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दंतकथा
होर्हे लुईस बोर्हेस
हाबिल की मृत्यु के बाद एक दिन अचानक कैन और हाबिल की मुलाकात हो गई। वे रेगिस्तान से होकर गुजर रहे थे और दोनों ने एक-दूसरे को दूर से ही पहचान लिया क्योंकि
दोनों ही काफी लम्बे थे। दोनों भाइयों ने जमीन पर बैठकर आग जलाई और खाना खाया। शाम घिरना शुरू होने पर जैसा कि थके-माँदे लोग करते हैं, वे चुपचाप बैठे रहे।
आसमान में एक तारा टिमटिमाया, हालाँकि उसे अभी तक कोई नाम नहीं दिया गया था। आग की रोशनी में कैन ने देखा कि हाबिल के माथे पर पत्थर की चोट का निशान है। उसके
हाथ से वह कौर गिर गया जिसे वह अपने मुँह तक ले जा रहा था और उसने अपने भाई से उसे माफ कर देने के लिए कहा।
"मुझे मारने वाले तुम थे, या मैंने तुम्हें मारा था?"
हाबिल ने जवाब दिया, "मुझे कुछ याद नहीं है, हम यहाँ एक साथ हैं, पहले की तरह।"
"अब मैं समझ गया कि तुमने सचमुच मुझे माफ कर दिया है," कैन ने कहा, "क्योंकि भूलना, माफ करना होता है। मैं भी भूलने की कोशिश करूँगा।"
"हाँ," हाबिल ने धीरे से कहा, "जब तक पछतावा रहता है, गुनाह भी रहता है।"
(अनुवाद : मनोज पटेल)
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युद्ध
प्रतिभा कटियार
जीवन जैसा वो है उसे वैसा स्वीकार करने से बड़ी आपदा कोई नहीं। हालाँकि हर समझदार व्यक्ति यही सलाह देता है कि जीवन के सत्य को स्वीकार करो। शांति तभी संभव है।
तो भाई, शांति नहीं चाहिए। आप समझदार, ज्ञानी लोग अपनी शांति अपने पास ही रख लो। हम तो मूरख, अज्ञानी ही भले। क्योंकि जीवन जैसा वो है वैसा मुझे स्वीकार नहीं।
संभवतः यही वजह है कि युद्ध मुझे पसंद हैं। प्रतिरोध पसंद हैं।
युद्ध वो नहीं जो सीमा पर लड़े जाते हैं। युद्ध वो जो अपने भीतर लड़े जाते हैं। जिसमें किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का पिता या किसी का प्रेमी शहीद नहीं
होते बल्कि जिसमें हर पल हम खुद घायल होते हैं और अक्सर शहीद होने से खुद को बचा लेते हैं।
जाने क्यों लड़ती रहती हूँ हर पल। किससे लड़ती रहती हूँ आखिर। खुद से ही शायद। अपनी ही शांति को खुरचते हुए राहत पाती हूँ। भीतर की तड़प, बेचैनी, उनसे बाहर आने
की जिद, जो जैसा है उसे वैसा स्वीकार न करने की जिद जीवन में होने के संकेत हैं। जितना भीषण युद्ध उतना सघन जीवन।
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