आज की प्रविष्टि : प्रताप सोमवंशी की कविताएँ
देशांतर इस पखवारे भाषांतर

कविताएँ
लाल सिंह 'दिल'


शाम का रंग
शाम का रंग फिर पुराना है
जा रहे हैं बस्तियों को फुटपाथ
जा रही है झील कोई दफ्तर से
नौकरी से ले जवाब
पी रही है झील कोई जल की प्यास
चल पड़ा है शहर कुछ गाँवों की राह
फेंककर जा रहा कोई सारी कमाई
पोंछता कोई आ रहा धोती के साथ
कमजोर पशुओं के बदन से चाबुकों का खून
शाम का रंग फिर पुराना है...

दूरी
ये रास्ते धरती और मंगल के नहीं
जिन्हें राकेट नाप सकते हैं
ना यह रास्ते
दिल्ली और मास्को या वाशिंगटन के हैं
जिनको आप रोज नापते हैं
यह दूरी
जो हमारे और तुम्हारे बीच है
तीरों के नापने की है।

बेरोजगार
घिस चुकी कमीज की आस्तीनें छुपाकर चलना
टूटे जूते पहनकर चलने की महारत
जुबाँ से निकाल फेंकना मुरव्वत का जिक्र
पलकों में अरथियाँ छुपाना-मुस्कराना
पर मेरे सामने, ये शीशे के हैं तेरे वस्त्र
साफ शीशे का बदन
साफ दीखता है तुम्हारे भीतर बहता लहू
क्योंकि हम बहुत बार इकट्ठे मिलते हैं
तीसरे दर्जों में
चाय के ढाबों या कबाड़ी की दुकान पर
मैंने भी अपने वे कागजात
जो रोजगार दफ्तर के कर्मचारी
कभी-कभी खिड़की से बाहर फेंक देते हैं
हवा में उड़ते उठाए हैं।

जात
मुझे प्यार करने वाली
पराई जात की कुड़िए
हमारे सगे
मुरदे भी एक जगह नहीं जलाते।

तीन हजार चार सौ, मजदूर
तीन हजार चार सौ मजदूर
कैसे कंट्रोल होता है
वे बोलते हैं, भाषण देते हैं
पथराव करते हैं।
पर इतने मजदूरों को
कंट्रोल कौन करता है
कि वे इंकलाब नहीं करते?

प्रवासी मजदूर
प्रवासी मजदूर हैया हैया
का गीत अलापते
मोटा तार खींचते
एक साथ जोर लगाने के लिए वे
गीत-सा गाते
पास से नीले शाल वाली मक्खनी लड़की
हँसती-हँसती गुजरती है।

नाच
जब मजदूरिन तवे पर
दिल को पकाती है
चाँद शीशम के बीच से हँसता है
बालक छोटे को बाप
बैठकर बहलाता है
कटोरी बजाता है
और बालक जब दूसरा बड़ा
करधनी का घुँघरू बजाता है
और नाचता है
ये गीत नहीं मरते
ना ही दिलों से नाच मरते हैं।


रचना अपनी कसौटी खुद निर्धारित करती है : विजय मोहन सिंह
कृष्ण कुमार सिंह

विजय मोहन सिंह हमारे समय के शीर्षस्थ कथा आलोचक थे। उनकी विश्लेषणपरक दृष्टि और आलोचना का हिंदी भाषी समाज सदैव कायल रहा है। आलोचना पर उनकी दस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित होकर चर्चित रही हैं। हिंदी कथा साहित्य को केंद्र में रखकर उनसे आलोचक अध्येता प्रो. कृष्ण कुमार सिंह ने एक महत्वपूर्ण संवाद किया था। यह संवाद उस दिनों किया गया जब वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में आवासीय लेखक के रूप में प्रवास कर रहे थे। विजय मोहन जी ने जिस तरह दो टूक अंदाज में प्रश्नों के जवाब दिए हैं उससे यह संवाद कथा साहित्य को समझने के लिए एक नई दृष्टि देता है। यह संवाद बहुबचन-43 में प्रकाशित होते ही चर्चा और विवाद के केंद्र में आ गया। फेसबुक और ब्लॉग जैसे माध्यमों से लेकर अखबारों और साहित्यिक पत्रिकाओं तक इस संवाद की अनुगूँजें सुनी गईं। विदेशी रचनाकारों में सार्त्र और हेमिंग्वे से प्रभावित विजय मोहन जी ने आलोचना के अतिरिक्त कथा साहित्य में भी बेहद महत्वपूर्ण काम किया था। उनके पाँच कहानी संग्रह और एक उपन्यास भी प्रकाशित होकर चर्चा में रहे। वे साठोत्तरी के चर्चित कथाकारों में से एक थे।        

संस्मरण
विजय मोहन सिंह
चेरोखरवारों का गाँव

पाँच कहानियाँ
शिवदयाल
नॉस्टैल्जिया
गीताश्री
इंद्रधनुष के पार
विवेक मिश्र
बसंत
कबीर संजय
प्रयागराज एक्सप्रेस
शेखर मल्लिक
डायनमारी

विमर्श
बद्रीनारायण
अतीत का उत्सव और उत्सव का अतीत

आलोचना
राहुल सिंह
मुर्दहिया : रेणु के गाँव में प्रेमचंद की रिहाइश
माधव हाड़ा
हिंदी की इक्कीसवीं सदी की साहित्यिक सक्रियता : कुछ परिवर्तन, कुछ प्रस्थान

विशेष
शिव कुमार मिश्र
झंडा सत्याग्रह

सिनेमा

विजय शर्मा
फिल्म निर्देशकों का दुलारा हैमलेट

व्यंग्य
संजीव निगम’
लौट के उद्धव मथुरा आए
मान ना मान, मैं तेरा मेहमान

बाल साहित्य - कहानियाँ
दिविक रमेश
देशभक्त डाकू
धूर्त साधु और किसान

कविताएँ
अभिज्ञात
ऋतु राय
राहुल शर्मा
सुमित पी.वी

चाँदनी में अभिसारिका
वीटर बायनर
अनुवाद : किशोर दिवसे

चाँद उतरा आसमान से और
ढाँप लिया आश्चर्य से मुझे
उसकी निकटता और स्पर्श से
मैं हो गया सम्मोहित ऐसे
गूँजने लगे प्रेमगीतों के स्वर जैसे
मेघों की गरज, फिर शीतल फुहारें
मैंने झुकाया सर उस चाँद की ओट में
बेसुध था उस स्निग्धता से मैं
और चाँद आ गया एकदम पास
पक्षियों के कलरव ने जगाया देहभास
सर उठाया तो निशा ने कहा अलविदा
यामिनी के स्याह को ले उड़ी वे रश्मियाँ

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