आइए पढ़ते हैं : कुणाल सिंह का उपन्यास :: आदिग्राम उपाख्यान
पूर्वोत्तर इस पखवारे कविता

अगरतला और कलाएँ
प्रयाग शुक्ल

इस इलाके को खजूर बागान क्यों कहते हैं? क्या यहाँ खजूर के पेड़ थे बहुत से, पहले?, यह पूछने पर पचास-पचपन के अमलेंदु बनिक मुझे एक ओर ले जाकर सड़क पार का वह छोटा-सा सरोवर दिखाते हैं, जिसे खजूर के पेड़ों ने घेर रखा है। फिर कहते हैं, देखिए न अभी भी हैं, पर, पहले और ज्यादा रहे होंगे। बात आपकी सच है, तभी न पड़ा है नाम खजूर बागान। अमलेंदु, सिक्यूरिटी गार्ड हैं। बांग्ला भाषी हैं। उनसे मेरी बातचीत बांग्ला में ही हो रही है। यों भी, बांग्ला ही तो त्रिपुरा की भाषा है, दिन भर वही सुन और दिख पड़ती है। आदिवासी जरूर अभी भी अपनी भाषा - काकबारोक - का इस्तेमाल करते हैं। पता चला कुछ अध्यनशील बांग्लाभाषी भी अब काकबारोक के ‘पुनरुद्धार’ में जुटे हैं। काकबारोक में समकालीन साहित्य भी लिखा जा रहा है। अगरतला का यह टूरिज्म अतिथि गृह काफी बड़ा है। खुला परिसर है। नाम है, ‘गीतांजलि’ पास ही राजकीय अतिथि गृह है, ‘सोनार तरी’ नाम का। दोनों नाम, जाहिर है, रवींद्रनाथ ठाकुर की कृतियों से ही लिये गए हैं। अगरतला और त्रिपुरा से रवींद्रनाथ का संबंध प्रगाढ़ था। वह त्रिपुरा राज परिवार के चार पीढ़ियों तक के सदस्यों के अंतरंग रहे थे। राज परिवार, संपत्ति के विवादों तक में उनका मुँह जोहता था। जब पिछली बार त्रिपुरा आया था तब वह ‘मालंच भवन’ भी देखा था, जहाँ वह अक्सर ठहरा करते थे। मेरी पिछली यात्रा को कई बरस हो गए। फिर से, वह भवन देखने की इच्छा है। अमलेंदु से पूछता हूँ, यहाँ से मालंच भवन कितनी दूर है! वह कहते हैं ‘बेशी दूरे नाय। आपनी हेटेउ जेते पारेन।’ (ज्यादा दूर नहीं है। आप पैदल भी जा सकते हैं) जिस उत्साह से अमलेंदु ने ‘मालंच भवन’ का रास्ता बताया है, उससे यही लगता है कि उस भवन के महत्व से वह परिचित हैं। रवींद्रनाथ की मूर्तियाँ हैं, चौक चौराहों में, दीवारें भी कहीं कहीं उनकी मुखाकृति से चित्रांकित हैं।
    त्रिपुरा इस बार संगीत नाटक अकादेमी द्वारा आयोजित ‘नाट्य समागम’ के प्रसंग से आना हुआ है, जो नजरुल कलाक्षेत्र में हो रहा है। कल रतन थियाम निर्देशित मैकबेथ की अपूर्व प्रस्तुति देखी है। आगे भी बहुत कुछ देखने सुनने को है। कई नाटक हैं। बंगाल का बाउल, आंध्र की हरिकथा, मणिपुरी ‘वारी लिबा’ कथा गायन, आल्हा-गायन आदि के भी कार्यक्रम हैं। नजरुल कला क्षेत्र के परिसर में शाम होते ही भीड़ जुट जानी है, लोकनर्तक-वादक अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। रंग-बिरंगे बल्ब जल उठते हैं दिल्ली के कलाकार भुनेश्वर भास्कर के घट-संस्थापन को लोग दिलचस्पी से देखते हैं। अगरतला के कुंभकारों के विभिन्न आकारों वाले मिट्टी के घड़ों को मुखौटों/बिजूकों की शक्ल देकर, भुनेश्वर ने एक सरसता और ‘कौतुक’ की सृष्टि की है। परिसर में कई तरह की तरंगें व्याप्त हो जाती हैं। इस परिसर में एक ओर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की एक प्रशिक्षण-शाखा है, एक वर्ष के सर्टिफिकेट कोर्स वाली, जिसमें, प्रशीक्षार्थियों को इस तरह ट्रेन किया जाता है कि आगे चलकर वे स्वयं स्कूलों और शिक्षण-संस्थाओं में रंगकर्म की दीक्षा दे सकें। संगीत नाटक अकादेमी का त्रिपुरा-केंद्र भी खुल गया है। यहीं साहित्य अकादेमी और नेशनल बुक ट्रस्ट के पुस्तक केंद्र भी हैं। नजरुल की मूर्ति है। निश्चय ही यह एक भरा पूरा परिसर है।

एक दोपहर अगरतला की एक बड़ी पुस्तक दुकान ‘बुक वर्ल्ड’ में जाता हूँ। उसके मालिक देबानंद दास से भेंट करके अच्छा लगता है। प्रकाशक भी हैं। साहित्य प्रेमी। उनसे आग्रह करता हूँ कि अगरतला के स्थानीय बांग्ला लेखकों कवियों से मेरी भेंट का कोई प्रसंग बना दें। वे सहर्ष अगले दिन रतन देव बर्मन, मीनाक्षी भट्टाचार्य, संध्या भौमिक, रत्ना मजुमदार आदि को दुकान में ही आमंत्रित कर लेते हैं। एक गोष्ठी ही तो जम जाती है। मेरी बातचीत सबसे बांग्ला में ही होती है। रवींद्रनाथ, जीवनानंद दास, शंख घोष आदि के काव्य-प्रसंग सहज ही आ जाते हैं। कविताएँ सुनी-सुनाई जाती हैं। मीनाक्षी भट्टाचार्य रवींद्रनाथ की कविता ‘साधारण में’ (सामान्य लड़की) की बड़ी सुंदर आवृत्ति भी करती हैं। चाय और ‘संदेश’ आदि मिष्टानों के साथ पुस्तकें भेंट में मिलती हैं। भेंट होती है अरुणोदय साहा से, जो त्रिपुरा विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति हैं। अतुल प्रसाद की जीवनी भी उन्होंने लिखी है, जिसमें स्वभावतः रवींद्रनाथ ठाकुर से जुड़े कई प्रसंग हैं। नाम है ‘नींद नाहिं आँखिपाते’ (आँखों में नींद नहीं)। अगरतला की, खजूर बागान इलाके की, वहाँ की सांस्कृतिक दुनिया की याद अब वर्षों बनी रहने वाली है।

कविताएँ
मंगलेश डबराल 

एक ऐसे संसार और समय में जहाँ जिंदगी के हर हिस्से में किन्ही भी शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इनसान को उसके हाशिया से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचों-बीच लाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, ईर्ष्यालु अथवा आत्मदयाग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोजख को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इनकार करता है। मंगलेश की इन विचलित कर देने वाली कविताओं में गहरी प्रतिबद्धता, अनुभूत करुणा है, जिसमें दैन्य, नैराश्य या पलायन कहीं नहीं है। करुणा, स्नेह, मानवीयता, प्रतिबद्धता - उसे आप किसी भी ऐसे नाम से पुकारें, लेकिन वही जज्बा मंगलेश की कविता में अपने गाँव, अंचल, वहाँ के लोगों, अपने कुटुंब और पैतृक घर और अंत में अपनी निजी गिरस्ती के अतीत और वर्तमान, स्मृतियों और स्वप्नों, आकांक्षाओं और वस्तुस्थितियों से ही उपजता है। उनकी सर्जना का पहला और ‘अंतिम प्रारूप’ वही है। आज की हिंदी कविता में मंगलेश डबराल की कलात्मक और नैतिक अद्धितीयता इस बात में भी है कि अपनी शीर्ष उपस्थिति और स्वीकृति के बावजूद उनकी आवाज में उन्हीं के ‘संगतकार’ की तरह एक हिचक है, अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की कोशिश है, लेकिन हम जानते हैं वे ऐसे विरल सर्जक हैं जिनकी कविताओं में उनकी आवाजें भी बोलती-गूँजती हैं जिनकी आवाजों की सुनवाई कम होती है। - विष्णु खरे

निबंध
राधावल्लभ त्रिपाठी
भारतीय कथा परंपरा

कहानियाँ
मुकेश वर्मा
दुर्जनसिंह
दिल की इक आवाज ऊपर उठती हुई...
विवेक मिश्र
दीया
सपना
तन मछरी-मन नीर

लंबी कहानी
संजीव
सागर सीमांत

संस्मरण
प्रयाग शुक्ल
ज्योत्स्ना जी की स्मृति में
कँवल भारती
अविस्मरणीय मुद्रा जी

आलोचना
रवि रंजन
प्रेमचंद के कथासाहित्य का समाजशास्त्र  

विशेष
डॉ. महीपाल सिंह राठौड़
मीरा के पदों में लोक तात्विक तन्मयता 

सिनेमा
राहुल सिंह
इम्तियाज अली की सिनेमाई चेतना 

व्यंग्य
गोविंद सेन
साहब का बसंत
कीचड़ महिमा न्यारी
प्रसून जी को श्रद्धांजलि
ईश्वर आपकी यात्रा सफल करे
कस्बे के रसीले कवि 

कविता संग्रह
एम.एन. पलसाने
बातें मेरी - अपने आप से 

जनपदीय हिंदी - भोजपुरी
कविता
रमाकांत द्विवेदी 'रमता'
बेयालिस के साथी 
रामजियावन दास 'बावला'
चल तहसील कचहरी चल 
सत्यनारायण
राजाजी के बाग में 

अभी तक बारिश नहीं हुई
विनोद कुमार शुक्ल

अभी तक बारिश नहीं हुई
ओह! घर के सामने का पेड़ कट गया
कहीं यही कारण तो नहीं।
बगुले झुंड में लौटते हुए
संध्या के आकाश में
बहुत दिनों से नहीं दिखे
एक बगुला भी नहीं दिखा
बचे हुए समीप के तालाब का
थोड़ा सा जल भी सूख गया
यही कारण तो नहीं।
जुलाई हो गई
पानी अभी तक नहीं गिरा
पिछली जुलाई में
जंगल जितने बचे थे
अब उतने नहीं बचे
यही कारण तो नहीं।
आदिवासी! पेड़ तुम्हें छोड़कर नहीं गए
और तुम भी जंगल छोड़कर खुद नहीं गए
शहर के फुटपाथों पर अधनंगे बच्चे-परिवार
के साथ जाते दिखे इस साल
कहीं यही कारण तो नहीं।
इस साल का भी अंत हो गया
परंतु परिवार के झुंड में अबकी बार
छोटे-छोटे बच्चे नहीं दिखे
कहीं यह आदिवासियों के अंत होने का
सिलसिला तो नहीं।

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ISSN 2394-6687

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