आइए पढ़ते हैं : वीरेन डंगवाल की कविताएँ
विशेष इस पखवारे संपादकीय परिवार

लघुकथाएँ
निधि जैन

नाम

"कुछ भी हो नाम नहीं बदलूँगी मैं।"
    "अरे पर फिर समाज रिश्तेदार इन लोगों का क्या..."
    "वो तुम जानो..."
    लड़का मायूस होकर, "ठीक है बात करूँगा"।
    कुछ दिनों बाद एक मुलाकात के दौरान लड़का, "जान,खुशखबरी है तुम्हारे लिए..."
    आँखें फैलाते हुए लड़की, "क्या??"
    "घरवाले राजी हो गए है..."
    "अब कैसे मान गए..."
   "वो पार्षद के चुनाव होने हैं, उसमे मेरी नेतागिरी और तुम्हारा आरक्षण..." आँख मारते हुए।

विश्वास

"लो, मैं, घर से जो कुछ भी हाथ लगा, गहने-पैसे सब ले आई हूँ, अब तो हम शादी कर सकते हैं न, अब तो पैसे की भी कोई कमी नहीं होगी", अनिल का साथ मिल जाने की उम्मीद में खुशी से आँखें चमकाती रीना बोले ही जा रही थी। अनिल की आँखें पैसे और गहने देखकर बाहर को निकली जा रहीं थी। वह विश्वास नहीं कर पा रहा था कि पापा की लाड़ली बेटी ऐसा भी कर सकती थी उस जैसे मूल्यविहीन इनसान (?) के लिए। फिर सोची समझी साजिश के तहत धाँय की एक जोरदार आवाज हुई। चारों तरफ शून्य बटे सन्नाटा पसर गया। अनिल ने जल्दी जल्दी गहने रुपये समेटे और भाग गया।
    रीना का किया गया विश्वासघात फलीभूत हो गया था।

डर

"रुक, सुन, माँ को मत बोलना कुछ भी..., ठीक है।"
   "पर क्यूँ माँ को सब बताना जरूरी नहीं है क्या?"
    "अरे तू नहीं समझेगी..."
    "पर क्यूँ?"
    "अरे, माँ को पता चला तो घर से निकलना बंद हो जाएगा।"
    "पर क्यों..?"
  "अरे, बापू को नहीं जानती क्या... कितनी मुश्किल से तो जाने देते हैं, पढ़ने। अम्मा का जीना दूभर कर देंगे।"
    "पर इन लोगों ने फिर कुछ किया तो..."
   "कुछ नहीं फिर पिटेंगे साले, चल, अब मुँह बंद कर और घर चल, बहुत देर हो गई।"

प्रकाश

"सुनती नही है... कितनी बार कहा है, बाद की रोटियाँ बिना घी की रखा कर। बच जाएँ तो बाई को देने में दुख तो न लगे।" ठाकुर जी के आगे शुद्ध घी का दीपक मिलकाती अम्मा जी अपनी दुल्हन को डाँट पिलाती बोली।
    दुल्हन प्रकाश से भरे हुए कमरे में दीपक मिलकाने का औचित्य सोचती हुई, सारी रोटियाँ घी से चुपड़ कर अपने मन के प्रकाश से रसोई और धर्म को फिर से प्रकाशित कर देती है।

कहानियाँ
तेजेंद्र शर्मा

प्रवासियों की बड़ी संख्या यूरोप और अमेरिका में रहती है। प्रवासी अपने साथ अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म, खानपान, पहनावा, विश्वास और जीवन शैली आदि लेकर जाते हैं। वहाँ यूरोप में उनका सामना एक भिन्न भाषा, संस्कृति और जीवन शैली से होता है। तेजेंद्र शर्मा की कहानियाँ मुख्य रूप से इसी सांस्कृतिक तनाव की कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ इन संस्कृतियों के टकराव और साहचर्य के बीच का एक सघन दृश्य पेश करती हैं। इन कहानियों के चरित्र अपनी संस्कृति और पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं तो यूरोपीय संस्कृति और जीवनशैली अपना भी रहे हैं। खास तौर पर नई पीढ़ी के लोग जो वहीं पर जन्में, पले-बढ़े और जवान हुए। यही नहीं यूरोप, खासकर इंग्लैंड के साथ भारत का ऐतिहासिक संबध भी कई बार चरित्रों को एक स्वाभाविक तनाव देता है। तेजेंद्र शर्मा की यहाँ प्रस्तुत पंद्रह कहानियाँ एक अर्थ में अपनी अस्मिता की खोज की भी कहानियाँ है।

संस्मरण
चित्रा मुद्गल
संपादन में नया प्रतिमान रचने वाले - रवींद्र कालिया
सत्यकेतु सांकृत
बाबूजी के बिना दीवाली
शैलेंद्र चौहान
कवि से कहीं जियादा बड़े मनुष्य थे वीरेन डंगवाल

आलोचना
संजीव कुमार
जो सुलझ जाती है गुत्थी...
'कैसे' का भी अपना 'क्या' है

निबंध
कुबेरनाथ राय
सच बोलना ही कविता है !

विशेष
मनोज कुमार राय
भारतीयता की तलाश और श्री कुबेरनाथ राय

व्यंग्य

सुशील सिद्धार्थ
एक था राजा
किंतु परंतु लेकिन
बीमारी, तीमारदारी, दुनियादारी
इतना याद रहना खतरनाक है
कद की कवायद

कविताएँ

राकेशरेणु
असीमा भट्ट
उर्मिला शुक्ल

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
अरुणेश नीरन
फोन - 07743886879,09451460030
ई-मेल : neeranarunesh48@gmail.com

समन्वयक
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ISSN 2394-6687

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