आइए पढ़ते हैं : इवान तुर्गनेव का उपन्यास :: स्वाभिमानी
कवि-परंपरा इस पखवारे भाषांतर
 

सॉनेट
त्रिलोचन

उस जनपद का कवि हूँ

उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है,
नंगा है, अनजान है, कला - नहीं जानता
कैसी होती है क्या है, वह नहीं मानता
कविता कुछ भी दे सकती है। कब सूखा है
उसके जीवन का सोता, इतिहास ही बता
सकता है। वह उदासीन बिलकुल अपने से,
अपने समाज से है; दुनिया को सपने से
अलग नहीं मानता, उसे कुछ भी नहीं पता
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची; अब समाज में
वे विचार रह गए नही हैं जिन को ढोता
चला जा रहा है वह, अपने आँसू बोता
विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण
सुन पढ़ कर, जपता है नारायण नारायण।

तुलसी बाबा

तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुमसे सीखी
मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो।
कह सकते थे तुम सब कड़वी, मीठी तीखी।
प्रखर काल की धारा पर तुम जमे हुए हो।
और वृक्ष गिर गए मगर तुम थमे हुए हो।
कभी राम से अपना कुछ भी नहीं दुराया,
देखा, तुम उन के चरणों पर नमे हुए हो।
विश्व बदर था हाथ तुम्हारे उक्त फुराया,
तेज तुम्हारा था कि अमंगल वृक्ष झुराया,
मंगल का तरु उगा; देख कर उसकी छाया,
विघ्न विपद के घन सरके, मुँह नहीं चुराया।
आठों पहर राम के रहे, राम-गुन गाया।
यज्ञ रहा, तप रहा तुम्हारा जीवन भू पर।
भक्त हुए, उठ गए राम से भी, यों ऊपर।

एक विरोधाभास त्रिलोचन है

एक विरोधाभास त्रिलोचन है। मैं उसका
रंग-ढंग देखता रहा हूँ। बात कुछ नई
नहीं मिली है। घोर निराशा में भी मुसका
कर बोला, कुछ बात नहीं है अभी तो कई
और तमाशे मैं देखूँगा। मेरी छाती
वज्र की बनी है, प्रहार हो, फिर प्रहार हो,
बस न कहूँगा। अधीरता है मुझे न' भाती
दुख की चढ़ी नदी का स्वाभाविक उतार हो।
संवत पर संवत बीते, वह कहीं न टिहटा,
पाँवों में चक्कर था। द्रवित देखने वाले
थे। परास्त हो यहाँ से हटा, वहाँ से हटा,
खुश थे जलते घर से हाथ सेंकने वाले।
औरों का दुख दर्द वह नहीं सह पाता है।
यथाशक्ति जितना बनता है कर जाता है।

आरर-डाल

सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई,
झूठ क्या कहूँ। पूरे दिन मशीन पर खटना,
बासे पर आकर पड़ जाना और कमाई
का हिसाब जोड़ना, बराबर चित्त उचटना।
इस उस पर मन दौड़ाना। फिर उठ कर रोटी
करना। कभी नमक से कभी साग से खाना।
आरर डाल नौकरी है। यह बिल्कुल खोटी
है। इसका कुछ ठीक नहीं है आना-जाना।
आए दिन की बात है। वहाँ टोटा-टोटा
छोड़ और क्या था। किस दिन क्या बेचा-कीना।
कमी अपार कमी का ही था अपना कोटा,
नित्य कुँआ खोदना तब कहीं पानी पीना।
धीरज धरो आज कल करते तब आऊँगा,
जब देखूँगा अपने पुर कुछ कर पाऊँगा।

आलोचक

कभी त्रिलोचन के हाथों में पैसा धेला
टिका नहीं। कैसे वह चाय और पानी का
करता बंदोबस्त। रहा ठूँठ-सा अकेला।
मित्र बनाए नहीं। भला इस नादानी का
कुफल भोगता कौन। यहाँ तो जिसने जिसका
खाया, उसने उसका गाया। जड़ मृदंग भी
मुखलेपों से मधुर ध्वनि करता है। किसका
बस है इसे उलट दे। चाहो रहे रंग भी
हल्दी लगे न फिटकरी, कहाँ हो सकता है।
अमुक-अमुक कवि ने जमकर जलपान कराया,
आलोचक दल कीर्तिगान में कब थकता है।
दूध दुहेगा, जिसने अच्छी तरह चराया।
आलोचक है नया पुरोहित उसे खिलाओ
सकल कवि-यशःप्रार्थी, देकर मिलो मिलाओ।

गद्य-वद्य कुछ लिखा करो

गद्य-वद्य कुछ लिखा करो। कविता में क्या है।
आलोचना जगेगी। आलोचक का दरजा -
मानो शेर जंगली सन्नाटे में गर्जा
ऐसा कुछ है। लोग सहमते हैं। पाया है
इतना रुतबा कहाँ किसी ने कभी। इसलिए
आलोचना लिखो। शर्मा ने स्वयं अकेले
बड़े-बड़े दिग्गज ही नहीं, हिमालय ठेले,
शक्ति और कौशल के कई प्रमाण दे दिए;
उद्यम करके कोलतार ले ले कर पोता,
बड़े बड़े कवियों की मुख छवि लुप्त हो गई,
गली गली मे उनके स्वर की गूँज खो गई,
लोग भुनभुनाए घर में इस से क्या होता !
रुख देख कर समीक्षा का अब मैं हूँ हामी,
कोई लिखा करे कुछ, अब जल्दी होगा नामी।


उन्नीसवीं सदी का भारतीय पुनर्जागरण : यथार्थ या मिथका मिथक
नामवर सिंह

यदि रेनेसाँ मिथ्या है तो इतिहास क्या है? जब हम इसके स्वाभाविक तत्वों को देखें तो क्या हम इस जागरण को इतिहास कहें? आप जानते हैं कि वास्तविक इतिहास को देखना इतना क्यों महत्वपूर्ण है। यदि इन दिनों इतना अधिक नारी उत्थान हो गया है, तो गुजरात, कश्मीर और दिल्ली में क्यों बलात्कार की इतनी अधिक घटनाएँ घट रही हैं? यदि हम हिंदू-मुस्लिम के बीच भाईचारे को लेकर इतने अच्छे थे, तो क्यों आज दंगों में निर्दयतापूर्वक एक-दूसरे की जान लेते हैं? उन दिनों यदि हमने वास्तव में जातीयता को त्याग दिया था, तो दलितों पर अन्याय क्यों किए गए? यदि राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध कठोर कानून पारित करवाया था, तो बीसवीं शताब्दी में राजस्थान के देवराला में रूपकुँवर सती की घटना क्यों हुई? उन्नीसवीं शताब्दी में ही यदि हम सभी समस्याओं का समाधान कर चुके थे तो भारत जैसा था वैसा ही क्यों रह गया? गांधीजी को इतना कठिन परिश्रम क्यों करना पड़ा? यदि क्रांति के द्वारा हम अँग्रेजों को खदेड़ना चाहते थे, तो फिर से गुलाम क्यों बन गए? 1857 के बाद लंबे समय तक हम पराधीन रहे, यहाँ तक अपने अधिकारों की तरह 1947 में भी हम स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सके और हमें मात्र शक्ति के स्थानांतरण मात्र पर संतोष करना पड़ा। यह सभी परिलक्षित करते हैं कि 1857 में हमने कोई असाधारण क्रांति नहीं की थी।

आलोचना
पंकज पराशर
वे मारे गए पर हत्यारा कोई नहीं
(अरुण कमल की कविताओं पर कुछ नोट्स)
अभिजीत सिंह
कला और वेदना के रोमानी कथाकार : निर्मल वर्मा

निबंध
गिरीश्वर मिश्र
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बाजार का तिलिस्म और हमारा बदलता स्वभाव

विशेष
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विमर्श
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नवजागरण के दलित प्रश्न : ज्योतिबा फुले और प्रेमचंद की दृष्टि

पर्यावरण
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इक्कीसवीं सदी का पर्यावरण - खतरे में जीवन
उमेश चतुर्वेदी
अपनी तरफ ध्यान बँटाने के लिए नदी तोड़ती है तटबंध
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जन-आंदोलन एवं गांधी दृष्टि

दस कहानियाँ
स्वयं प्रकाश
पिताजी का समय
राजेंद्र लहरिया
यहाँ कुछ लोग थे
अनवर सुहैल
नसीबन
स्वाति तिवारी
प्रायश्चित
गीताश्री
सोनमछरी
विपिन कुमार शर्मा
गिलोटीन
आशुतोष
दादी का कमरा
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पत्थरों के मन में क्या है!
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जमीन का टुकड़ा
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घर

कविताएँ
शंकरानंद
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प्रतिभा गोटीवाले
वाज़दा ख़ान
कुमार अनुपम


कबंध
प्रीतिधारा सामल

अपमान की आग पी कर धू-धू जलती आत्मा
वह केवल,
वयहीन, अस्तित्वहीन
प्राणहीन, मनहीन, परिचयहीन
मांस पिंड में योनि का कबंध
उसकी वय कितनी ?
सात या सत्तर? पूछने की जरूरत नहीं
तुम्हारे सुख के लिए उसकी देह ही यथेष्ट है
वह अकेली प्रतिध्वनि बनकर
धक्के खाती रहे पहाड़ की छाती पर
सूनी रुलाई बन झूलती रहे
मशान के बरगद की डाल पर,
जंगल की आग बन खुद को जलाते-जलाते
पवित्र करती रहे स्वयं को,
तुम्हारा कुछ आता-जाता नहीं
तुम्हारे खून की नदी नहीं, वह मांस का पिंड
यंत्रणा का लाक्षागृह नहीं उसकी योनि,
युग-युग का मौन ही उसकी सामर्थ्य
अंतर में भरी घृणा विद्वेष उसका अस्त्र
अब की वह हाथ जोड़, पाँव पकड़
कृपा नहीं माँगेगी किसी के,
धर्षिता की चिता से खोजेगी नहीं अधिकार
फिर एक बार ग्रीवा, वक्ष, नाभि, कमर, पाद
ले कर वह खड़ी होगी
संपूर्ण उलंग,
उसके आमंत्रण में हतवाक महिषासुर
मरेगा,
जरूर मरेगा

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ISSN 2394-6687

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