आज की प्रविष्टि :: अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी :: निबंध :: बड़का जामुन
स्मरण इस हफ्ते देशांतर

भुवनेश्वर
शमशेर बहादुर सिंह

1
न जाने कहाँ किस लोक में आज, जाने किस
सदाव्रत का हिसाब बैठे तुम लिख रहे होगे (अपनी
भवों में?) - जहाँ पता नहीं प्राप्‍त भी होगा
तुम्‍हें कोरी चाय या एक हरी पुड़िया का बल
भी? ...हिसाब; मसलन् : ताड़ी कितने
की? - कितने की देसी? - और रम?...
कितनी अधिक-से-अधिक, कितनी कम-से-
कम? कितनी असली, कितनी...।

(इनसान रोटी पर ही जिंदा नहीं : इस
सच्‍चाई को और किसने अपनी कड़ु ई मुसकराहट -
भरी भूख के अंदर महसूस किया होगा
एक तपते पत्‍थर की तरह, भुवनेश्‍वर,
जितना कि तुमने !)

2
फिर फ्रेम से उतरकर सांइडार-अंगों की
अपनी अजीब-सी खनक और चमक लिये
गोरी गुलाबी धूप
एक शोख आँख मारती-सी गिरती है
मौन एकांत... किसी सूने कारिडार में या र्इंटों
के ढेर पर या टपकती शराब के पसीने-सी
आसानी छत के नीचे,

कहीं भी, जहाँ तुम बुझी-बुझी सी अपनी गजल-
भरी आँखों में

         

अनोखे पद एजरा पाउंड के
या इलियट के भाव वक्‍तव्‍य
पाल क्‍ली के-से सरल घरौंदें के डुडूल्‍स में
सँजोकर

दियासलाइयों और बिजली के तार से सजाकर,
अखबार के नुचे हुए
कागजों से छाकर, तोड़ देते होगे,
सहज, नये मुक्‍त छंदों की तरह, और
हँस पड़ते होगे निःसारता पर इस कुल
              आधुनिकता की।

3
'भूले हैं बात करके कोई'...;...
'भूले हैं बात करके कोई
                         राजदाँ से हम!'...
'अल्‍लह री नातवानी' कि हम... हम -
               'दीवार तक न पहुँचे।'
'रऽम - रामा - हो रामा - अँखियाँ
           मिलके बिछुड़ गयीं...
           अँखिया...!'

4
ओ बदनसीब शायर, एकांकीकार, प्रथम
वाइल्डियन हिंदी विट्, नव्‍वाब;वाब
फकीरों में, गिरहकट, अपनी बोसीदा
जंजीरों में लिपटे, आजाद,
भ्रष्‍ट अघोरी साधक!
जली हुई बीड़ी की नीलिमा-से रूखे होंट ये
           चूमे हुए

             किसी रूथ के हैं -
                किसी एक काफिर शाम में
                     किसी ऽ
                        क्रास के नीचे...
                     वो दिन वो दिन दिन
                     अजब एक लवली
                     आवारा यूथ के हैं जो
धुँधली छतों में, छितरे बादलों में कहींकहीं
                     बिखर गये हैं, वो
खानाखराब शराब के
शोख गुनाहों-भरे बदमाश
खूबसूरत दिन ! वो
           एक खूबसूरत सी गाली
                       थूककर चले गये हैं वहीं कहीं...

         

हाँ, तपती लहरों में छोड़ गये हैं वो
संगम, गोमती, दशाश्‍वमेध के कुछ
सैलानियों बीच
न जाने क्‍या,
एक टूटी हुई नाव की तरह,
जो डूबती भी नहीं, जो सामने ही हो जैसे
और कहीं भी नहीं!
(1958)

शब्दकाया
(आत्मकथा)
 सुनीता जैन

वरिष्ठ लेखिका सुनीता जैन की यह आत्मकथा एक बौद्धिक स्त्री की जीवन-यात्रा की ईमानदार गाथा है। इसमें उनका निजी जीवन भी है और साहित्यिक दुनिया भी। निजी और सार्वजनिक के बीच जितना संतुलन स्त्रियों को साधना पड़ता है उतना पुरुषों को नहीं। शायद यह भी एक वजह है कि स्त्री लेखकों की आत्मकथाएँ कई बार अतिशय आत्मकेंद्रित हो जाती हैं और अपने संघर्षों और उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करती हैं। सुखद है कि यह आत्मकथा इन अतिरेकों से पूरी तरह से मुक्त है। इसे पढ़ना एक ऐसे जीवन को पढ़ना और गुनना है जो जितना मार्मिक है उतना ही अर्थ से भरा हुआ भी। एक बेहद पठनीय कृति।

कहानियाँ
पुरुषोत्तम अग्रवाल
पैरघंटी
नाकोहस
चेंग-चुई
चौराहे पर पुतला

आलोचना
राजीव रंजन गिरि
हीरा भोजपुरी का हेराया बाजार में
(संदर्भ : भिखारी ठाकुर के जीवन और रचनाकर्म
पर केंद्रित संजीव का उपन्यास सूत्रधार)

जीवन और सृजन
गरिमा श्रीवास्तव
लाला श्रीनिवास दास
कृपाशंकर चौबे
महाश्वेता देवी का जीवन और साहित्य

रंगमंच
डॉ. सुप्रिया पाठक
प्रतिरोध की संस्कृति, नुक्कड़ नाटक और महिलाएँ

कविताएँ
अर्पण कुमार
संतोष कुमार चतुर्वेदी
स्वप्निल श्रीवास्तव

हिंद स्वराज
पंद्रहवाँ खंड : इटली और हिंदुस्तान
मोहनदास करमचंद गांधी


पिछले हफ्ते

बिदेशिया
(नाटक)
 भिखारी ठाकुर

स्मृति
शिव कुमार मिश्र
पदयात्री संत और भूदान यज्ञ

विमर्श
प्रभु जोशी
हिंदी के विस्थापन का दौर

यात्रा-वृत्तांत
एकांत श्रीवास्तव
नो हार्ड शोल्डर फॉर फोर हंड्रेड यार्ड्स : लंदन

कहानियाँ
प्रेमचंद सहजवाला
शिकार
दिशा...
दोस्ती
ईथर
सुरंग
दो ईडियट

कविताएँ
मृत्युंजय
गिरिधर करुण
राजेंद्र प्रसाद पांडेय
खुआन रामोन खिमेनेज

कविताएँ
पर्सी बिश शेली

कवि का स्वप्न

कवि के ओठों पर निद्रामग्न प्रेमदक्ष
स्वप्न में डूबे अगणित यक्ष
श्वासों में हो रहे थे स्पष्ट प्रतिध्वनित
उनके नश्वर, मानवी सुखों को अर्पित
पीछा करती हैं आकृतियाँ विचारों के झंझावात में
साँझ तक खोया है कवि जिनके चुंबनों में
झील पर प्रखर पावन सूर्य का प्रतिबिंब
पीली मधुमक्खियों के छत्तों की मानिंद
फिर भी विचारों के बीहड़ में हैं गुंफित
तंतुओं के तार... शब्दों के मणि अगणित
यथार्थ रूप में प्रकट हो जाते हैं सूत्र
साकार हो जाते है सारे मानसपुत्र

उसके लिए

संगीत के सुर गूँजते हैं मीठी यादों में
प्रेमालाप की धुन जब हो जाती है गुम
गमक एहसास कराती है गंध का
मुरझा जाते हैं जब महकते फूल
प्रेमिल गुलाबों के मुरझाने पर पंखुड़ियाँ
प्रेमिका के लिए रचती हैं मखमली सेज
और जब विचार भी कहीं हो जाते हैं गुम
उनींदी होने लगती हैं प्रेम की बोझिल आँखें

         

विरही परिंदा

बिछड़ी माशूका के गम में मायूस था
विरह से व्यथित एक विरही परिंदा
बैठा था काँपती डाल के कोने पर
गुमसुम... यादों के हसीं हिंडोले पर
सीना चीर रही थी ऊपर हवाएँ सर्द
नीचे बहता झरना भी हो गया था बर्फ
बेरौनक थे बेपत्ता जंगलों के नंगे ठूँठ
जमीन पर भी नहीं गिरा था एक भी फूल
खामोश थी हवाएँ... एकदम बेजान
गाहे-ब-गाहे चीखती थी पवनचक्की नादान
                (अनुवाद - किशोर दिवसे)

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