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चिमगादड़ें
टीन की छत पर पहले एक छितराई-छितराई-सी आवाज़ हुई, जैसे किसी शैतान बच्चे ने कंकरियाँ उछाल दी हों एक क्षण एक बोझिल सन्नाटा - और फिर तरड़-तरड़, एक झटके के साथ बौछार खुल कर बरस पड़ी। मारिया चौंक कर उठ बैठी। अभ्यस्त हाथों ने तकिये के नीचे से चश्मा निकाल कर चढ़ा लिया और अपनी चुंधियाई आँखें मिचमिचाती, कुछ देर वह खिड़की के परे पड़ती बूँदों को ताकती रही। मौसम की पहली बरसात थी। एक गुनगुनी गर्मी लिए हुए ज़मीन का सोंधापन उठा और कमरे में भर गया। धारों की चमकीली निरंतरता में बीहड़ हवा आड़े-तिरछे 'पैटर्न' बनाए जा रही थी! एक हल्की बौछार खिड़की की मुंडेर को भिगो गई टप-टप टप-टप कोने की टूटी नाली से चमकीली बूँदें काँप-काँप कर गिर रहीं थीं।
"अरी
कम्बख्त उठ, देख तो कितनी प्यारी बरसात हो रही है।"
- मारिया ने बगल की पलंग पर बेखबर सोती सोनिया का कम्बल खींचा। ममा सूखी तोरई-सी बाँहों से सीना थामे आदतन काँख रही थी - "हाय मेरे ईसू, अब पास बुला ले।" 'हं हं! सभी को बुलाता है एक तेरी ही बारी नहीं आती।' - वह टपकती छत के नीचे चिलमची रखती बुदबुदाई। फिर लगभग चीखते हुए भीतर झाँका - "क्या हुआ? फिर गैस हो रही है क्या पेट में?" - ममा की लगभग अंधी मटमैली-सलैटी आँखें उधर को मुड़ी - "हं अरे जैसी हालत हैं, मैं ही जानता हूँ ऐसा दर्द उठता है कि बस, जान खिंची जाती है। इस डाक्टर लाल की तो दवा ही बेकार है क्या भरोसा इन नेटिव डाक्टरों का - थू" ममा ने पलंग के नीचे रखे पैन में थूक दिया - "मुँह का स्वाद जाने कैसा हो गया है। बस फ़ायदा तो डाक्टर डैनियल की ही दवा करती थी या मेरे ईसू।" बातचीत का रुख मनचाही दिशा में मुड़ता देख, मारिया ने अपनी भरकम देह दरवाज़े से टिका दी और फ़ुर्सत से खड़ी हो गई - "ममा, बात तो ये है कि जब तक तू अपनी जुबान को कन्ट्रोल नहीं करेगी, कोई डाक्टर-हकीम तेरे मर्ज़ की दवा नहीं कर सकता। अब डिनर में ज़बरदस्ती चावल खा ले, ऊपर से चॉकलेट भी चबा ले तो डायबिटीज बिगड़ेगी नहीं क्या?"
ममा का
पोपला मुँह उत्तेजना में ऊँट के थोबड़े की तरह वलवलाने लगा - "तेरा -
सोनिया का क्या है। तुम दोनों के लिये तो मैं बस एक जिन्दा लाश-भर हूँ।
तुम्हारा बस चले तो कुत्ते की तरह बस एक सूखी रोटी डाल दो।" - ममा के
झुर्रीदार गालों पर आँसू चूने लगे - "ठीक कहते थे डॉक्टर डैनियल कि अगाथा,
आदमी का अपना ही खून सबसे ज्यादा दगा देता है! क्या मालूम
था मुझे, मेरे ईसू कि अपनी ही बेटियाँ रोटी-रोटी पर
टोकेंगी- "
पैंट्री
में बूढ़ा सैम्युअल तसले में चावल धो रहा था। लाल बदसूरत चावल। फिर वही
बदबूदार भात मिलेगा,
मारी कुढ़ गई - "क्यों इस बार भी यही सड़ा चावल ले आया तू?"
सैम्युअल उपेक्षा से चावल का पानी निधारता रहा,
पोपले मसूढ़े कुछ हिले। राशन का माल है,
ऐसा नहीं तो कैसा होगा?
"अब
आप तो जैसे जानती ही नहीं" - सैम्युअल ने चिमटे से आग कुरेदी - "हर चीज़ पर
तो बड़ी मेमसा'ब बोलती है कि सस्ते दाम वाली लाना,
अब बारा आने में आजकल सूखी लकड़ी कहाँ से आएगी। बोतल-भर
किरासन का तेल तक तो आता नहीं, ऊपर से डाँटने को हर
कोई..."
कमरे में
सोनिया अपनी सींक-सलाई देह को तोड़ती-मरोड़ती जमुहाई ले रही थी - "
सैम्युअल कहाँ मर गया मारी?
आज चाय ही नहीं लाया सुबह।" सोनिया, जो अनमनी-सी खिड़की को ताक रही थी, अचानक पलटी - "देख, मेरे वाले को इस्तेमाल मत करना। परसों ही डी. सी. एम. से लाई हूँ" - "कौन कर रहा है तेरे तौलिये को इस्तेमाल" - मारिया ने अपना तौलिया स्टैन्ड पर टांग दिया और बाथरूम का दरवाज़ा भिड़ा दिया। कुछ देर दोनों, अपरिचितों की तरह आमने-सामने बैठी एक-दूसरे के परे देखती रहीं। मनहूस चुप्पी को तोड़ती बरसात लगातार गिर रही थी तरड़-तरड़। बन्द खिड़की के शीशों पर पानी की बूँदे एक चमकीली व्यग्रता से टेढ़ी-मेढ़ी होकर रेंग रही थीं। मारी ने चश्मा उतार कर, यत्न से पोंछा और फिर चढ़ा लिया। कुछ देर वह यों ही पैर के अंगूठे से अदृश्य लकीरें खींचती रही। फिर एक सहमी-सी कनखी से उसने सोनिया को ताका - "सोनिया!"
"हूँ?"
- सोनिया माथे पर सलवट डाले, कुछ
सोच-सी रही थी - "तेरे पास चार रुपये होंगे क्या?
मेरी चप्पलें एकदम - "
भडाक।
बाथरूम का दरवाज़ा फिर खुला सोनिया बाल बिखराये,
दहकती खड़ी थी - "मारी, तूने फिर
मेरा ओडीकोलोन लगाया?" गुस्से से उसके होठों के ऊपर
भीगे रोयें काँप रहे थे। कोटरग्रस्त आँखें और भी मिचमिची हो आईं थीं। कहीं
एक तृप्ति की भावना से मारी ने नोट किया कि गुस्से में सोनिया खासी बदसूरत
लगती है।
जिंघम की
रंग-उड़ी नीली फ्राक में लिपटी ममा किसी प्रागैतिहासिक फासिल की तरह
आरामकुर्सी पर उकडू बैठी थी दृष्टिहीन सलेटी आँखें दरवाज़े की ओर मुड़ी -
मारिया ने गले के पास घृणा का ठण्डा-हरा स्वाद महसूस किया- "तेरा ब्रेकफास्ट मँगा दूँ ममा?" बूढ़ी की अंधी आँखों में एक लोलुप चमक गहराई - "पुकारना तो जरा कम्बख्त को बेटा, मेरी तो सुनता ही नहीं मैं तो कहती हूँ मेरी मारिया न हो तो " मारिया ने क्रूरता से ठोकर मारकर दरवाज़ा खोल दिया और बाहर आ गई हँह यह घर। - "अरे सैम्युअल! अभी तक तेरा ब्रेकफास्ट नहीं बना क्या?"
बाहर
बारिश यकायक और तेज़ हो गई तूफ़ान की साँय-साँय में पूरा घर हिल-सा रहा था
- "सैम्युअल!" वह फिर चीखी। सैम्युअल चुपचाप ट्रे रख कर, बाहर निकल गया। पुतली-सी बैठी ममा यकायक चैतन्य हो आई - "टोस्ट गरम तो हैं ना मारी?" मारी नि:शब्द टोस्ट पर मक्खन लगाती रही। बस, खाने की गंध मिली नहीं कि बुढ्ढी की पाँचों इन्द्रियाँ जाग पड़ती है! ममा जबाब न पाकर भी चहके जा रही थी - "सैकरीन की तीन गोली डालना मेरी चाय में! एक-दो गोली से तो मिठास ही नहीं आती " मारिया ने टोस्ट बढ़ा दिया - "ले!"
एक
घृणास्पद उत्सुकता से झुर्रीदार हाथ प्लेंट तलाशने लगे। टोस्ट पर हाथ पड़ते
ही एक बेताबी से ममा ने दबोच लिया और पोपले मसूढ़े परम तृप्ति से उसे
चुभाने लगे - "मक्खन कम लगाया है मारी बेटा,
ज़रा और दे देना!" एक क्षण को मारिया का मन हुआ कि बुढ़िया की गर्दन के पीछे की झुर्रीदार खाल चुटकी में पकड़ कर उसे ऊपर उठा ले, जैसे कुत्ते के पिल्लों को उठाया जाता है, और फिर झकझोर-झकझोर कर मक्खन की तश्तरी में उसकी नाक रगड़ डाले - 'जा किसी होटल में और दो आउंस की टिकिया को हफ्ते-भर चला ले!' अपने ही गुस्से के उफान से पस्त वह बाहर निकल आई - "सैम्युअल! पानी गर्म हो गया हो तो रख देना बाथरूम में!"
सैम्युअल
ने पता नहीं सुना भी या नहीं मारिया चुपचाप बाहर ताकने लगी,
बरसात निढाल होकर थम गई थी। बस, एक
हल्की बौछार-सी पड़ रही थी। झीने पड़ते बादलों के पीछे से कहीं-कहीं आसमान
की सलेटी झाँई भी नज़र आने लगी थी ! चले, गीला
तौलिया तो बाहर डाल दे कम से कम। थके पैरों मारी कमरे में घुस गई! सोनिया
ने हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदल लिए थे और गुनगुनाती हुई बाल ब्रश कर रही थी।
मूड शायद कुछ बेहतर था, मारिया ने हल्के से खँखारा
- "कहीं बाहर जा रही है क्या?"
सोनिया
बाहर चली गई तो चादर बिछाते-बिछाते उसने सिर को झटका - हँह
,
बेकार ही वह भी इन लोगों को लेकर पागल होती हैं। चलें,
नहा लें! अल्मारी से कपड़े निकालती,
वह चौंक पड़ी - सड़ाक्! सड़ाक् - बाहर से ऐसी आवाज आ रही
थी, जैसे कोई बेरहमी से पेड़ों को झकझोर रहा हो
उसने दौड़ कर खिड़की खोल दी, और झाँकने लगी।
अन्दाज़ ठीक ही था, फिर वही स्कूली छोकरे लग्गी
लेकर फल झड़ा रहे थे - "सैम्युअल!" उसकी तीखी आवाज़ कोड़े-सी लपलपाई -
"ज़रा देखना इन कम्बख्तों को!" बच्चों ने अचकचा कर ऊपर ताका। खिड़की पर
मारिया का विराट आकार काले हाउसकोट में लिपटा टँका था
टप्! - वह
चौंक कर पीछे हटी
,
एक कंकड़ी ठीक उसी के पैरों के पास, आकर गिरी -
'चिमगादड़! चिमगादड़!" छ़ोकरों का झुण्ड अब सड़क को
खुली सुरक्षा में घिरा खड़ा था उनके अगुआ ने बाँहें फटफटाते चिमगादड़ का
आकार बनाया - "वो देखो, काली चिमगादड़!"
हवा का एक भटका झोंका आकर खिड़की को फिर खोल गया। बाहर आसमान बच्चे की पहली रूलाई-सा नंगा और तीखा हो आया था...
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