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गांधी साहित्य (14 सितंबर 2018), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
मोहनदास करमचंद गांधी

प्रथम खंड : 8. हिंदुस्तानियों ने क्या किया ?

3. इंग्लैंड में कार्य

पाठक पिछले प्रकरणों में यह देख चुके हैं कि हिंदुस्तानी कौम ने अपनी स्थिति को सुधारने के लिए कुछ प्रयत्न किए और अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाई। जिस प्रकार दक्षिण अफ्रीका में कौम ने अपने सारे अंगों का विकास करने का यथाशक्ति प्रयत्न किया, उसी प्रकार हिंदुस्तान और इंग्लैंड से जितनी मदद मिल सकती थी उतनी पाने का प्रयत्न भी उसने किया। हिंदुस्तान के कार्य के बारे में मैं थोड़ा लिख चुका हूँ। अब यह बताना चाहिए कि इंग्लैंड से मदद लेने के बारे में क्या किया गया? सबसे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश कमेटी के साथ संबंध‍ जोड़ना आवश्यक था। इसलिए हिंदुस्तान के दादा श्री दादाभाई नौरोजी को और ब्रिटिश कमेटी के अध्यक्ष सर विलियम वेडरबर्न को सारी घटनाओं का ब्योरेवार वर्णन करने वाले साप्ताहिक पत्र लिखे जाते थे। और जब-जब अरजियों की नकलें वगैरा भेजने का मौका आता तब-तब कमेटी के डाक-खर्च में और सामान्य खर्च में मदद करने के लिए कम से कम 10 पौंड की रकम भेजी जाती थी।

यहाँ मैं दादाभाई नौरोजी का एक पवित्र संस्मरण दे दूँ। दादाभाई ब्रिटिश कमेटी के अध्यक्ष नहीं थे। फिर भी हमने सोचा कि उनके द्वारा ही कमेटी को पैसे भेजना उचित होगा, और वे हमारी ओर से भेजे हुए पैसे कमेटी के अध्यक्ष को दे दें। परंतु पहली ही बार हमने जो पैसे भेजे उन्हें दादाभाई ने लौटा दिया और सुझाया कि कमेटी के नाम के पैसे और पत्र आपको सीधे सर विलियम वेडरबर्न के पास ही भेजने चाहिए। दादाभाई स्वयं तो यथाशक्ति हमारी सहायता करते ही थे, परंतु उनका कहना था कि कमेटी की प्रतिष्ठा तभी बढ़ेगी जब हम सर विलियम वेडरबर्न के द्वारा ही काम लेंगे। मैंने यह भी देखा कि दादाभाई इतने बूढ़े होते हुए भी अपने पत्र-व्यवहार में बड़े नियमित रहते थे। उन्हें कुछ अधिक न लिखना होता तो कम से कम पत्र की पहुँच तो वे लॉटरी डाक से भेज ही देते थे और उसमें प्रोत्साहन की एक पंक्ति अवश्य रहती थी। ऐसे पत्र भी वे स्वयं ही लिखते थे और उनकी नकल अपनी टिश्यु-पेपर बुक में कर लेते थे।

पिछले एक प्रकरण मैं यह भी बता चुका हूँ कि हमने अपनी संस्था को 'कांग्रेस' का नाम दिया था, परंतु हमारा इरादा अपने प्रश्नों को किसी एक पार्टी के प्रश्न बनाने का कभी नहीं रहा। इसलिए दादाभाई जानें इस ढंग से हमारा पत्र-व्यवहार दूसरी पार्टियों के लोगों के साथ भी चलता था। उनमें दो सज्जन मुख्य थे : एक सर मंचेरजी भावनगरी और दूसरे सर विलियम विल्सन हंटर। सर मंचेरजी भागनगरी उस समय ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्य थे...

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सात निबंध
श्रीधर दुबे

ग्रीष्म का ताप सहती आई धरती के ताप के उपशमन का महीना होता है सावन का महीना। लू और घाम सह सह कर रूखी-सूखी देह वाली हुई धरती आषाढ़ से भीगना शुरू होती है और सावन में भीग भीग कर तर-बतर हो जाती है। इस समय दृष्टि के अंतिम छोर तक हरियाली ही हरियाली पसरी हुई दिखती है जो कि सावन के महीने में धरती की असीम कामना का ही प्रतिफल होती है। हर ओर धान के पौधे लहराते हुए नजर आते हैं, जिन पर हवा तिरती है तो कोसों तक तिरती ही चली जाती है। प्रकृति के अलावा प्रकृति के चिर सहचर मनुष्य व पशु-पक्षी भी इस उफान से अछूते नहीं रह जाते। ...सावन का महीना फिर आया है और हम आकाश का निहोरा करते हुए सावन के सत्कार की तैयारी में भी जुटे हैं। लेकिन असल में तो हम सावन का सत्कार तभी कर पाएँगे जब हमारा मन नारायण काका की बहू, पियारे काका या अपने प्रिय से धानी चुनर की माँग करती धाना जैसा ही गँवई और विशुद्ध लोक मन होगा। क्योंकि सावन के उत्सव को मनाने के लिए हरियाली की कामना करने वाला ठीक वैसा ही उत्सवी मन चाहिए। जिस भारतीय मन में केवल अपना ही नहीं बल्कि पेड़ पौधे और पशु पक्षी सबके सुख की चिंता समाई हुई है। (सावन का सत्कार)

आलोचना
रविरंजन
छायावादी विषाद-तत्व : मिथक और यथार्थ
सौंदर्यशास्त्र का मार्क्सवादी परिदृश्य और मुक्तिबोध

विशेष
सुबोध शुक्ल
क्राइसिस का क्लीशे तैयार करती ज्ञान-मीमांसा

कहानियाँ
दीपक शर्मा
हकदारी
ढलवाँ लोहा
प्रेत-छाया
नीली गिटार
ऊँची बोली
चंपा का मोबाइल

शिक्षा
निरंजन सहाय
जन शिक्षा की अवधारणा और अंबेडकर
क्या शिक्षा एक सांस्कृतिक कार्यवाही है ?

विमर्श
सुप्रिया पाठक
एसिड हमले की शिकार औरतें : गुमनाम होती जिंदगियाँ

देशांतर - विमर्श
नवल अल सादवी
अपाहिज आबादी

कविताएँ
अनुराधा सिंह

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
प्रो. आनंद वर्धन शर्मा
फोन - 07152 - 252148
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ISSN 2394-6687

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