आइए पढ़ते हैं : मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी का उपन्यास :: खोया पानी
देशांतर इस हफ्ते विशेष

कविताएँ
सर्जिओ इन्फेंते

एक उपन्यास के बारे में

हर फैलाव में रात और काली है
अग्नि के पर्याय
नहीं लगाते आग,
नायक की भौं का सितारा
बमुश्किल दिखाता है
अनिश्चित रास्ता।

एक खोये शहर की
तयशुदा गलियों की याद
खींचती है मुझे,
भू-ग्रस्त दौड़ता हूँ,
रकाब के जोड़े के बारे में
सोचता
भ्रमित मैं
फिर से लिखता हूँ पतवार,
उजला घास का मैदान
और दूर की एक पल्ली।

हर कथा का निश्चित अंत देखते
भग्न टखने को ताकते
गूँगे की तरह
देर हो चुकी है तोड़ने में
मायावी आवाजों का जादू,
या भ्रम और पीड़ा में निमग्न
अपनी आवाज की चैलियाँ।

मै छलाँग लगाता हूँ
और बच जाता हूँ डूबने से
अपने दाँतों में दबाये
एक कविता।

एक और ग्रीष्म

घंटों लंबी है
ट्रेन से समुद्र की यात्रा।

घर के आगे लगे
पाइन के पेड़ दे रहे हैं साथ।

सागर गर्जन की
वे बखूबी करते हैं नकल।

पेड़ों की शाखाओं
और नुकीली पत्तियों से उलझती
एंडीज पर्वत की हवा से
एक सरसराहट में
बदल जाता है समुद्र,
यादों में है
पानी में प्रतिबिंबित सूर्यास्त,
याददाश्त में हैं
समुद्र फेन में निमग्न
आगे बढ़ते हुए पैर।

नौका

यात्रा में
दीखती हो तुम,
नहीं सुनाई देती
तुम्हारी आवाज।

गलही-विनिवेशित
विषुवतीय वायु
कर लेती है अधिकार
और बहती रहती है निरंतर।

हमेशा अथक रहने वाली
सामुद्रिक चिड़ियाएँ हैं,
फासले नापने को
जमीन नहीं है चारों ओर।

सिर्फ एक समुद्र है
और चमचमाते चाकुओं सी
उड़ती मछलियाँ।

सिर्फ एक समुद्र है
और हर रोमरंध्र में
अंगारे दहकाता
सूर्य का लंगर।

सिर्फ एक समुद्र है,
फासले नापने को
जमीन नहीं है चारों ओर।

बस एक समुद्र है,
हर ज्वार में उभरती
घर की प्रतिच्छवि
और एक घनीभूत पीड़ा।

फासले नापने को
जमीन नहीं है चारों ओर।

महज एक समुद्र
चारों ओर नहीं है
दूरियाँ जतलाता
कोई भी भू-खंड।
                    अनुवाद - रति सक्सेना

पंद्रह गीत
देवेंद्र कुमार ‘बंगाली’

बंगाली जी जितने अच्‍छे इनसान थे, उतने ही अच्‍छे कवि और गीतकार भी थे। उनकी साहित्‍य यात्रा गीत-सृजन से शुरू हुई थी। 'एक पेड़ चादनी लगाया है आँगने। फूले तो आ जाना एक फूल माँगने।' गीत के साथ वे हिंदी कविता के मंच पर छा गए थे। उल्‍लेखनीय तथ्‍य यह है कि जहाँ अन्‍य तमाम गीतकार अपने किन्‍हीं एक-दो गीतों को ही जिंदगी भर अपनी लोकप्रियता का आधा बनाए रखते हैं। वहाँ बंगाली जी ने इस सीमा को तोड़कर निरंतर नए अनुभवों, टटके बिंबों, नए भाषा-संकेतों, नई अर्थ-छवियों और नवीन सौंदर्य कल्‍पनाओं तथा शिल्‍पगत नवीनताओं से समृद्ध नए-नए गीतों से अपनी लोकप्रिय छवि बरकरार रखी और ऐसे गीत लिखे जो अनुभव और सोच की ताजगी के साथ-साथ नए-नए प्रयोगों की भी सूचना देते थे। बंगाली जी को यदि प्रयोगधर्मी प्रगतिशील गीतकार की संज्ञा दी जाय तो अत्युक्ति न होगी। उनके गीतों में लिजलिजी भावुकता की जगह संवेदनात्‍मक वैचारिकता और आंतरिकता है। कठिन तुकों और आंतरिक लयों का जैसा सहज और सफल निर्वाह बंगाली जी के गीतों में दिखाई पड़ता है, वैसा अन्‍यत्र दुर्लभ है। बंगाली जी ने गीतों में न केवल अनुभवों की परती धरती तोड़ी है बल्कि शिल्‍पगत प्रयोगों का नया क्षितिज भी उद्घाटित किया है।

कवि-चर्चा
कृष्ण चंद्र लाल
देवेंद्र कुमार 'बंगाली' के गीत

कहानियाँ
अनवर सुहैल
गहरी जड़ें
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कुंजड़-कसाई
ग्यारह सितंबर के बाद

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अदम गोंडवी का निरालापन
दुष्यंत कुमार : परिवर्तन के लिए समर्पित कवि

प्रवासी मन
कविता मालवीय
सूरीनाम की धरती पर धड़कता भारत

कविताएँ
जीत नाराइन
चंद्रमोहन रणजीत सिंह

हिंद स्वराज
बारहवाँ खंड : हिंदुस्तान की दशा – 5, डॉक्टर
मोहनदास करमचंद गांधी


पिछले हफ्ते

कविताएँ
ज्ञानेंद्रपति

ज्ञानेंद्रपति हिंदी के एक विरल कवि हैं। सिर्फ इस अर्थ में नहीं कि वह लगातार बहुत अच्छी कविताएँ लिख रहे हैं बल्कि इस अर्थ में भी कि वह एक कवि का ही जीवन भी जी रहे हैं। इस अर्थ में भी कि आज जब दुनिया ग्लोबल होने की तरफ भाग रही है तब उन्होंने खाँटी स्थानीय होना चुना है। बनारस उनकी काव्यात्मक दुनिया का केंद्र-बिंदु है और यह अचरज पैदा करने वाली बात है कि भारतीय जन-जीवन के जितने दुर्लभ और सुगढ़ बिंब उनकी कविताओं में मिलते हैं शायद ही किसी अन्य की कविताओं में मिलते हों। इन अर्थों में वह सच्चे जन-कवि कहे जा सकते हैं। वह इस अर्थ में भी बड़े कवि हैं कि जहाँ एक जैसी काव्य-भाषा और काव्य-रूढ़ियों के चलते कवियों के कवि व्यक्तित्व को अलग से पहचानना मुश्किल होता जा रहा है वहीं ज्ञानेंद्रपति की कविताएँ एकदम अलग से पहचानी जा सकती हैं।

कहानियाँ
गाब्रिएल गार्सिया मार्केज
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डॉ. श्रीराम परिहार
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यात्रा वृत्तांत
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कहाँ-कहाँ से गुजर गया सिनेमा
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हिंदी सिनेमा : कल, आज और कल

कविताएँ-देशांतर
त्रिन सूमेत्स

अछूत की शिकायत
हीरा डोम

हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी
हमनी के सहेब से मिनती सुनाइबि।
हमनी के दुख भगवानओं न देखता ते,
हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।
पदरी सहेब के कचहरी में जाइबिजां,
बेधरम होके रंगरेज बानि जाइबिजां,
हाय राम! धरम न छोड़त बनत बा जे,
बे-धरम होके कैसे मुँहवा दिखइबि ।।१।।

खंभवा के फारी पहलाद के बंचवले।
ग्राह के मुँह से गजराज के बचवले।
धोतीं जुरजोधना कै भइया छोरत रहै,
परगट होके तहाँ कपड़ा बढ़वले।
मरले रवनवाँ कै पलले भभिखना के,
कानी उँगुरी पै धैके पथरा उठले।
कहवाँ सुतल बाटे सुनत न बाटे अब।
डोम तानि हमनी क छुए से डेराले ।।२।।

हमनी के राति दिन मेहत करीजां,
दुइगो रूपयावा दरमहा में पाइबि।
ठाकुरे के सुखसेत घर में सुलत बानीं,
हमनी के जोति-जोति खेतिया कमाइबि।
हकिमे के लसकरि उतरल बानीं।
जेत उहओं बेगारीया में पकरल जाइबि।
मुँह बान्हि ऐसन नौकरिया करत बानीं,
ई कुल खबरी सरकार के सुनाइबि ।।३।।

बभने के लेखे हम भिखिया न माँगबजां,
ठकुर क लेखे नहिं लउरि चलाइबि।
सहुआ के लेखे नहि डांड़ी हम जोरबजां,
अहिरा के लेखे न कबित्त हम जोरजां,
पबड़ी न बनि के कचहरी में जाइबि ।।४।।

अपने पहसनवा कै पइसा कमादबजां,
घर भर मिलि जुलि बाँटि-चोंटि खाइबि।
हड़वा मसुदया कै देहियाँ बभनओं कै बानीं,
ओकरा कै घरे पुजवा होखत बाजे,
ओकरै इलकवा भदलैं जिजमानी।
सगरै इलकवा भइलैं जिजमानी।
हमनी क इनरा के निगिचे न जाइलेजां,
पांके से पिटि-पिटि हाथ गोड़ तुरि दैलैं,
हमने के एतनी काही के हलकानी ।।५।।

यह कविता महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ (सितंबर 1914, भाग 15, खंड 2, पृष्ठ संख्या 512-513) में प्रकाशित हुई थी।

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