आइए पढ़ते हैं : भवानीप्रसाद मिश्र की कविताएँ
देशांतर - कविताएँ इस पखवारे संपादकीय परिवार

यह यकीन करना कितना मुश्किल है
वाल्झीना मोल्त

यह यकीन करना कितना मुश्किल है
कि आज हम जितने हैं
कभी इससे भी कमसिन हुआ करते थे
कि हमारी खाल इतनी पारदर्शी हुआ करती थी
कि नसों शिराओं की नीली स्याही झाँकती थी उससे होकर
जैसे स्कूल कि कॉपिओं के जर्द पन्ने पे खिंची हों नीली लाइनें
कि यह दुनिया एक यतीम कुत्ते की मानिंद थी
जो छुट्टी के बाद हमारे साथ खेला करता था
और हम सोचते थे कि एक दिन इसे हम अपने घरों में लिए जाएँगे
हम ले जाते, इससे पेश्तर कोई और बाजी मार ले गया
उसे एक नाम दिया
प्रशिक्षित किया कि अजनबियों को देखो तो भौंको
और अब हम भी अजनबियों के घेरे में आते थे
और इसी वजह से देर रात हम जाग पड़ते
और अपनी टीवी सेट की मोमबत्तियों को जला देते
और उनकी गर्म रौशनी की आँच में हमने पहचानना सीखा
चेहरों और शहरों को
और सुबहिया हिम्मत से लैश होकर
फ्राइंग पैन से उतार फेंकना सीखा ओम्लेट को
लेकिन हमारा कुत्ता किसी और के फीते से बँधा बड़ा होता रहा
और हमारी माँओं ने अचानक हमें मर्दों के साथ सोने
और आज की तारीख में देखने से मना कर दिया
किसी बेदाग कल्पना में खोने की सोचना कितना आसान होता है।

                            अनुवाद - कुणाल सिंह

 

प्यार
गिर्गिस शौकरी

खिड़की को देखकर बादल हँस पड़ा है
दोनों बिस्तरे पर निढाल हो पड़ते हैं
धीरे धीरे अपने कपड़े उतारते हैं
देखो
बिस्तरे की सिलवटों में वे टूट गिरे हैं
बिस्तर उनकी निझूम नींद को अगोर रहा है
बरजता है अलमारी में रह रहे कपड़ों को
कि आवाज मत करो
दीवारें पडोसियों से चुगली कर
भीतर का भेद बताती हैं
और छतें न्यौता देती हैं आकाश को
कि आओ घर के सब मिल जुल बैठें, बातें हों
दीवारों की देह से एक बहुत बड़ी हँसी छूटकर भाग रही है
जल्दी से पकड़ो
हमें उसे पकड़ लाना ही होगा
वरना पूरी दुनिया हँसते हँसते फट पड़ेगी।

                            अनुवाद - कुणाल सिंह

कहानियाँ
चंद्रकांता

चर्चित कथाकार चंद्रकांता की कहानियाँ विस्थापन से उपजी पीड़ा और अवसाद की कहानियाँ हैं। कश्मीर और कश्मीरियत इनकी कहानियों के केंद्र में है। वह इस बात की तह में जाती हैं कि आखिर वह कौन सी स्थितियाँ हैं जिन्होंने जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर को एक जलते हुए नर्क में बदल दिया, जिन्होंने एक दूसरे के साथ सुख-दुख बाँट रहे कश्मीरी पड़ोसियों को एक दूसरे की तरफ से मुँह फेर लेने को विवश किया। इन सवालों के जवाब वह मनुष्यता के रचनात्मक धरातल पर तलाशती हैं। शायद इसीलिए तमाम नकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद उनके किरदार जिंदगी में भरोसा रखते हैं और अपनी लड़ाई जारी रखते हैं। यहाँ प्रस्तुत उनकी सात कहानियों - अलग-अलग इंतजार, आवाज, काली बर्फ, थोड़ा-सा स्पेस अपने लिए, दहलीज पर न्याय, बेगाने देश में और शायद संवाद - को उनकी प्रतिनिधि कहानियों के बतौर भी पढ़ा जा सकता है।

परंपरा
राधावल्लभ त्रिपाठी
संस्कृत साहित्य में स्वाधीन स्त्रियाँ

कालजयी कहानी
विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक
मनुष्यता का दंड

आलोचना
रवि रंजन
प्रगतिशील कविता में शमशेरियत की शिनाख्त

विमर्श
गरिमा श्रीवास्तव
इतिहास और आख्यान

देशांतर - व्याख्यान
यासुनारी कावाबाता
खूबसूरत जापान और मैं

बाल साहित्य
मनोज कुमार गुप्ता
कविताएँ

व्यंग्य
सुशांत सुप्रिय
दुमदार जी की दुम

सिनेमा
विमल चंद्र पांडेय
नियति के हाथों में झूलती ‘जु-डोउ’
जनता की असली सच्चाई बयान करती ‘द सेवन समुराई’

कविताएँ
स्वप्निल श्रीवास्तव

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
अरुणेश नीरन
फोन - 07743886879,09451460030
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समन्वयक
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कार्यालय सहयोगी
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ISSN 2394-6687

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