आइए पढ़ते हैं : जोतीराव गोविंदराव फुले की कालजयी कृति :: गुलामगीरी
कविता इस पखवारे संपादकीय परिवार

           आंबेडकर
           बिपिन गोहिल 

पाँच हजार साल बाद
इन अँधेरी गलियों में
अभी-अभी
सूरज की कुछ किरणें फैलीं
उजाला हुआ पल में
गिरे हैं कुछ खंडहर
अभी अभी
जमीं में गाड़ दिया था जिन्हें
वे सर जरा ऊपर उठे
आँखों ने देखा
आसमाँ

अभी-अभी
तप कर लाल हुई
अस्तित्व की काली
छाया
अभी-अभी
दिल के द्वार
खुले
जरा से होंठ
हिले
उद्घोषित हुआ
रुग्ण इतिहास के
कलेजे को चीरता
गर्म, उग्र, सख्त
फिर भी बहुत हितकर
शब्द
समय के बलशाली
हाथ ने लिख दिया
जीवन किताब में
शब्द : आंबेडकर... आंबेडकर !
                 (अनुवाद : साहिल परमार)  

  डॉ. भीमराव आंबेडकर उर्फ बाबा साहब
लोकनाथ यशवंत

असंख्य मनुष्यों का क्रुद्ध समूह
मुख्य मार्ग पर लुढ़कता हुआ आया
उन्होंने शहर में मूर्तियाँ तोड़ना शुरू किया
किसी का सर फोड़ा, किसी को पूरा ध्वस्त कर दिया
किसी को जमीन पर पटका और किसी को विरूप किया अंतिम क्षण
वे मेरी मूर्ति के पास आए

क्रुद्ध समूह से
एक व्यक्ति दबे पाँव आगे आया
और
बिना किसी श्रम के
उसने मेरी दिशा दिखाने वाली उँगली
उसी क्षण तोड़ डाली              
               (अनुवाद : शैलेंद्र चौहान)


वीजा के लिए इंतजार
भीम राव आंबेडकर
अनुवाद : सविता पाठक

कोई आंबेडकर कैसे बनता है? यह लंबा वृत्तांत इसी प्रश्न का जवाब है। आश्चर्य की बात यह है कि डॉ. आंबेडकर इतनी तटस्थता के साथ यह सब कैसे लिख सके जो बचपन में और बाद में उनके साथ बीता। आज हम सब डॉ. आंबेडकर को जानते हैं, पर इसका एहसास कम ही लोगों को है कि इतने प्रतिभाशाली और काबिल होने के बाद भी सिर्फ महार परिवार में जन्म होने के कारण उन्हें कैसी-कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। एक बार तो वे मरते-मरते बचे। भारतीय संविधान ने अछूतपन को खत्म कर दिया है। पर देश के बहुत-से हिस्सों में आज भी वही कानून चल रहा है, जो दलित को सार्वजनिक कुएँ या तालाब से पानी पीने को रोकता है। भारत के विश्वविद्यालयों में डॉ. आंबेडकर की ऐसी कोई किताब शायद नहीं पढ़ाई जाती, पर उनकी पुस्तिका ‘वेटिंग फॉर वीजा’ संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल है। पुस्तिका के संपादक प्रो. फ्रांसेज डब्ल्यू. प्रिटचेट ने आंतरिक साक्ष्यों के आधार पर अनुमान लगाया है कि यह 1935 या 1936 की रचना है। ‘वेटिंग फॉर वीजा’ का प्रकाशन पहले पहल पीपल्स एजुकेशन सोसायटी द्वारा 1990 में हुआ था। डॉ. आंबेडकर की पांडुलिपि भी वहीं उपलब्ध है।

निबंध
भीम राव आंबेडकर
हिंदुत्व का दर्शन
अस्पृश्यता - उसका स्रोत
क्या पाकिस्तान बनना चाहिए?
जातिप्रथा और धर्म-परिवर्तन
जातिप्रथा का अभिशाप
नारी और प्रतिक्रांति
बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स
भारत में जातिप्रथा
वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया
प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि : कृष्ण और उनकी गीता

विमर्श
कँवल भारती
जमीन के सवाल और डॉ. आंबेडकर
राहुल सांकृत्यायन और डॉ. आंबेडकर

संजय कुमार
मीडिया में डॉ. आंबेडकर
एकवर्ण समाज चाहते थे डॉ. आंबेडकर

बसंत त्रिपाठी
राष्ट्रभाषा हिंदी और डॉ. आंबेडकर

प्रमोद मीणा
राष्ट्रवाद का आंबेडकरी पाठ

वीरेंद्र सिंह यादव
भीम राव आंबेडकर और दलित चिंतन की प्रतिबद्धता : परवर्ती आंबेडकरवाद या दलित नवजागरण युग

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ISSN 2394-6687

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