आइए पढ़ते हैं : मधु कांकरिया का उपन्यास :: सूखते चिनार
संपादकीय इस पखवारे (12 मई 2017) संपादकीय परिवार

हिंदी कहानी अब सौ साल की हो चली है। इन सौ सालों में हिंदी कहानी ने बेमिसाल ऊँचाई और गहराई अर्जित की है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी, प्रेमचंद और प्रसाद से शुरू हुआ यह सफर सभी दिशाओं में फैल गया है। आज हिंदी के पास बड़ी संख्या में ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें दुनिया की किसी भी भाषा की कहानियों के समकक्ष रखा जा सकता है। कहानी में यह समृद्धि कई तरह से आई है। इन सौ सालों में न सिर्फ हिंदी का भूगोल बढ़ा है बल्कि हाशिए की उपेक्षित आवाजों ने भी इसमें अपने लिए एक जिम्मेदार जगह बनाई है। कह सकते हैं कि हिंदी कहानी आज अपने कहन में ज्यादा लोकतांत्रिक हुई है। प्रेमचंद जिन चरित्रों को अपनी कहानियों में ले आए थे आज उनमें से अनेक अपनी कहानियाँ खुद कह रहे हैं। दलित, स्त्रियाँ, आदिवासी, अल्पसंख्यक सभी ने कहानी की मुख्य धारा में अपने लिए जगह बनाई है और वे अपने साथ नई नई कहानियाँ लेकर आए हैं। वे कहानियाँ जो पहले शायद मुमकिन नहीं हो पाई थीं।
   इस बार आपके सामने कुल सात स्त्री कथाकारों की कुल इकतीस कहानियाँ हैं। रजनी गुप्त, शर्मिला बोहरा जालान, प्रज्ञा, योगिता यादव, अंजना वर्मा और किरण राजपुरोहित 'नितिला' की पाँच पाँच कहानियाँ तथा नीलाक्षी सिंह की लंबी कहानी। इसमें रजनी गुप्त को छोड़ दें तो बाकी सभी कथाकारों ने अपनी पहचान नई सदी में अर्जित की है। जाहिर कि यह कहानियाँ आज की कहानियाँ हैं। इनमें आज का समय बोलता है। यह समय इनमें तरह तरह से प्रकट होता है। इस समय की शायद ही कोई ऐसी मुश्किल हो जो इन कहानियों में न कही जा रही हो। इन सब में स्त्री जीवन, उसकी मुश्किलें, उसके संघर्ष ज्यादातर कहानियों के केंद्र में हैं पर स्त्री किसी 'नो मैंस लैंड' में थोड़े रहती है। वह भी समय की सारी मुश्किलों से उसी तरह से दो चार है जिस तरह से पुरुष। हाँ यह जरूर है कि चीजों को देखने का नजरिया कई बार एकदम अलग है। यहीं से यह कहानियाँ पाठ के समय एक अतिरिक्त सतर्कता की माँग करती हैं।
   एक और तरह से यह कहानियाँ हिंदी कहानी के व्यापक भूगोल का पता भी देती हैं। यहाँ उपस्थित सात कथाकार छह अलग अलग राज्यों में रचनारत हैं। रजनी गुप्त उत्तर प्रदेश से, शर्मिला बोहरा जालान बंगाल से, प्रज्ञा दिल्ली से, योगिता यादव जम्मू से, किरण राजपुरोहित 'नितिला' राजस्थान से तथा नीलाक्षी सिंह और अंजना वर्मा बिहार से हैं। जाहिर है कि ऐसे में कई बार इन कहानियों में एक विनम्र स्थानीय रंग भी मिलता है।
   जब आप इन कहानियों को पढ़ना शुरू करेंगे तो पाएँगे कि कई बेमिसाल कहानियाँ अब तक आपके इंतजार में थीं। चाहे शिक्षा व्यवस्था की भयानक जालसाजी पर लिखी गई नीलाक्षी सिंह की कहानी ‘इब्तिदा के आगे खाली ही’ हो या एक ‘बिगड़ी बच्ची’ को केंद्र में रखकर लिखी गई शर्मिला बोहरा जालान की कहानी ‘बूढ़ा चाँद’ हो, सामाजिक विभाजन के सवालों से टकराती प्रज्ञा की कहानी ‘तक्सीम’ या योगिता यादव की कहानी ‘भेड़िया’ हो, ये सभी कहानियाँ देर और दूर तक पाठकों की चेतना में बनी रहेंगी। इसी तरह रजनी गुप्त की कहानियों का स्त्री जीवन, किरण राजपुरोहित की कहानियों का राजस्थानी रंग और अंजना वर्मा की कहानियों की मासूमियत भी आपको अपनी सी लगेगी ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है।

इकतीस कहानियाँ
रजनी गुप्त
नजरें
आखिरी सवाल
बदरंग दीवार के पार
नई पगडंडियाँ
पोटली

शर्मिला बोहरा जालान
बूढ़ा चाँद
परछाईं
विकसित मैं
आश्रय
एक अतिपरिचित प्रलाप

प्रज्ञा
अमरीखान के लमडे
रेत की दीवार
तक्सीम
फ्रेम
‘बरबाद’ ...नहीं आबाद

योगिता यादव
साईन बोर्ड
गाँठें
भेड़िया
नेपथ्य में
नागपाश

अंजना वर्मा
यहाँ-वहाँ हर कहीं
नंदन पार्क
हॉर्स रेस
पेड़ का तबादला
कौन तार से बीनी चदरिया

किरण राजपुरोहित ‘नितिला’
छँटा कोहरा
उनका दर्द
एक छोटी सी संतुष्टि
भविष्य के लिए
समझौता

लंबी कहानी
नीलाक्षी सिंह
इब्तिदा के आगे खाली ही

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ISSN 2394-6687

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