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कविता

अपने आदिम रूप में
नीलोत्पल


मैं अपने खोए जंगल में घुसता हूँ
जहाँ दिखाई देती हैं कुछ बस्तियाँ
जिन्हें चिन्हित नहीं किया जा सकता
उनमें अँधेरे और उजाले के लिए
कुछ नहीं है
वे भरी हैं ऊब और काई से
रंग और परदों से

मैं कुछ नहीं कर सकता उनके लिए
जिन्हें बचाया जाना जरूरी नहीं था

मैं हूँ अपने तरीकों में
पुरातन कोई धातु, चित्र या प्रतीक
मैं अपने आदिम रूप में प्रवेश करते हुए
रखता हूँ आने वाले कल के लिए खुद को
मैं भरा हुआ हूँ आखिर तक और रिक्त भी
मैं जिस व्यक्ति की हार में रह गया
और जो दूर तलक दिखाई नहीं देते
वह बच्चा और बूढ़ा, आखिरी छोर पर खड़े
देते हैं दस्तक कि
अब तुम्हें दरवाजे खोलना चाहिए...

मैं सरक कर एक पत्थर हटाता हूँ
मुझे सुनाई पड़ती है गहरे कुओं से कुछ आवाजें
जैसे कुछ मुझ पर चोट करता हुआ

मैं आदिम रूप में चमकता एक पत्थर
मुझे अपने लिए गवाही नहीं चाहिए
मैं कहता हूँ -

मैं हूँ उन सब में जहाँ से मुझे हटाया गया
मैं लकड़ी में हूँ आरियों से कटता
और नए आकार लेता
मुझे उन गलियों में देखो
जहाँ तुमने छोड दिए
नमक, रोटी के टुकडे, छिलके, दूध और गंदा पानी
मैं गला नहीं
अब भी वहीं चमक
और आकार लेने की क्षमता से भरा हूँ

मैं ईश्वर के गंदे नाले में बहाया गया
एक फुनगा, तिनका या रक्त की एक बूँद नहीं
जो कहीं नहीं पहुँचा
जिसने सिर्फ खोया और खोया
या मैं वह नहीं जो होना चाहता था
या जिसे मार दिया गया
मैं यह हूँ स्वयं को रखता हुआ तुम्हारे सामने
मैं एक आदिम शब्द
मिथकों और अवास्तविक दुनिया से दूर

मैं अपने ढहने और मारे जाने से
बिलकुल भी खौफजदा नहीं हूँ

मैं लाया गया या छोड़ा गया हो सकता हूँ
त्यागा गया या सहलाया गया हो सकता हूँ

लेकिन मैंने रोपी हैं जड़ें

जब कोई पेड़ इस कदर बड़ा हो गया कि
मेरे हाथ पहुँचते नहीं अपने घुटनों तक
काटा है कुल्हाड़ी से

और यही कहता हुआ आता हूँ कि
जीवन तर्क हीन नहीं हो सकता
जारी रखो...
हम वैसे भी नहीं जी सकते
बचाव की मुद्रा में

क्योंकि जो हथियार हमें मारता है
वह तलवार या भाला नहीं

हमें घायल वजूद को देखना चाहिए
जिसने विचारों की पटरी पर दौड़ लगाई
जो मारा नहीं जा सका

अंततः जो जंगल हम छोड़ना नहीं चाहते
वे साथ रहेंगे
वे फलते जाएँगे

मैं वह आदिम पशु, वह आदिम गवाह हूँ
जो बार-बार मारा जाता है
मैं उन जलती बस्तियों से नहीं लौट पाया
जिसने पराजित अक्षरों में कहा
मेरी मृत्यु इच्छाओं के लिए नहीं
खुद को पहचानने की अक्षमता से हुई

अंततः हम बाहर नहीं आ सकते
हमारे युद्ध पराजित योद्धा की तरह हैं

कोई वक्त ऐसा नहीं रहा
जब चोट नहीं पहुँचाई

उफ! यह हमारा घायल शिश्न
उठता है हिंसा की तरफ

 


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