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नज़ीर अकबराबादी


आशिक कहो, असीर कहो, आगरे का है
मुल्ला कहो, दबीर कहो, आगरे का है
मुफ़लिस कहो, फ़कीर कहो, आगरे का है
शायर कहो, नज़ीर कहो, आगरे का है

 

 
बहारें होली की
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की।
 
हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे।
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे।
दिल भूले देख बहारों को, और कानों में आहंग भरे।
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे।
कुछ घुंघरू ताल झनकते हों, तब देख बहारें होली की।।
 
गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।।
 
और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवौयों के लड़के।
हर आन घड़ी गत भिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के।
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के।
कुछ लचकें शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के।
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।
 
यह धूम मची हो होली की, और ऐश मज़े का झक्कड़ हो।
उस खींचा खींचा घसीटी पर, भड़ुए रंडी का फक़्कड़ हो।
माजून, शराबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुल्फ़ा कक्कड़ हो।
लड़-भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो।
जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की।।
      
 

न सुर्खी गुंचा-ए-गुल में तेरे दहन की
 
न सुर्खी गुंचा-ओ-गुल में तेरे दहन की सी,
न यासमन में सफाई तेरे बदन की सी।
 
गुलों के रंग को क्या देखते हो, ऐ ख़ूबां,
ये रंगतें हैं तुम्हारे ही पैरहन की सी।
 
ये बर्क अब्र में देखे से याद आती है
झलक किसी के दुपट्टे में नौ-रतन की सी।
 
हज़ार तन के चलें बाँके खूब-रू, लेकिन
किसी में आन नहीं तेरे बांकपन की सी।
 
कहाँ तू और कहाँ उस परी का वस्ल 'नज़ीर'
मियाँ तू छोड़ ये बातें दिवानेपन की सी।
      
 
डरो बाबा
बटमार अजल का आ पहुँचा, टुक उसको देख डरो बाबा।
अब अश्क बहाओ आँखों से और आहें सर्द भरो बाबा।
दिल, हाथ उठा इस जीने से,  बस मन मार, मरो बाबा।
जब बाप की ख़ातिर रोते थे, अब अपनी ख़ातिर रो बाबा।
 
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा।।
 
ये अस्प बहुत कूदा उछला अब कोड़ा मारो, ज़ेर करो।
जब माल इकट्ठा करते थे, अब तन का अपने ढेर करो।
गढ़ टूटा, लश्कर भाग चुका, अब म्यान में तुम शमशेर करो।
तुम साफ़ लड़ाई हार चुके, अब भागने में मत देर करो।
       
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा।।
 
यह उम्र जिसे तुम समझे हो, यह हरदम तन को चुनती है।
जिस लकड़ी के बल बैठे हो, दिन-रात यह लकड़ी घुनती है।
तुम गठरी बांधो कपड़े की, और देख अजल सर धुनती है।
अब मौत कफ़न के कपड़े का याँ ताना-बाना बुनती है।
 
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा।।
 
घर बार, रुपए और पैसे में मत दिल को तुम ख़ुरसन्द करो।
या गोर बनाओ जंगल में, या जमुना पर आनन्द करो।
मौत आन लताड़ेगी आख़िर कुछ मक्र करो, या फ़न्द करो।
बस ख़ूब तमाशा देख चुके, अब आँखें अपनी बन्द करो।
      
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा ।।
 
व्यापार तो याँ का बहुत किया, अब वहाँ का भी कुछ सौदा लो।
जो खेप उधर को चढ़ती है, उस खेप को याँ से लदवा लो।
उस राह में जो कुछ खाते हैं, उस खाने को भी मंगवा लो।
सब साथी मंज़िल पर पहुँचे, अब तुम भी अपना रस्ता लो।
 
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा।।
    
कुछ देर नहीं अब चलने में, क्या आज चलो या कल निकलो।
कुछ कपड़ा-लत्ता लेना हो, सो जल्दी बांध संभल निकलो।
अब शाम नहीं, अब सुब्‌ह हुई जूँ मोम पिघल कर ढल निकलो।
क्यों नाहक धूप चढ़ाते हो, बस ठंडे-ठंडे चल निकलो।
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।। 


 

बचपन
क्या दिन थे यारो वह भी थे जबकि भोले भाले ।
निकले थी दाई लेकर फिरते कभी ददा ले ।।
चोटी कोई रखा ले बद्धी कोई पिन्हा ले ।
हँसली गले में डाले मिन्नत कोई बढ़ा ले ।।
मोटें हों या कि दुबले, गोरे हों या कि काले ।
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।1।।
 
      
दिल में किसी के हरगिज़ ने (न) शर्म ने हया है ।
आगा भी खुल रहा है,पीछा भी खुल रहा है ।।
पहनें फिरे तो क्या है, नंगे फिरे तो क्या है ।
याँ यूँ भी वाह वा है और वूँ भी वाह वा है ।।
कुछ खाले इस तरह से कुछ उस तरह से खाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।2।।
 
मर जावे कोई तो भी कुछ उनका ग़म न करना ।
ने जाने कुछ बिगड़ना, ने जाने कुछ संवरना ।।
उनकी बला से घर में हो क़ैद या कि घिरना ।
जिस बात पर यह मचले फिर वो ही कर गुज़रना।।
माँ ओढ़नी को, बाबा पगड़ी को बेच डाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।3।।
 
जो कोई चीज़ देवे नित हाथ ओटते हैं ।
गुड़, बेर, मूली, गाजर, ले मुंह में घोटते हैं ।।
बाबा की मूंछ, माँ की चोटी खसोटते हैं ।
गर्दों में अट रहे हैं, ख़ाकों में लोटते हैं ।।
कुछ मिल गया सो पी लें, कुछ बन गया सो खा लें ।
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।4।।
 
जो उनको दो सो खा लें, फीका हो या सलोना ।
हैं बादशाह से बेहतर जब मिल गया खिलौना ।।
जिस जा पे नींद आई फिर वां ही उनको सोना ।
परवा न कुछ पलंग की ने चाहिए बिछौना ।।
भोंपू कोई बजा ले, फिरकी कोई फिरा ले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।5।।
 
ये बालेपन का यारो, आलम अजब बना है ।
यह उम्र वो है इसमें जो है सो बादशाह है।।
और सच अगर ये पूछो तो बादशाह भी क्या है।
अब तो ‘‘नज़ीर’’ मेरी सबको यही दुआ है ।
जीते रहें सभी के आसो-मुराद वाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।6।।

 

 

फ़क़ीरों की सदा
 
ज़र की जो मुहब्बत तुझे पड़ जायेगी बाबा!
दुख उसमें तेरी रूह बहुत पायेगी बाबा!
हर खाने को, हर पीने को तरसायेगी बाबा!
दौलत जो तेरे याँ है न काम आयेगी बाबा!
 
      
फिर क्या तुझे अल्लाह से मिलवायेगी बाबा! ।।1।।
 
दाता की तो मुश्किल कोई अटकी नहीं रहती
चढ़ती है पहाड़ों के ऊपर नाव सख़ी की
और तूने बख़ीली से अगर जमा उसे की
तो याद यह रख बात कि जब आवेगी सख़्ती
 
      
ख़ुश्की में तेरी नाव यह डुबवायेगी बाबा!
      
यह तो न किसी पास रही है न रहेगी
जो और से करती रही वह तुझसे करेगी
कुछ शक नहीं इसमें जो बढ़ी है, सो घटेगी
जब तक तू जिएगा, यह तुझे चैन न देगी
और मरते हुए फिर यह ग़ज़ब लायेगी बाबा!
 
जब मौत का होवेगा तुझे आन के धड़का
और निज़अ तेरी आन के दम देवेगी भड़का
जब इसमें तू अटकेगा, न दम निकलेगा फड़का
कुप्पों में रूपै डाल के जब देवेंगे खड़का
तब तन से तेरी जान निकल जायेगी बाबा!
 
तू लाख अगर माल के सन्दूक भरेगा
है ये तो यक़ीं, आख़िरश एक दिन तो मरेगा
फिर बाद तेरे उस पे जो कोई हाथ धरेगा
वह नाच मज़ा देखेगा और ऎश करेगा
और रुह तेरी क़ब्र में घबरावयेगी बाबा!
 
उसके तो वहाँ ढोलक औ मिरदंग बजेगी
और रूह तेरी क़ब्र में हसरत से जलेगी
वह खावेगा और तेरे तईं आग लगेगी
ता हश्र तेरी रूह को फिर कल न पड़ेगी 
ऐसा यह तुझे गारे में तड़पायेगी बाबा!
गर होश है तुझ में तो बख़ीली का न कर काम
इस काम का आख़िर को बुरा होता है अन्जाम
थूकेगा कोई कह के, कोई देवेगा दुश्न
जनहार न लेगा कोई हर सुबह तेरा नाम
      
पैज़ारे तेरे नाम पे लगवायेगी बाबा!
      
      
है दुनिया जिसका नाम       

है दुनिया जिस का नाम मियाँ ये और तरह की बस्ती है।
जो महँगों को तो महँगी है और सस्तों को ये सस्ती है।
याँ हरदम झगड़े उठते हैं, हर आन अदालत बस्ती है।
गर मस्त करे तो मस्ती है और पस्त करे तो पस्ती है।
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।
 
जो और किसी का मन रक्खे, तो उसको भी अरमान मिले।
जो पान खिलावे पान मिले, जो रोटी दे तो नान मिले।
नुक़सान करे नुक़सान मिले, एहसान करे एहसान मिले।
जो जैसा जिसके साथ करे, फिर वैसा उसको आन मिले।
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।
 
जो और किसी की जाँ बख़्शे तो उसकी भी हक़ जान रखे।
जो और किसी की आन रखे तो, उसकी भी हक़ आन रखे।
जो याँ का रहने वाला है, ये दिल में अपने जान रखे।
ये तुरत-फुरत का नक़्शा है, इस नक़्शे को पहचान रखे।
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदलपरस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।
 
जो पार उतारे औरों को, उसकी भी पार उतरनी है।
जो ग़र्क़ करे फिर उसको भी, याँ डुबकूं-डुबकूं करनी है।
शमशीर, तीर, बन्दूक़, सिना और नश्तर तीर, नहरनी है।
याँ जैसी जैसी करनी है, फिर वैसी वैसी भरनी है।
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।
 
जो और का ऊँचा बोल करे तो उसका भी बोल बाला है।
और दे पटके तो उसको भी, कोई और पटकने वाला है।
बे ज़ुल्मा ख़ता जिस ज़ालिम ने मज़लूम ज़िबह कर डाला है।
उस ज़ालिम के भी लोहू का फिर बहता नद्दी नाला है।
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।
 
जो और किसी को नाहक़ में कोई झूठी बात लगाता है।
और कोई ग़रीब और बेचारा हक़ नाहक़ में लुट जाता है।
वो आप भी लूटा जाता है और लाठी-पाठी खाता है।
जो जैसा जैसा करता है, वो वैसा वैसा पाता है।
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब दस्ती है।।
 
है खटका उसके हाथ लगा, जो और किसी को दे खटका।
और ग़ैब से झटका खाता है, जो और किसी को दे झटका।
चीरे के बीच में चीरा है, और पटके बीच जो है पटका।
क्या कहिए और 'नज़ीर' आगे, है ज़ोर तमाशा झट पटका।
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अदल परस्ती है।।
इसहाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-ब बदस्ती है।।

 

 रोटियाँ

जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँ।
फूली नही बदन में समाती हैं रोटियाँ।
आँखें परीरुख़ों से लड़ाती हैं रोटियाँ।
सीने ऊपर भी हाथ चलाती हैं रोटियाँ।
 
      जितने मज़े हैं सब ये दिखाती हैं रोटियाँ।।
 
रोटी से जिसका नाक तलक पेट है भरा।
करता फिरे है क्या वो उछल कूद जा ब जा।
दीवार फाँद कर कोई कोठा उछल गया।
ठट्ठा हँसी, शराब, सनम, साक़ी, इस सिवा।
 
      सौ सौ तरह की धूम मचाती हैं रोटियाँ।।
 
जिस जा पे हाँडी, चूल्हा तवा और तनूर है।
ख़ालिक़ के कुदरतों का उसी जा ज़हूर है।
चूल्हे के आगे आँच जो जलती हुज़ूर है।
जितने हैं नूर सब में यही ख़ास नूर है।
 
      इस नूर के सबब नज़र आती हैं रोटियाँ।।
 
आवे तवे तनूर का जिस जा ज़बां पे नाम।
या चक्की चूल्हे का जहाँ गुलज़ार हो तमाम।
वां सर झुका के कीजे दंडवत और सलाम।
इस वास्ते कि ख़ास ये रोटी के हैं मुक़ाम।
 
      पहले इन्हीं मकानों में आती हैं रोटियाँ।।
 
इन रोटियों के नूर से सब दिल हैं पूर पूर।
आटा नहीं है छलनी से छन-छन गिरे है नूर।
पेड़ा हर एक उसका है बर्फ़ी-ओ-मोती चूर।
हरगिज़ किसी तरह न बुझे पेट का तनूर।
 
      इस आग को मगर ये बुझाती हैं रोटियाँ।।
 
पूछा किसी ने ये किसी कामिल फ़क़ीर से।
ये मेह्र-ओ-माह हक़ ने बनाये हैं काहे के।
वो सुन के बोला बाबा ख़ुदा तुझ को ख़ैर दे।
हम तो न चाँद समझें, न सूरज हैं जानते।
 
बाबा हमें तो ये नज़र आती हैं रोटियाँ।।
 
फिर पूछा उसने कहिये ये है दिल का नूर क्या?
इसके मुशाहिदे में है खिलता ज़हूर क्या?
वो बोला सुन के तेरा गया है शऊर क्या?
कश्फ़-उल-क़ुलूब और ये कश्फ़-उल-कुबूर क्या?
 
 
           जितने ही कश्फ़ सब ये दिखाती हैं रोटियाँ।।
 
रोटी जब आई पेट में सौ कन्द घुल गये।
गुलज़ार फूले आँखों में और ऐश तुल गये।
दो तर निवाले पेट में जब आ के ढुल गये।
चौदा तबक़ के जितने थे सब भेद खुल गये।
 
            ये कश्फ़ ये कमाल दिखाती हैं रोटियाँ।।
 
रोटी न पेट में हो तो फिर कुछ जतन न हो।
मेले की सैर ख़्वाहिश-ए-बाग़-ओ-चमन न हो।
भूके ग़रीब दिल की ख़ुदा से लगन न हो।
सच है कहा किसी ने कि भूके भजन न हो।
 
            अल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियाँ।।
 
अब जिन के आगे मालपूये भर के थाल हैं।
पूरे भगत उन्हें कहो, साहब के लाल हैं।
और जिनके आगे रोग़नी और शीरमाल हैं।
आरिफ़ वही हैं और वही साहब कमाल हैं।
 
      पक्की पकाई अब जिन्हें आती हैं रोटियाँ।।
 
कपड़े किसी के लाल हैं रोटी के वास्ते।
लम्बे किसी के बाल हैं रोटी के वास्ते।
बाँधे कोई रुमाल है रोटी के वास्ते।
सब कश्फ़ और कमाल हैं रोटी के वास्ते।
 
            जितने हैं रूप सब ये दिखाती हैं रोटियाँ।।
 
रोटी से नाचे पयादा क़वायद दिखा दिखा।
असवार नाचे घोड़े को कावा लगा लगा।
घुँघरू को बाँधे पैक भी फिरता है जा ब जा।
और इस सिवा जो ग़ौर से देखा तो जा ब जा।
 
            सौ सौ तरह के नाच दिखाती हैं रोटियाँ।।
 
दुनिया में अब बदी न कहीं औ निकोई है।
ना दुश्मनी न दोस्ती ना तुन्दखोई है।
कोई किसी का, और किसी का न कोई है।
सब कोई है उसी का कि जिस हाथ डोई है।
 
      नौकर नफ़र ग़ुलाम बनाती हैं रोटियाँ।।
 
रोटी का अब अज़ल से हमारा तो है ख़मीर।
रूखी भी रोटी हक़ में हमारे है शहद-ओ-शीर।
या पतली होवे मोटी ख़मीरी हो या फ़तीर।
गेहूं जुआर, बाजरे की जैसी भी हो ‘नज़ीर‘।
 
      हमको सब तरह की ख़ुश आती हैं रोटियाँ।।
                                                      कश्फ़=प्रदर्शन; क़ुलूब=हृदय
       
आदमी
 
दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी
और मुफ़लिस-ओ-गदा है सो है वह भी आदमी
ज़रदार बेनवा है सो है वह भी आदमी।
नेमत जो खा रहा है सो है वह भी आदमी
टुकड़े चबा रहा है सो है वह भी आदमी।।
 
   
मस्ज़िद भी आदमी ने बनाई है यां मियाँ।
बनते हैं आदमी ही इमाम और खुतबाख्‍वाँ।
पढ़ते हैं आदमी ही कुरान और नमाज़ यां।
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियाँ।
जो उनको ताड़ता है सो है वह भी आदमी।।
 
यां आदमी पै जान को वारे है आदमी।
और आदमी पै तेग को मारे है आदमी।
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी।
चिल्‍ला के आदमी को पुकारे है आदमी।
और सुनके दौड़ता है सो है वह भी आदमी।।
 
अशराफ़ और कमीने से ले शाह ता वज़ीर।
ये आदमी ही करते हैं सब कारे दिलपज़ीर।
यां आदमी मुरीद है और आदमी ही पीर।
अच्‍छा भी आदमी ही कहाता है ए 'नज़ीर'।
और सबमें जो बुरा है सो है वो भी आदमी।।
 
 
रीछ का बच्चा

कल राह में जाते जो मिला रीछ का बच्चा।
ले आए वही हम भी उठा रीछ का बच्चा।
सौ नेमतें खा-खा के पला रीछ का बच्चा।
जिस वक़्त बड़ा रीछ हुआ रीछ का बच्चा।
जब हम भी चले, साथ चला रीछ का बच्चा ।।
 
था हाथ में इक अपने सवा मन का जो सोटा।
लोहे की कड़ी जिस पे खड़कती थी सरापा।
कांधे पे चढ़ा झूलना और हाथ में प्याला।
बाज़ार में ले आए दिखाने को तमाशा।
आगे तो हम और पीछे वह था रीछ का बच्चा ।।
 
था रीछ के बच्चे पे वह गहना जो सरासर।
हाथों में कड़े सोने के बजते थे झमक कर।
कानों में दुर, और घुँघरू पड़े पांव के अंदर।
वह डोर भी रेशम की बनाई थी जो पुरज़र।
जिस डोर से यारो था बँधा रीछ का बच्चा ।।
 
झुमके वह झमकते थे, पड़े जिस पे करनफूल।
मुक़्क़ैश की लड़ियों की पड़ी पीठ उपर झूल।
और उनके सिवा कितने बिठाए थे जो गुलफूल।
यूं लोग गिरे पड़ते थे सर पांव की सुध भूल।
गोया वह परी था, कि न था रीछ का बच्चा ।।
 
एक तरफ़ को थीं सैकड़ों लड़कों की पुकारें।
एक तरफ़ को थीं, पीर-जवानों की कतारें।
कुछ हाथियों की क़ीक़ और ऊंटों की डकारें।
गुल शोर, मज़े भीड़ ठठ, अम्बोह बहारें।
जब हमने किया लाके खड़ा रीछ का बच्चा ।।
 
कहता था कोई हमसे, मियां आओ क़लन्दर।
वह क्या हुए,अगले जो तुम्हारे थे वह बन्दर।
हम उनसे यह कहते थे 'यह पेशा है "क़लन्दर"।
हां छोड़ दिया बाबा उन्हें जंगले के अन्दर।
जिस दिन से ख़ुदा ने दिया, ये रीछ का बच्चा' ।।
 
मुद्दत में अब इस बच्चे को, हमने है सधाया।
लड़ने के सिवा नाच भी इसको है सिखाया।
यह कहके जो ढपली के तईं गत पै बजाया।
इस ढब से उसे चौक के जमघट में नचाया।
जो सबकी निगाहों में खुबा रीछ का बच्चा ।।
 
फिर नाच के वह राग भी गाया, तो वहाँ वाह।
फिर कहरवा नाचा, तो हर एक बोली जुबां "वाह"।
हर चार तरफ़ सेती कहीं पीरो जवां "वाह"।
सब हँस के यह कहते थे "मियां वाह मियां वाह"।
क्या तुमने दिया ख़ूब नचा रीछ का बच्चा ।।
 
इस रीछ के बच्चे में था इस नाच का ईजाद।
करता था कोई क़ुदरते ख़ालिक़ के तईं याद।
हर कोई यह कहता था ख़ुदा तुमको रखे शाद।
और कोई यह कहता था ‘अरे वाह रे उस्ताद’।
"तू भी जिये और तेरा सदा रीछ का बच्चा" ।।
 
जब हमने उठा हाथ, कड़ों को जो हिलाया।
ख़म ठोंक पहलवां की तरह सामने आया।
लिपटा तो यह कुश्ती का हुनर आन दिखाया।
वाँ छोटे-बड़े जितने थे उन सबको रिझाया।
इस ढब से अखाड़े में लड़ा रीछ का बच्चा ।।
 
जब कुश्ती की ठहरी तो वहीं सर को जो झाड़ा।
ललकारते ही उसने हमें आन लताड़ा।
गह हमने पछाड़ा उसे, गह उसने पछाड़ा।
एक डेढ़ पहर फिर हुआ कुश्ती का अखाड़ा।
गर हम भी न हारे, न हटा रीछ का बच्चा ।।
 
यह दाँव में पेचों में जो कुश्ती में हुई देर
यूँ पड़ते रूपे-पैसे कि आंधी में गोया बेर
सब नक़द हुए आके सवा लाख रूपे ढेर।
जो कहता था हर एक से इस तरह से मुँह फेर।
"यारो तो लड़ा देखो ज़रा रीछ का बच्चा" ।।
 
कहता था खड़ा कोई जो कर आह अहा हा
इसके तुम्हीं उस्ताद हो वल्लाह "अहा हा"
यह सहर किया तुमने तो नागाह "अहा हा"
क्या कहिये ग़रज आख़िरश ऐ वाह "अहा हा"
ऐसा तो न देखा, न सुना रीछ का बच्चा ।।
 
जिस दिन से 'नज़ीर' अपने तो दिलशाद यही हैं।
जाते हैं जिधर को उधर इरशाद यही हैं।
सब कहते हैं वह साहिब-ए-ईजाद यही हैं।
क्या देखते हो तुम खड़े उस्ताद यही हैं।
कल चौक में था जिनका लड़ा रीछ का बच्चा ।।
      
      
     
   
बसंत
 
आलम में जब बहार की आकर लगंत हो।
दिल को नहीं लगन हो मजे की लगंत हो।
महबूब दिलबरों से निगह की लड़ंत हो।
इशरत हो, सुख हो, ऐश हो और जी निश्चिंत हो।
जब देखिए बसंत कि कैसी बसंत हो ।।
अव्वल तो जाफ़रां से मकां ज़र्द ज़र्द हों।
सहरा ओ बागो अहले जहां ज़र्द ज़र्द हों।
जोड़े बसंतियों से निहां ज़र्द ज़र्द हों।
इकदम तो सब जमीनो जमां ज़र्द ज़र्द हों।
जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो ।।
मैदां हो सब्ज साफ चमकती भी रेत हो।
साकी भी अपने जाम सुराही समेत हो।
कोई नशे में मस्त हो कोई सचेत हो।
दिलबर गले लिपटते हों सरसों का खेत हो।
जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो ।।
ऑंखों में छा रहे हों बहारों के आवो रंग।
महबूब गुलबदन हों खिंचे हो बगल में तंग।
बजते हों ताल ढोलक व सारंगी ओ मुंहचंग।
चलते हों जाम ऐश के होते हों रंग रंग।
जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो ।।
चारों तरफ से ऐशो तरब के निशान हों।
सुथरे बिछे हों फर्श धरे हार पान हों।
बैठे हुए बगल में कई आह जान हों।
पर्दे पड़े हों ज़र्द सुनहरी मकान हों।
जब देखिए बसंत को कैसी बसंत हो।
कसरत से तायफ़ों की मची हो उलट पुलट।
चोली किसी की मसकी हो अंगिया रही हो कट।
बैठे हों बनके नाज़नीं परियों के ग़ट के ग़ट।
जाते हों दौड़-दौड़ गले से लिपट-लिपट।
जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो ।।
वह सैर हो कि जावे जिधर की तरफ निगाह
जो बाल भी जर्द चमके हो कज कुलाह
पी-पी शराब मस्त हों हंसते हों वाह-वाह।
इसमें मियां 'नज़ीर' भी पीते हों वाह-वाह
जब देखिए बसंत कि कैसी बसंत हो ।।
 

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