आइए पढ़ते हैं : हरिशंकर परसाई के व्यंग्य
देशांतर इस हफ्ते विशेष

खामोशी
एडगर ऐलन पो

'मेरी बात सुनो,' शैतान ने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए कहा, 'जिस जगह की मैं बात कर रहा हूँ, वह लीबिया का निर्जन इलाका है - जेअर नदी के तट के साथ-साथ, और वहाँ न तो शांति है, न खामोशी। नदी का पानी भूरा मटमैला है। वह सागर की ओर नहीं बहता, बल्कि सूरज की लाल आँखों के नीचे एक ही जगह पर उबलता रहता है। नदी के कोमल तटों पर मीलों तक पीले कमलों का रेगिस्तान फैला है - ये कमल दैत्याकार हैं। वे उस एकाकीपन में एक-दूसरे पर झुके आहें भरते रहते हैं और अपनी लंबी और भूतों की-सी गरदनें आसमान की ओर फैलाए रहते हैं, और सिर हिलाते रहते हैं। उनके हिलने से एक मद्धिम-सी ध्वनि बराबर उठती रहती है।'

'पर उनके राज्य की भी सीमा है - अँधेरे, भयावह, ऊँचे-ऊँचे जंगलों की सीमा। वहाँ, छोटे पौधे हमेशा हिलते रहते हैं। लेकिन पूरे स्वर्ग में हवा नहीं चलती। और ऊँचे आदिम पेड़ तीखी आवाजें करते हुए इधर-उधर झूमते रहते हैं और उनकी ऊँची चोटियों से चिरंतन ओस कण बूँद-बूँद कर टपकते रहते हैं। जड़ों के पास अजीब जहरीले फूल कष्टमय निद्रा में कराहते रहते हैं। और ऊपर भूरे बादल, तीखे शोर के साथ, हमेशा पश्चिम की ओर भागते रहते हैं। लेकिन पूरे स्वर्ग में हवा नहीं चलती।'

'रात और बारिश। पड़ रही थी, तो बारिश थी, पड़ चुकी, तो खून था और मैं ऊँचे कमलों के बीच खड़ा था और बारिश मेरे सिर पर पड़ रही थी। और निर्जनता में कमल आहें भर रहे थे।'

'और अचानक भीनी धुंध में से चाँद निकल आया - लाल-लाल चाँद। मेरी नजर नदी के तट पर की एक भूरी, बड़ी चट्टान पर पड़ी - उसके सामने वाले भाग पर कुछ अक्षर खुदे हुए थे। मैं कमलों के बीच चलने लगा और किनारे के निकट आ गया। पर मैं अक्षर पढ़ नहीं सका। मैं वापस लौट रहा था कि चाँद पूरी लालिमा के साथ चमक उठा। मैंने चट्टान को देखा उस पर लिखा था - बयाबान।'

'और मैंने ऊपर की ओर देखा। चट्टान की चोटी पर एक आदमी खड़ा था। यह देखने के लिए कि वह क्या करता है, मैंने अपने आपको कमलों के पीछे छुपा लिया। वह आदमी कद में लंबा-ऊँचा था और कंधों से लेकर पाँवों तक रोमन चोंगे में लिपटा हुआ था। उसके अंगों की रेखाएँ अस्पष्ट थीं। लेकिन उसका चेहरा किसी दैवी पुरुष का-सा था। उसका माथा चौड़ा था, उसकी आँखों में परेशानी थी। उसके गालों पर पड़ी कुछ झुर्रियों ने ही मुझे अनेक गाथाएँ सुना दीं - वैसे वह बेचैन था और एकांत चाहता था।

'तब उसने आसमान से अपनी नजरें हटा लीं और उसने मरुभूमि की नदी जेअर और उसके पीले पानी को देखा। फिर उसने मुरझाए कमलों के विस्तार पर नजर डाली। तब उसने कमलों की आहों की ओर कान लगाया। और मैं छुपा-छुपा सब कुछ देखता रहा।

'तब मैं कमलों के बीच, नीचे छुपकर चलने लगा और कमलों के उस जंगल में आगे बढ़ता गया और मैंने वहाँ रहनेवाले हिप्पो पोटेमसों को बुलाया। उन्होंने मेरी आवाज सुनी और आ गए और चाँद के नीचे तीखी आवाज में गुर्राने लगे... वह दैवी पुरुष तब भी चट्टान पर बैठा रहा... अपने एकांत में काँपता।

'तब मैंने पंच तत्वों को तूफान का शाप दे दिया। और जहाँ पहले हवा भी नहीं चल रही थी, वहाँ अब तूफानी हवाएँ एकत्र होने लगीं। आसमान तूफानी हवाओं से हहराने लगा - और उस पुरुष के सिर पर बारिश की बूँदें गिरने लगीं - और नदी में बाढ़ आ गई - ? और नदी में झाग उठने लगा - और कमल जोर-जोर से चीखने लगे - और हवा की तेजी के आगे जंगल धराशायी होने लगा - तूफान बढ़ता गया - बिजली गिरने लगी - और चट्टान अपनी नींव तक दहल गई। और मैं छुपा-छुपा उस पुरुष को देखता रहा। वह अपने एकांत में काँप रहा था। रात बीतती गई। वह चट्टान पर बैठा रहा।

'तब मुझे गुस्सा आ गया और मैंने फिर शाप दे दिया - नदी को, कमलों को, हवा को, जंगल को, आसमान को, तूफान को, कमलों की आहों को - सबको खामोशी का शाप। वे अभिशप्त हुए और खामोश हो गए। चाँद ने आसमान में ऊपर चढ़ना छोड़ दिया - तूफान मर गया - बिजली थम गई - बादल लटके रह गए - पानी तल पर चला गया और वहीं रुक गया - वृक्षों ने झूलना छोड़ दिया - कमलों की आहें रुक गईं - उनकी आवाजें भी मर गईं - और उस अनंत मरुथल में किसी परछाईं की कोई आवाज नहीं रही। और मैंने चट्टान पर खुदे अक्षरों को देखा। वे बदल गए थे - अब अक्षर यों थे - खामोशी।

'और मेरी नजर उस पुरुष के चेहरे पर गई। उसके चेहरे पर भय की छायाएँ थीं। जल्दी से उसने अपने हाथों से अपने सिर को उठाया और चट्टान पर खड़ा हो गया और सुनने लगा। पर पूरे अनंत विस्तार में कोई स्वर नहीं था और चट्टान पर खुदे हुए अक्षर थे - खामोशी। और पुरुष काँप उठा। उसने मुँह घुमा लिया और तेजी से वहाँ से भाग गया। उसके बाद मैंने उसे नहीं देखा।'

मकबरे की छाँह में बैठकर शैतान ने उस दिन जो कहानी मुझे सुनाई, उसे मैं सबसे आश्चर्यजनक कहानी मानता हूँ। और कहानी का अंत होते ही शैतान मकबरे की दरार में जाकर लेट गया और हँसने लगा। पर मैं शैतान के साथ हँस नहीं सका और क्योंकि मैं हँस नहीं सका, इसलिए उसने मुझे शाप दे दिया।

हिंदुत्व का दर्शन
(विमर्श)
भीमराव आंबेडकर

सवाल पूछा जा सकता है कि इस प्रस्तावित शीर्षक का क्या अर्थ है? क्या 'हिंदू धर्म का दर्शन' और 'धर्म का दर्शन' शीर्षक एक समान है? मेरी इच्छा है कि इसके पक्ष और विपक्ष पर अपने विचार प्रस्तुत करूँ, लेकिन वास्तव में मैं ऐसा नहीं कर सकता। इस विषय पर मैंने बहुत-कुछ पढ़ा है, लेकिन मैं स्वीकार करता हूँ कि मुझे 'धर्म के दर्शन' का स्पष्ट अर्थ अभी तक नहीं मिल पाया है। इसके पीछे शायद दो कारण हो सकते हैं। पहला है कि धर्म एक सीमा तक निश्चित है लेकिन दर्शनशास्त्र में किन-किन बातों का समावेश किया जाए, यह निश्चित नहीं। दूसरे, दर्शन और धर्म परस्पर विरोधी न भी हों, उनमें प्रतिस्पर्धा तो अवश्य ही है, जैसा कि दार्शनिक और अध्यात्मवादी की कहानी से पता चलता है। उस कहानी के अनुसार, दोनों के बीच चल रहे वाद-विवाद के दौरान अध्यात्मवादी ने दार्शनिक पर यह दोषारोपण किया कि वह एक अंधे पुरुष की तरह है, जो अँधेरे कमरे में एक काली बिल्ली को खोज रहा है, जो वहाँ है ही नहीं। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप दार्शनिक ने अध्यात्मवादी पर आरोप लगाया कि वह 'एक ऐसे अंधे व्यक्ति की तरह है, जो अँधेरे कमरे में एक काली बिल्ली को खोज रहा है, जबकि बिल्ली का वहाँ कोई अस्तित्व है ही नहीं, और वह उसे पा लेने की घोषणा करता है।'

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एक कविता-यात्रा बरास्ता एशियन पोएट्स मीट

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प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌
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कविताएँ
कलावंती

सत्य के प्रयोग अथवा
आत्मकथा

(दूसरा भाग)
मोहनदास करमचंद गांधी


पिछले हफ्ते

सत्य के प्रयोग अथवा
आत्मकथा

(पहला भाग)
मोहनदास करमचंद गांधी

इन प्रयोगों के बारे में मैं किसी भी प्रकार की संपूर्णता का दावा नहीं करता। जिस तरह वैज्ञानिक अपने प्रयोग अतिशय नियम-पूर्वक, विचार-पूर्वक और बारीकी से करता है फिर भी उनसे उत्पन्न परिणामों को अंतिम नही कहता, अथवा वे परिणाम सच्चे ही हैं इस बारे में भी वह सशंक नहीं तो तटस्थ अवश्य रहता है, अपने प्रयोगों के विषय में मेरा भी वैसा ही दावा है। मैंने खूब आत्म-निरीक्षण किया है, एक-एक भाव की जाँच की है, उसका पृथक्करण किया है। किंतु उसमें से निकले हुए परिणाम सबके लिए अंतिम ही हैं, वे सच हैं अथवा वे ही सच हैं ऐसा दावा मैं कभी करना नहीं चाहता। हाँ, यह दावा मैं अवश्य करता हूँ कि मेरी दृष्टि से ये सच हैं और इस समय तो अंतिम जैसे ही मालूम पड़ते हैं। अगर न मालूम हों तो मुझे उनके सहारे कोई भी कार्य खड़ा नहीं करना चाहिए। लेकिन मैं तो पग पग पर जिन जिन वस्तुओं को देखता हूँ, उनके त्याज्य और ग्राह्य ऐसे दो भाग कर लेता हूँ और जिन्हें ग्राह्य समझता हूँ उनके अनुसार अपना आचरण बना लेता हूँ। और जब तक इस तरह बना हुआ आचरण मुझे अर्थात मेरी बुद्धि को और आत्मा को संतोष देता है, तब तक मुझे उसके शुभ परिणामों के बारे में अविचलित विश्वास रखना ही चाहिए।

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सुषम बेदी
अमरीका में हिंदी : एक सिंहावलोकन

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सुमित्रानंदन पंत
बापू के प्रति
त्रिलोचन
तुलसी बाबा
काशी का जुलहा
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नागार्जुन

भारतीय लोकतंत्र : वाया सफरेज ऑफ अलवीरा
सविता पाठक

वी.एस. नायपाल का नाम किसी के लिए भी नया नहीं है। त्रिनिदाद एंड टोबैगो में जन्में इस भारतवंशी को साहित्य का नोबल भी मिल चुका है। गोरखपुर के बाँसगाँव तहसील के एक छोटे से गाँव से विदेशी धरती पर विस्थापित उनके पुरखों ने वहाँ भी एक समाज की रचना की। जो काफी कुछ हमारे पूरब के किसी समाज जैसा ही है। उनकी प्रसिद्ध कृति द सफरेज आफ अलवीरा में इसी गाँव में चुनावी हलचलों की एक झलक है। विदेशी धरती पर स्पैनिश और नीग्रो लोगों के साथ भारतवंशियों की आबादी है। देखिए, शायद हमारे वहाँ चलनेवाले चुनावों के नजारे यहाँ भी दिख जाएँ -

'तो क्या हुआ हमें स्पैनिश वोट नहीं देते, हमारे पास तीन हजार हिंदू और एक हजार मुस्लिम वोट हैं। पादरी को तो कुल तीन हजार वोट मिलना है, दो हजार काले लोगों का और एक हजार हिंदुओं का। मुझे नहीं लगता कि हम हारेंगे।' पंडित धनीराम बोले, 'मुझे समझ में नहीं आ रहा कि एक हजार हिंदू वोट पादरी के खाते में कैसे जा रहे हैं। लखरूर तो इतने वोट कंट्रोल नहीं करता।' फोम तुरंत बोल पड़ा, 'ज्यादा माथापच्ची न करो, पादरी ने हिंदू परिवारों की मदद की है। दूसरे, हिंदू जब ये देखेंगे कि लखरूर हिंदू होकर पादरी की मदद कर रहा है तो वे भी उसी को वोट देना चाहेंगे। वैसे लखरूर प्रचार करता फिर रहा है कि लोगों को जाति-धर्म के बारे में नहीं सोचना चाहिए। वो यह भी समझाता है कि हिंदुओं को किसी दूसरे धर्म को वोट देने में कोई बुराई नहीं।'

'उसको तो लतियाए जाने की जरूरत है' बख्श खिसियाकर बोला। चितरंजन सुनार ने हामी भरते हुए जोड़ा कि चुनाव के समय इस तरह की बात बहुत खतरनाक है। लखरूर खुद नहीं जानता कि वह क्या कह रहा है।

हरबंश (प्रत्याशी) अपनी उँगली चटकाते हुए बोला मेरी तकदीर ही ऐसी है। ...पंडित धनीराम ने सिगरेट का एक कश खींचा, धोती थोड़ी ऊपर चढ़ाई और उछल पड़े 'आइडिया'। सब उनकी तरफ पलटे। 'थोड़ा रुपया खर्च करना पड़ेगा। यहाँ एलवीरा में चुनाव प्रचार कमेटी को सोशल वेलफेयर कमेटी की तरह काम करना पड़ेगा। जैसे अगर कोई काला आदमी बीमार पड़ता है तो भागकर उसके यहाँ हम पहुँचें, अपनी टैक्सी में उसको डाक्टर के यहाँ ले जाएँ, उसकी दवा-दारू का इंतजाम करें।' चितरंजन ने फिर दाँत भींचा - धनीराम तुम क्या बात कर रहे हो। तुमको नहीं पता कि ये काले लोग कितने चीमड़ होते हैं। तुमने कभी किसी नीग्रो को बीमार पड़ते देखा है। वो तो बस गिरते हैं और मर जाते हैं। वो भी अस्सी-नब्बे की उमर में। धनीराम बोले - चलो वैसे समझो कि किसी काले आदमी के मरने पर हम क्रिया-कर्म का जिम्मा ले लें। जैसे काफी-बिस्कुट का इंतजाम कर दें। बख्श तुरंत बोला - तुम्हें लगता है कि इससे हमें काले लोग वोट देंगे। धनीराम - दें न दें, कम से कम उन्हें शरम तो आएगी। महादेव तुरंत हाथ नचाकर बोला, बुड्ढा सेबेस्टियन पक्का चुनाव से पहले टपकेगा। फोम ने हामी भरी - हाँ, ये बात पक्की है...।

...चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ लिया। पादरी घर-घर जाकर प्रचार कर रहा था। लखरूर ने अपने भोपे से पूरे जिले को दहला दिया था।

चितरंजन ने करबोडा का फिर से दौरा किया ताकि वोट पक्का कर सके। फोम भी पूरी वफादारी के साथ अपने लाउडस्पीकर वैन के साथ लगा रहा। हरीचंद को भी मनमाँगी मुराद यानी पोस्टर छापने का आर्डर मिल गया। पंडित धनीराम अपनी हर कथा-भागवत में हरबंश को वोट देने के लिए प्रेरित करने लगे। महादेव बूढ़े सेबेस्टियन पर पूरी निगाह गड़ाए रहा। शुक्र है सेबेस्टियन भी दिन ब दिन झुरा रहा था। महादेव उसे कभी पाँच सिलिंग तो कभी दो डालर हर हफ्ते दवा-दारू के लिए दे रहा था। हरबंश ने अब हिंदू बीमारों के यहाँ जाना बंद कर दिया था। वह जब भी एलवीरा आता, सीधे महादेव से ही हिसाब-किताब कर लेता। 'अच्छा बताओ, आज कितने बीमार हैं। और किसको-किसको कितना पैसा देना है।' महादेव तुरंत अपनी छोटी लालरंग की बही निकालकर शुरू हो जाता, 'आज मंगल कुछ ठीक सा नहीं है। उसको दो डालर देने होंगे। लक्ष्मन कह रहा था कि उसके पेट में दर्द है, काफी बड़ा परिवार है उसका, कुल छह वोट हैं उसके घर से, सोचता हूँ उसको दस डालर देना अच्छा होगा, चलो दस न सही तो पाँच पक्का ही। राम अतार भी बेवकूफ बना रहा है, वैसे तो वह इतना मूढ़ है कि कायदे से एक्स तक नहीं बना सकता, उसका वोट पक्का ही बेकार होगा, लेकिन फिर भी उसको एकाध डालर दे दो, इससे तुम्हारा अच्छा प्रचार होगा'

रामलोगन की दारू की दुकान चमक उठी थी। यहाँ हरबंश का दारू का एकाउंट तेजी से बढ़ रहा था। रामलोगन भी हर पीने वाले को बिना कहे-सुने दारू पिलाता था। 'इलेक्शन तो साला एक बार में ही खतम हो जाएगा, मुझे तो सभी के साथ रहना है, क्या फर्क पड़ता है कि कौन किसको वोट देता है' चितरंजन कभी दारू की दुकान में नहीं गया, उसने फोम के साथ मिलकर एक दारू का वाउचर तैयार किया था। जो कि रामलोगन से बदल सके। हरिचंद ने वो वाउचर छापा था...। ...और इस तरह एलवीरा में लोकतंत्र ने अपनी जड़ें जमाई। हरबंश चुनाव जीत गए। पादरी की जमानत जब्त हो गई।

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