए यह कौन पहेली?

३.
क्यों मेंढक पानी में रहते?
टर्रटों-टर्रटों गाना गाते,
क्यों न घोंसले में चढ़कर के
वे चिड़ियों को मार भागते?
जल में ही करते अठखेली,
सुलझाए यह कौन पहेली?

४.
क्यों कोल्हू जब बैल चलाता,
उसकी आँख बंद की जाती?
तिल में से न कढ़ता है,
कितनी ही वह पेरी जाती,
कब मन में खुश होता तेली?
सुलझाए यह कौन पहेली?

५.
क्यों स्याही होती है काली?
क्यों काला कागज न दिखाता
रंग-बिरंगी तस्वीरें लाख,
हरा-भरा मन है बन जाता,
क्यों भाते हैं सखा-सहेली?
सुलझाए यह कौन पहेली?

६.
नहीं मदरसे अच्छे लगते,
भाता है छुट्टी का घंटा।
मजा न चुप रहने में मिलता,
मजा तभी जब बजता टंटा।
अच्छी लगती ठेलमठेली।
सुलझाए यह कौन पहेली?

७.
चाचाजी क्यों दाढ़ी रखते,
बच्चों के मूँछें न दिखतीं?
क्यों चाची कंघी करती है,
अम्माँ अंजन रोज लगाती?
गुरु को भाते चेला-चेली,
सुलझाए यह कौन पहेली?

८.
क्यों चींटी बिल में रहती है,
क्यों इनको है शक्कर भाती,
पानी में शक्कर डालो तो,
पल भर में वह घुल-मिल जाती,

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दस कहानियाँ
निर्मल वर्मा

निर्मल वर्मा की कहानियाँ हमारे भीतर खुलती हैं। ये कैसे खुलती हैं भीतर? शायद इस तरह कि वे हमें भीतर जाने को कहती हैं। हम बहुत भीतर अपने जिस मन को जानते हैं, वह दुख का मन है। सुख को सपने की तरह जानता हुआ - दुख का मन। निर्मल वर्मा की कहानियों में यह दुख है। एक वयस्क जिंदगी का दुख और उसका अकेलापन। ऐसा बीहड़ अकेलापन, जिसमें लोगों के साथ होने, उनका बने रहने तक की, व्याकुल इच्छाएँ हैं, लेकिन उन इच्छाओं को लीलता हुआ अकेलापन है, एक व्यक्ति का अकेलापन। बेशक इस व्यक्ति का वर्ग भी है लेकिन अनुभव एक विशेष व्यक्ति का है, वर्ग को धारण करनेवाले किसी साहित्यिक सूत्र का नहीं। यह सच्चा और खरा दुख ही है, जो निर्मल वर्मा की कहानियों के संसार का मानवीकरण करता है। उन्हें हमसे जोड़ता है। और हम उन कहानियों को पढ़कर जानते भर नहीं हैं। उनके साथ होते हैं। निर्मल वर्मा से जुड़ते हैं। - प्रभात त्रिपाठी

व्‍याख्‍यान
गगन गिल
शिमला और निर्मल

लंबी कविताएँ
नरेश सक्सेना
चंबल एक नदी का नाम
हरप्रीत कौर
दंतकथाओं में खोए बच्चों की अ-कथा

विशेष
कौशलेंद्र प्रपन्न
तक्सीम की पीड़ा और अतीतीय संवेदना
मनोज कुमार राय
मरजीवा गांधी

आलोचना
जय कौशल
कहानियों में शमशेर
पंकज कुमार
हंसराज रहबर के कथा साहित्य में वर्गीय चेतना
कँवलजीत कौर
‘मैला आँचल’ में ग्रामीण जीवन का यथार्थ और समाजवादी चेतना

व्यंग्य
प्रेम जनमेजय
मोची भया उदास
लक्ष्मी, कहाँ कैद हैं!

देशांतर - कहानी
ख़ालिद फ़रहाद धारीवाल
मांस, मिट्टी और माया

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
प्रो. आनंद वर्धन शर्मा
फोन - 07152 - 252148
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समन्वयक
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फोन - 09970244359
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ISSN 2394-6687

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