आइए पढ़ते हैं : हिंदी के अप्रतिम कवि ज्ञानेंद्रपति की कविताएँ
कविताएँ इस पखवारे संपादकीय परिवार

गीत
रामचंद्र चंद्रभूषण

दरवाजे फिर से

दरवाजे फिर से
गदराई ऋतुगंधा।
चितवनिया
सुमिरन में बीत गई
छलकन में
गागरिया रीत गई
खाती हिचकोले
सरगम की सारंधा।
विजनवती
थालियाँ परोस रही
किरन-फूल
जूड़े में खोंस रही
पाकर वरमाल
झुका गेहूँ का कंधा।

वंशी में बाँधो मत

वंशी में बाँधो मत
मैं तो अनकथ्य किसी गोपन की राधा हूँ
झूलूँगी झूला
कदंबों की डाल में।
महलों में घेरो मत
मैं तो अनटूट किसी सर्जन की सीता हूँ
धूप में तपूँगी
पैठूँगी पाताल में।
चित्रों में आँको मत
मैं तो अनदेख किसी अर्पण की संज्ञा हूँ
चंपा हूँ डलिया में
दियरा हूँ थाल में।
वंशी में बाँधो मत
मैं तो अनकथ्य किसी गोपन की राधा हूँ

तुमने दायित्व दिया क्षण का

तुमने दायित्व दिया क्षण का
बोध हुआ एक सगेपन का।
शब्द मेरे वे न थे -
कि जिन्हें गीतों में नींबू-सा निचोड़ा
शब्द थे वे
कि जिन्हें नक्षत्रों में प्रक्षेपणास्त्र-सा छोड़ा
रचनात्मक सूत्र गढ़ा
जिनसे
दिक्-काल के गठन का।
शिल्प मेरा वह न था
कि प्रश्नों को देखा विराम की आँखों
शिल्प तो वह था
कि इतिहास को देखा आयाम की आँखों
ज्यामिति जिसकी
परिभाषित
किया कोण मन का।
चित्र मेरे वे न थे
कि जिन्हें टाँगा कोठरियों, ओसारे पर
चित्र तो वे थे
कि जिनसे चरित्र लिया भाड़े पर
नया-नया अर्थ रचा
जिनसे
युग के संयोजन का।

दस कहानियाँ
अखिलेश

समर्थ कथाकार अखिलेश की ये कहानियाँ बिना मतलब गंभीरता का ढोंग नहीं करतीं बल्कि अपने पाठकों को भी थोपी हुई गंभीरता से दूर ले जानेवाली कहानियाँ हैं। उनकी भाषा में एक साथ चुहल और विडंबना का प्रयोग देखने को मिलता है। इस नित नई होती भाषा में उनके गतिशील चरित्र प्रकट होते हैं, जो बाहर की दुनिया में तो गतिशील होते ही हैं उनके भीतर भी अनेक रसायनिक अंतर्कियाएँ एक साथ चलती रहती हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियों में सारे बदलाव वर्णन या कथाकार के नैरेशन में नहीं प्रकट होते बल्कि चरित्रों के रोजमर्रा के जीवन में प्रकट होते हैं। जहाँ हार जीत या टूटने या समृद्ध होते जाने की प्रचलित आसानियों से अलग कहानियों की दुनिया सामने आती है जिनमें अवध का ही नहीं समूचे हिंदी प्रदेश का लोकवृत्त भी है, परंपरा भी है, उसका प्रत्याख्यान भी है, संघर्ष और उत्पीड़न की जातीय स्मृतियाँ हैं, भीतर और बाहर की बहुरंगी मायावी सत्ताएँ हैं और उनसे परत दर परत आमना-सामना है। उनकी कहानियों में कुछ भी एकरैखिक या आसान नहीं है यहाँ प्रस्तुत इन दस कहानियों - चिट्ठी, शापग्रस्त, सोने का चाकू, हाकिम कथा, अगली शताब्दी के प्यार का रिहर्सल, अँधेरा, जलडमरूमध्य, यक्षगान, श्रृंखला और वजूद - को उनकी प्रतिनिधि कहानियों के बतौर पढ़ा जा सकता है।

विशेष
रमण सिन्हा
अनुवादक शमशेर

आलोचना
रवि रंजन
नित्यानंद तिवारी : मध्ययुगीन काव्य की सामयिक व्याख्या

विमर्श
अनामिका
मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी

ललित निबंध
दीप्ति कुशवाह
पहुँचना सही जगह पर...

देशांतर - कहानियाँ
होर्हे लुईस बोर्हेस
गोल खंडहर
जोसे डिसूजा सारामागो
अनजाने द्वीप की कथा

कविताएँ
सोनी पांडेय

कुछ और कहानियाँ
सोनाली मिश्र
नताशा
समरसता की विक्ट्री
भैया जी और दिल का प्रबंधन

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
प्रो. आनंद वर्धन शर्मा
फोन - 07152 - 252148
ई-मेल : pvctomgahv@gmail.com

समन्वयक
अमित कुमार विश्वास
फोन - 09970244359
ई-मेल : amitbishwas2004@gmail.com

संपादकीय सहयोगी
मनोज कुमार पांडेय
फोन - 08275409685
ई-मेल : chanduksaath@gmail.com

तकनीकी सहायक
सचिन हाडके
फोन - 08055372091
ई-मेल : sachinmhadke@gmail.com

कार्यालय सहयोगी
उमेश कुमार सिंह
फोन - 09527062898
ई-मेल : umeshvillage@gmail.com

विशेष तकनीकी सहयोग
अंजनी कुमार राय
फोन - 09420681919
ई-मेल : anjani.ray@gmail.com

गिरीश चंद्र पांडेय
फोन - 09422905758
ई-मेल : gcpandey@gmail.com

आवश्यक सूचना

हिंदीसमयडॉटकॉम पूरी तरह से अव्यावसायिक अकादमिक उपक्रम है। हमारा एकमात्र उद्देश्य दुनिया भर में फैले व्यापक हिंदी पाठक समुदाय तक हिंदी की श्रेष्ठ रचनाओं की पहुँच आसानी से संभव बनाना है। इसमें शामिल रचनाओं के संदर्भ में रचनाकार या/और प्रकाशक से अनुमति अवश्य ली जाती है। हम आभारी हैं कि हमें रचनाकारों का भरपूर सहयोग मिला है। वे अपनी रचनाओं को ‘हिंदी समय’ पर उपलब्ध कराने के संदर्भ में सहर्ष अपनी अनुमति हमें देते रहे हैं। किसी कारणवश रचनाकार के मना करने की स्थिति में हम उसकी रचनाओं को ‘हिंदी समय’ के पटल से हटा देते हैं।
ISSN 2394-6687

हमें लिखें

अपनी सम्मति और सुझाव देने तथा नई सामग्री की नियमित सूचना पाने के लिए कृपया इस पते पर मेल करें :
mgahv@hindisamay.in