आइए पढ़ते हैं : हरिशंकर परसाई के व्यंग्य
भाषांतर इस पखवारे देशांतर

कविताएँ
शशांक चूड़ामणि

अब राह खुली तेरे लिए
कब तक जलाते चलोगी खुद क
बूढ़ी असुरनी बन अपनी चिता में
कब तक ताजा शब्दों के फूल
दूर पहाड़ी गाँव के निरीह प्रेमी के लिए
गूँथती रहोगी अनुराग की मोगरे की माला
कब तक कापालिक समय को सुनाती रहोगी
अंतरंग यंत्रणा और अकथनीय दुख की गाथा,
कब तक विश्वास और प्रत्यय का सुन्न होते देखोगी
ठीक संत्रास की गोली में मरते कश्मीरी निरीह आदमी को।

कब तक चाँदनी रात में बैठ दुहराती रहोगी
पूर्वजों का इतिहास
मृत तितली के रंगीन पंख और
कोमल फूलों के मुर्दारों पर
लिखती रहोगी स्मृति की कविता।

कब तक सलाम बजाती रहोगी ब्यूरोक्रेटों को
नानी सुबह सूरज को प्रणाम करने की तरह
बेहाल हो जाती होगी पढ़-पढ़
मद्यप नेताओं के झूठे वादे अखबार में
कितने दिन मेले में गुमे बालक की तरह
पूछती रहोगी इससे-उससे एक निर्दिष्ट रास्ता
और अस्त-व्यस्त होती रहोगी भोर होने तक आँसुओं में।
यदि कौओं की काँव-काँव में भरी है भोर यदि चातक की आर्त दृष्टि में उठते हैं मेघ,
यदि दरक जाती धरती किसी सती की नीरव प्रार्थना में
तो चौंको नहीं।
मेरी दर्पित कलम और शब्दों की दहाड़ में
अपनी रक्तिम माँग ले कदम बढ़ाओ
अब राह खुल गई तेरी अपनी इच्छा से।

शब्द का ओंकार
नित सुबह एकाकी पद्म खिलता
इतने बड़े पोखर में
झलमलाती हर पंखुड़ी विशाल नीले जल में
हिलडुल रहा इस जीवन सा
साफ पानी उसके सब्ज पत्तों पर।
टिमटिमाती आँखें देखती ईर्ष्या में, अहंकार में
पद्म खिल सरक जाता, मुँह फिरा लेता
किसके तेज में फिर उज्वल हो उठते
जितना भिगोए बरसा सतेज दिखती पंखुड़ी
पानी पहनी पोशाक में
उसकी भीगी-भीगी नाक सी साँवरी देह में चमक
भींगी हवा में मन तैरता।
रात जब बढ़ती वर्षा मत्त हो उठे तांडव में
अँधेरे का मानचित्र झूल जाता आकाश की दीवार पर
गाँव या मशान, मंदिर या पुष्करिणी
सब जगह होता वह अंधकार
तभी पद्म मानो पार्वती बन जाता
झूल जाता शब्द पुष्प के गले में
हर मांसल पद्मपत्र मुलायम सेज बन बिछ जाता।
अचानक शब्द पुरुष जाग उठता सम्मोहन में
पद्मकेशर खिल जाते बाहु में
उसके पुष्ट स्तन भी ढीले पड़ जाते
संभावना के इस विशाल वक्ष पर, महक फैल जाती।
पंक कहे महक मेरी, पुष्करिणी कहे मेरी
साँवले भँवर-सा अँधेरा मेरा-मेरा कहता
आकाश से धरा तक।
कैसी महक उसकी
सम्मोहन में शब्द पुरुष शिव हो जाता,
देह में ब्रह्म की लहर उठती
सचराचर सुनाई देता शब्द का ओंकार।

कौन रचता युद्ध
कहो, कौन रचता युद्ध!
कौन सजाता ब्रह्मास्त्र, विनाशक अस्त्र, स्कड मिसाइल,
द्वारका में, नागासाकी में, अयोध्या में,
बगदाद में, कारगिल में,
सब जगह शायद धोखेबाज ईश्वर का हाथ।

कौन थमा रहा मेरे हाथ में स्वार्थ का गांडीव, नाराच
कौन पहना रहा मुझे प्रतिहिंसा का कवच-कुंडल
कौन डाल रहा मेरी देह पर
अहंकार का इत्र,
कौन सिखाता जा रहा रचना अविश्वास के व्यूह की
किस विष भरी क्षुधा के लिए, कहो।

किस लाचारी के आवास में हूँ
किस डरावने सपने में दब-पिस रहा
व्याकुल हो स्वप्न में दबा जा रहा
और जा रहा अपनी मुलायम सेज में,
मेरे घनिष्ठ साथी सड़क पर चुपके-चुपके
चल रहे, षड्यंत्र की माइन बिछाते हुए
मेरी प्रेमिका के कोमल अंग में
उँड़ेलते जा रहे प्रत्यय में, चुंबन में, सहवास में
हजारों क्षयकारी जीवाणु,
मेरे भाइयों के कटे सिर लिए
अट्टहास करते जा रहे निशीथ में।
कहो, कौन रचता है युद्ध।

कविताएँ
अरुण कमल

मेरे जैसे लोग सिर्फ लिखित कविता के अनुभव और अभ्यास को जानते हैं। यह सबसे सस्ता माध्यम है। सामूहिक होते हुए भी एकल का साधन और साध्य। सामूहिक इसलिए कि भाषा तो सबकी है। मेरे पहले से है। और एकल इसलिए कि मुझे लिखते हुए और किसी की जरूरत नहीं है। कविता लिखना सबसे आजादी का काम है। पढ़ना भी उतनी ही आजादी, अकेलापन और कम खर्चे का काम है। इसके अलावा यह सुविधा और विकल्प तो हमेशा है ही कि कलम-कागज न हो तो भी मैं कविता कह सकूँ और किताब छिन भी जाए तो कंठस्थ कविता बोल सकूँ। अब एक नया माध्यम और उपकरण आया है। ये कविताएँ अंतर्जाल या इंटरनेट के जरिए आप तक पहुँचेंगी। आप इन्हें कागज पर नहीं, किसी पर्दे पर पढ़ेंगे जिसमें शब्द उसके भीतर से उगेंगे। यह फिल्म से आगे की बात है। और आप एक एक पंक्ति को सरका कर पढ़ सकते हैं और चाहें तो पूरा मिटा भी सकते हैं। यहाँ भी कविता पढ़ी ही जा रही है जैसे पहले। लेकिन फर्क ये है कि एक साथ बहुत से लोग अपने अपने उपकरण पर उसे दुनिया में कहीं भी पढ़ सकते है।

आत्मकथ्य
अरुण कमल
परदे पर शब्द मुझे वैसे ही लगते हैं
जैसे नीले आसमान में तारे

बाल दिवस विशेष
बचपन
गिरीश्वर मिश्र
बचपन का बदलता देशकाल

इतिहास
जवाहरलाल नेहरू
पिता के पत्र पुत्री के नाम

कहानियाँ
प्रेमचंद
परीक्षा
ईदगाह
बूढ़ी काकी
बड़े भाई साहब
दो बैलों की कथा

कविताएँ
मैथिलीशरण गुप्त
माँ, कह एक कहानी
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध
चंदा मामा
रामधारी सिंह दिनकर
टेसू राजा अड़े खड़े
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
बुढ़िया
सोहन लाल द्विवेदी
पर्वत कहता

सिनेमा
विनोद अनुपम
प्रतीक्षा है बच्चों के सिनेमा की

विशेष लेख
शिव कुमार मिश्र
अँग्रेजी राज हिला चुटकी भर नमक से

यात्रा-वृत्तांत
स्वाति तिवारी
सत्याग्रह हाऊस : बापू से साक्षात्कार की अनुभूति

विमर्श
डॉ. रणजीत
जाति का जंजाल

आलोचना
अरुण होता
केदारनाथ सिंह की कविताओं से गुजर कर

कुछ और कहानियाँ
हरियश राय
ढिंकचिका ढिंकचिका
शेषनाथ पांडेय
एकालाप की नमी

कुछ और कविताएँ
राकेश रंजन
जयप्रकाश मानस

नन्हीं मासूम कली
विलियम वर्ड्सवर्थ

सूरज की किरणों और भीगी फुहारों में
खिलती रही एक कली बीते तीन बरसों में
आतुर प्रकृति ने कहा - प्रेम के आवेग में
नहीं खिला कोई फूल मेरी सूनी गोद में
निसर्ग के नियम और सदा संवेगों के संग
उस मासूम में खिलेंगे प्रेम के अगणित रंग
चंचल चितवन चहकेगी मेरे संग-संग
पर्वतों, पहाड़ियों और पसरे मैदानों पर
निकुंज और वनों की सर्पिल पगडंडियों पर
धरती और स्वर्ग पर... धरती और स्वर्ग पर
महसूस करेगी वह एक आत्मस्फूर्ति
और अंतर्चेतना - प्रज्ज्वलन पर शमन
कुलाँचें भरेगी वह मृग शावक बनकर
आनंदित होती है जो हरीतिमा देखकर
या, पगडंडियों से रिसते झरनों से
और बन जाएगी वृक्ष सुगंधित सा
मन होगा उसका शांत और गंभीर
मौन, स्पंदित सजीवों की तरह
कपसीले गुच्छों जैसे सारे मेघ समूह
लेकर आएँगे उसके लिए धुनकनी
आँधी, बवंडर और तूफान में भी
देखना वह नहीं होगी विफल
वह लावण्य जो उसे बनाकर देगा
यौवना... प्रकृति की ईश्वरीय अनुकंपा से
मध्य रात्रि के सितारे होंगे उसके प्रिय
कान लगाकर सुनेगी वह अनेकों बार
जहाँ नदियाँ करती होंगी उन्मुक्त नर्तन
प्रतिबिंब होंगे... अनचीन्हे, अबूझ
संगीत के सुर जो सजेंगे लहरों से!
तब एकाकार होंगी उसके कांतिवान चेहरे पर
उमंग और उल्लास की जीवंत संवेदनाएँ।

संपादकीय सूचना

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

संपादक
अरुणेश नीरन
फोन - 07743886879
09451460030
ई-मेल : neeranarunesh48@gmail.com

प्रबंध संपादक
डॉ. अमित कुमार विश्वास
फोन - 09970244359
ई-मेल : amitbishwas2004@gmail.com

सहायक संपादक
मनोज कुमार पांडेय
फोन - 08275409685
ई-मेल : chanduksaath@gmail.com

संपादकीय सहयोगी
तेजी ईशा
फोन - 09096438496
ई-मेल : tejeeandisha@gmail.com

तकनीकी सहायक
हरीश चंद्र शाह
फोन - 09881712687
ई-मेल : harishchandra1645@gmail.com

विशेष तकनीकी सहयोग
गिरीश चंद्र पांडेय
फोन - 09422905758
ई-मेल : gcpandey@gmail.com

अंजनी कुमार राय
फोन - 09420681919
ई-मेल : anjani.ray@gmail.com

हेमलता गोडबोले
फोन - 09890392618
ई-मेल : hemagodbole9@gmail.com

आवश्यक सूचना

हिंदीसमयडॉटकॉम पूरी तरह से अव्यावसायिक अकादमिक उपक्रम है। हमारा एकमात्र उद्देश्य दुनिया भर में फैले व्यापक हिंदी पाठक समुदाय तक हिंदी की श्रेष्ठ रचनाओं की पहुँच आसानी से संभव बनाना है। इसमें शामिल रचनाओं के संदर्भ में रचनाकार या/और प्रकाशक से अनुमति अवश्य ली जाती है। हम आभारी हैं कि हमें रचनाकारों का भरपूर सहयोग मिला है। वे अपनी रचनाओं को ‘हिंदी समय’ पर उपलब्ध कराने के संदर्भ में सहर्ष अपनी अनुमति हमें देते रहे हैं। किसी कारणवश रचनाकार के मना करने की स्थिति में हम उसकी रचनाओं को ‘हिंदी समय’ के पटल से हटा देते हैं।

हमें लिखें

अपनी सम्मति और सुझाव देने तथा नई सामग्री की नियमित सूचना पाने के लिए कृपया इस पते पर मेल करें :
hindeesamay@gmail.com