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आखर अरथ -   दिनेश कुमार शुक्ल  

काठ और काठी
 
पक रही है पानी में
शहतीर
आग पर रोटी
रोग में तन
और आत्मा विछोह में ...
 
कीचड़ और पानी में
पक रहा है काठ
सिंहल समुद्र के जल
और वैसवाड़े के पसीने 
से बना
शीशम का यह तना
गोह साँप गिरगिट
की रेंगन से रोमांचित...
तितलियों-सी
पत्तियों से भरा यह शीशम
घर था अनश्वरता का
कोटरों में घोसले 
आँधियों को परास्त करते हुए ...
 
उन्हीं कोटरों में रहते हैं अब
कछुए मुस्कान जैसे मुँह वाले
वहीं से बुलाती है सबको
अनश्वरता
 
कीचड़-पानी में
पक रहा है शहतीर
काठ लोहा हो रहा है
और काठी भी ......
 


 
काया-की-माया रतनजोति
 
तरह-तरह की दूरियाँ
और विस्तार 
पार कर लौटा अपने द्वार
सँभाले भुवनभार,
चौखट पर झूले-
झुके आ रहे हैं किवाँर
मेरे ऊपर
 
लाँघी देहरी-आँगन-दलान
चूल्हा-चौका सारा मकान
जिसमें अब रहता आसमान
धुँधला धुँधला
 
जल्दी में छूट गई थी खूँटी पर कमीज़
सो झूल रही है भारी-भारी
धूल भरी
यह मेरी ही काया किशोर -
वय की छूटी
जो यहीं रही
मिट्टी-पानी में सराबोर
सो अविगत-गति में
सुधियाती-सी
ताक रही है इसी ओर
बाहें निढाल
तन का ताना-बाना मलीन
यह शरदकाल
की कमलनाल

इस बीच न जाने और कौन
आ बैठा टूटी कुर्सी पर
इस ओर पीठ
तो तुम हो ये 
मेरी ही एक और काया
वैसी ही गब्बर और ढीठ !
 
पूरब की तरफ घड़ौंची से
वह कोई एक और निकला
वह कोई बर्तन माँज रहा है
नाली पर
फिर कोई और 
रसोई में... वह रतनजोति !
इतने शरीर यह सब मेरे 
इनसे ही भरता चला जा रहा 
देशकाल...
 
मैं बहुत दिनों के बाद
दूरियों की दुनिया से लौटा हूँ
सो आ पाया हूँ काया में
तुम समझ रहे थे 
क्या यूँ ही 
काया की माया के पीछे
मन पागल डोला करता है !

 
अवगाहन
 
उड़ रही हवा की मलमल
की चादर ओढ़े-ओढ़े
कोई सुन्दरता छुपती
बचती-सी भाग रही थी
 
जाने अनजाने रंगों
की किरने छिटक रही थीं
या छूट रहे थे रंगों 
के तीर उसी के ऊपर
 
उसकी आकृति भी ऐसे
आकार बदल लेती थी
जैसे पानी बादल बन 
कर ऊपर चढ़ जाता है
फिर बरस बरस कर जाने
क्या-क्या कुछ भर देता है
 
वह सुन्दरता भी ऐसे
ही बरस-बरस जाती थी
लेकिन अपने ही भीतर
इस तरह दिनों दिन उसके
अन्तर का गहरा सागर
भर-भर कर उफन-उफन कर
गहराता ही जाता था
 
उसका अवगाहन प्रतिपल
होता जाता था दुष्कर
पहले जितना भी पाने 
के लिए डूबना होता 
था पहले की तुलना में
दस गुना अधिक गहरे में ....  


 
नज़र में घुस कर छुपे नज़ारे 
 
वहीं पे जाकर अटक गया वो जहाँ से कोई निकल न पाये
थका नहीं है मगर ये उलझन इधर से आगे किधर को जाये
अगर  “ किधर ” का पता चले तो कोई बताना उसे बुला कर 
उसे इशारे पता नहीं हैं उसे जगाना हिला-हिला कर
 
वो ऐसी दुनिया का रहने वाला जहाँ पे चीजें खुली हुई थीं
जहाँ की दुनिया में ठोसपन था जहाँ पे कड़ियाँ जुड़ी हुई थीं
बहुत सहल थी जो उसकी दुनिया यही तो उसकी बेचारगी है
उसे यहाँ का पता नहीं है तभी तो इतनी आवारगी है
अटक रहा है भटक रहा है समझता है वो कि  “ सच ” ही सच है
यही तो उसकी कमी है प्यारे, जिसे समझता वो सादगी है
 
ये पेच-ओ-ख़म ये यहाँ की गलियाँ नज़र में घुस कर छुपे नज़ारे
वो जा रहा है जिधर भँवर है अभी ख़ड़ा था इधर किनारे
कोई बताओ उसे कि सच में छुपा हुआ है तिलिस्म कितना
उसे बताओ की सादगी में छुपा हुआ है फ़रेब कितना
अलग-अलग हैं क्यूं इतनी राहें हज़ार रंग की तमाम किस्में
फिर उनमें आपस में भेद इतना अलग-अलग जिन्दगी की रस्में
जो दिख रहा है दो आँख का भ्रम, हज़ार आँखें कहाँ से लाये
उसे बताओ वो खुद से पूछे पता चलेगा किधर को जाये
 
मगर ये   “ खुद ” भी तो एक बला है जो उसके पाले नहीं पलेगी
ये वो दिया है कि जिसकी बाती लहू जो देगा तभी जलेगी
लहू वो इतना कहाँ से लाये कि ज़िन्दगी भर जले ये बाती
रहा जो ज़िन्दा तो साँस लेगा जो साँस लेगा उठेगी आँधी
 
जिधर दिया है उधर ही आँधी, ये ज़िन्दगी ख़ुद विरोध अपना
कभी ये आशा कभी निराशा कभी ये सच है कभी ये सपना
सचाई सचमुच छुईमुई है अगर छुआ तो निढाल होगी
नज़र ने जा कर नज़ारा बदला दिखेगा दिन पर वो रात होगी
कुछ और है वो जो दिख रहा है तो कौन है वो जो लिख रहा है
 
किसी ने फेका है जाल ऐसा गगन के तारे उलझ गये हैं
अब उसकी आँखों की कमसिनी के सभी सितारे भी बुझ गये हैं
तभी से वह सब लगा है दिखने जो उससे अब तक छुपा हुआ था
लगा है फिर वह जुलूस चलने अभी कहीं जो टिका हुआ था
 
 
 
नहीं है उतनी ये बात मोटी सभी को हासिल हो दाल-रोटी
यहीं से उठते सवाल गहरे यहीं से होते जवाब दोहरे
जुड़े यहीं से ख़ुदी के मानी कि आदमी है ख़ुदा का सानी
यहीं से तय अब ये बात होगी कि कौन बोलेगा किसकी बानी
किधर बहेगी नदी समय की किधर ढलेगा अब उसका पानी ।
 
 
 
अपारता
 
रास्ता छेक कर
अड़ी खड़ी है सामने अपारता
मांसल प्रौढ़ प्रथुल नग्न निःशब्द,
पिछले वसन्त का फूला हुआ
पका हुआ एक फूल अपरम्पार
सौंदर्य की सीमान्त रेखा पर
साक्षात् अश्लील रंगों का विस्फोट,
सुगंध की आदिम गुफा के द्वार पर
इस महापद्म की पंखुरियाँ
खो जायेंगी झर कर शरद के पुष्कर में
और
शरद का जल
शरद के जल सा सिंघाड़ों से भरा हुआ
कंटकाकीर्ण मृदुल पुष्ट ....
 
आयेगा निपट निदाघ
कोई उठेगा 
और खड़े-खड़े भाप बन जाएगा,
बालू पर उगेंगे फूलों के पदचिन्ह
बालू पर....
और बालू क्या
समय ही समझो उसे
जो खिसकता जा रहा है तुम्हारी मुट्ठी से ..
 
अपारता के आमने-सामने
खड़े हो तुम
जैसे पृथ्वी आती है सूर्य के सामने 
और सूर्य के कुण्ड में कूद जाती है
जी भर नहाती है....
 

 
विमाता
 
जन्म देने वाली माँ होती है
आग्नेय देश की निवासिनी
चूल्हे की अग्नि की तरह प्रखर,
उबलते हुए दूध,  पकती हुई रोटी
और प्रतिज्ञा में निवास करती है माँ
 
एक माँ और भी होती है
जो शिशु के भीतर समा जाती है
जैसे ही वह खोलता है अपनी आँखें
गर्भ के बाहर की दुनिया में प्रथम बार
 
फिर तो वह
शैशव के सपनों में बनी ही रहती है लगातार,
निद्रा और निद्रा और निद्रा के प्रसार में
गुदगुदाती, चूमती, डराती, घूरती
धीरे-धीरे वह हमारी गगन गुफा में
सीधे आकर बस जाती है
 
इस दूसरी को विमाता कहना
ठीक-ठीक  ठीक तो नहीं
लेकिन अभी चलो यही सही ...
विमाता माता के हाथों में
सिलाई के वक्त सुई चुभो देती है,
रसोई में उसके हाथों पर फफोले धर जाती है,
माँ की आँखों के आसपास अंधेरे के वलय
और कमर में धीरे-धीरे कूबड़ भरती जाती है
विमाता हमारी माता का बहुत ध्यान रखती है
धीरे-धीरे मायके से माता का सम्बन्ध
विमाता ही घटाती जाती है
हमारी माता को वह
गीत से लेकर गद्य तक कुछ भी बनाती है
 
विमाता हमारी माता की छाया है भी
और नहीं भी
वैसे हमने दोनों की छायायें
अलग-अलग पड़ते भी देखी हैं
यद्यपि प्रत्यक्ष विमाता को देखा कभी नहीं
और प्रत्यक्ष भी क्या प्रत्यक्ष,
मेरा प्रत्यक्ष तुम्हारा परोक्ष हो सकता है भाई,
 
विमाता गगन गुफा में वास करती है
और वही हमें अन्तिम जन्म भी देती है
कि हम जा पैदा होते हैं मृत्युलोक में
इस लोक से उठती है झूले की पींग
इतनी ऊँची
कि फिर आती नहीं वापस, आ नहीं पाती  
फीकी
दुपहर के दिये की लौ जैसी
दो आँखें
उदास और अव्यक्त
करना जब महसूस
पीठ पर या गालों पर
तो समझ लेना
अब विमाता तुम्हें गोद भर कर
पालने में झुलाने जा रही है
तब शायद सुन सको
उसकी विचित्र-सी बोली में लोरी भी
प्रथम और अन्तिम बार

 
विलोम की छाया
 
मेरा अपना समय मुझी पर
जटिल-कुटिल मुस्कुरा रहा है
चुप्पी के गहरे पानी में
देख रहा हूँ मैं अपने विलोम की छाया
 
खगकुल-संकुल एक वृक्ष है
मृग-जल के सागर के तट पर,
उसी वृक्ष पर सबकी आत्मा का निवास है
उसकी डालें और टहनियाँ
हैं इतनी छतनार कि उनसे अँटा पड़ा है
देश-काल का कोना-कोना,
उसके पपड़ी भरे तने में
सबके सूखे हुए घाव हैं
सबके ही मन की गाँठें हैं,
तपते हुए मृगशिरा में भी
उस पर आ बसता बसन्त है,
यह सब है
लेकिन उसके फल टपक-टपक कर
मृगमरीचिका के जल में
खोते जाते हैं !
 
फिर औघड़ प्रतिविम्ब की तरह
वही निरावधि काल
उसी विपुला धरती पर
अजब-अजब रंगों में
अपनी छाप लगाता घूम रहा है
जैसे कोई बेकल-पागल
जाने क्या-क्या लिखता फिरता है
दुनिया की दीवारों पर
 
मेरा ही क्यों, बंधु तुम्हारा भी तो है यह समय
कि जिसका रक्त, पसीना,
जिसके आँसू, जिसकी मज्जा औ जिसका उन्माद
बाढ़ की तरह उफन कर फैल रहा है,
डूब रहा है उसके प्लावन में भविष्य भी,
चाहे कुछ भी करो
सभी कुछ ज्यों का त्यों है
नहीं हटाये हटता है दुख सपनों से भी,
उम्मीदें यदि है भी
तो वे दुख के रँग से मटमैली है
पड़ी हुई कोने-अँतरे में पोंछे जैसी
 
खगकुल-संकुलता के भीतर से औचक ही
बहुत दिनों के बाद एक दिन जाने कैसे
बज्र फोड़ती मर्म भेदती
कठफोड़वा की टाक - ठकाठक लगी गूँजने,
लगी गूँजने जैसे
श्रम के सहज तर्क की टक्कर, सीधी टक्कर !
वर्तमान में सेंध लगाते कठफोड़वा के पीछे-पीछे
मैं भी घुसता गया
अगम के तरु - कोटर में --
मैने देखा साम-दाम को, दण्ड-भेद को
गुर्दों के बाजार भाव पर चर्चा करते,
नया धर्म देकर बच्चों को
दिल्ली की मेमों के घर में बर्तन धोने
झुण्ड बना कर बेच रहे थे धर्म प्रचारक,
देखा मैने स्वप्नों को भी दुःस्वप्नों से हाथ मिलाते,
दैत्याकार तितलियों को देखा मैने जीवन रस पीते
मैने बीते हुए समय के मलबे में
भविष्य को देखा-किसी अजीब बनस्पति के सूखे अंकुर-सा
 
मैने खुद को भी अपने विलोम में देखा
देखा मैने अमर सत्य को झूठ बोलते
स्याही सूख नहीं पाती थी शब्द निरर्थक हो जाते थे
इतनी क्षणभंगुर भाषा थी,
मैने देखा वंचित लोगों को वंचक पर फूल चढ़ाते ....
 
दिन ढलने को आया
छाया आत्मवृक्ष की
लम्बी हो कर मुझको खींच ले गई सँग में,
उस छाया की अजर-अमर दुनिया के भीतर
एक झोपड़ी, जिसको बरसों पहले लपटें चाट गई थीं
ज्यों की त्यों अब तक ज़िन्दा थी,
ढिबरी के पीले प्रकाश का सधा राग था
एक काँपती निर्भय लौ थी
जिसकी आभा में सारा जग जाग रहा था
ऊपर-ऊपर भले दिख रहा हो वह सोया
 
गंगा के ऊँचे कगार पर बसे गाँव की
उसी झोपड़ी के छप्पर में
खुँसी हुई थी
कागज के पीले पन्ऩों पर मेरी गाथा,
उस टीले पर अब तक खेल रहा था मेरी माँ का बचपन
धूल भरे वे चरण फुदकते थे कपोत-से,
उलटे घट का लिए सहारा
पार कर रहा था मैं धारा
मँझा रहा था मैं समुद्र को घुटनों-घुटनों
मैं द्वीपों की दन्त कथाओं का अन्वेषक
रहना तुम तैयार, तुम्हारे तट पर भी मैं
आ पहुँचूँगा कभी किन्हीं लहरों पर चलता,
आ जाना तुम साथ
तुम्हारा हाथ पकड़ कर
ओ मेरे विलोम मैं तुमको ले जाऊँगा
रंगमंच के नये दृश्य में जहाँ
द्वन्द्व का तुमुल
पुनः जगने वाला है !
 
मिट्टी का इत्र
 
वैसे तो
ख़ालिस पानी और कमसिन निगाहों तक से
उतारा गया है इत्र एक जमाने में,
लेकिन मिट्टी का इत्र तो अब भी उतारा जाता है
कन्ऩौज में
और मिट्टी जाती है नर्वल के इसी पटकन-तालाब से
 
चूंकि प्रेम-रस वाली एक लस है इस माटी में
सो र्इट पथाई के लिये भी ये पाई गई बहुत ही मुफ़ीद 
लस के रस में
मुनाफ़ाखोर पटक-पटक कर इसे रौंदते
लस बढ़ती, र्इट और खरी उतरतीं, मुनाफा और भी खरा ..
 
पिटते-पिटाते तपाते-तपाते एक दिन
भट्ठों की आग के ताप में मिट्टी ने चुपचाप
मिला दिया अपना भी संताप
फिर तो फदक-फदक र्इटें बन गई खंझल
सात के सातों भट्ठे बरबाद
भट्ठा ही बैठ गया भट्ठेवालों का
मिट्टी का प्रतिशोघ - खंझल के सात पहाड़,
यह हमारे जन्म के पहले की बात है
तब उफान पर रहा होगा भारत का स्वाधीनता संग्राम
 
इन्हीं खंझल स्तूपों पर पर्वतारोहण के साथ
शुरू हुई हमारी जीवन यात्रा
रहा होगा वही समय जब तेनसिंग हिलेरी पहुंचे एवरेस्ट पर
भट्ठों पर उगे रुसाह के फूलों की मिठास बटोरते
झरबेरियां चुनते, सर्प भय से रोमांचित
पृथ्वी आकाश के अनश्वर संगीत में तरंगित
कूदते-फांदते, तमाम नश्वरताओं के साथ-साथ
हम भी बड़े हुए 
उन दिनों वह शक्ति थी हमारे पास
कि पानी पृथ्वी आकाश और आंखों की मुस्कान के अलावा
हम और भी तमाम सुगन्धों को अलग-अलग पहचान लेते थे
और पाते ही हिंसा की दुर्गन्ध कैसी भी
छूटते थे हम तरकश के तीर-से
 
दुर्गन्ध बढ़ती रही
हमारी शक्तियों का लोप हुआ
खो दी हमने पिछले जन्मों की स्मृति
इतने पतन के बावजूद
बहुत कुछ बचा रहा, जैसे- यही मिट्टी का विद्रोह,
रुसाह की झाड़ियाँ, भीटें झरबेरियों की,
इनकी प्रत्येक टहनी से मेरा व्यक्तिगत परिचय है
वाकिफ़ हूँ मैं इनके पत्तों की रग-रग से
जो पतझर से लड़े और बने रहे,
हमारी पीढ़ी को तो और भी गहरी बातें पता हैं
जैसे कि आज भी जीवित हैं बहुत से हठ-
जैसे ये आम के दो पेड़ जिनके फल पकने पर
पीले नहीं बल्कि और भी हरे और कड़े हो जाते हैं,
 
इतने व्यक्तिगत परिचय के बावजूद
सबके अपने अलग-अलग संसार हैं
कोमलता कहां छू पाई बर्बरता को
अहंकार को कहां छू पाया संगीत
प्रेम परास्त नहीं कर पाया युद्ध को
तो, प्रत्येक वस्तु एक संसार है
प्रत्येक क्षण एक संसार है
प्रत्येक व्यक्ति एक संसार है
अपने में भरापूरा एक संसार है प्रत्येक भाव
इतनी अनेकता बनी रही बावजूद इतने पतन के
 
अब चूंकि नश्वरताएं भी अनश्वर हैं
इसलिए फीकी पड़ी है रुसाह के फूलों की मिठास
झरबेरी के गूदे तक में घुस चुकी है धूल
विद्रोह के बावजूद और भी खोदी गई मिट्टी 
पटकन-तालाब गहराया है घाव-सा 
गहराई है निराशा, गरीबी गाढ़ी हुई है
गहराये हैं अर्न्तविरोध
बच्चों में घटा है बचपन
परियों और भूतों का जिक्र आते ही
बच्चे हंसने लगते हैं हम पर
बड़ी खतरनाक हंसी हंसते हैं बच्चे
 
वैसे, मैने तो बचपन में,
जैसा कि होता है- दो पाँव उल्टे दो पाँव सीधे देखे थे भूत के
और थे नागपाश जैसे चार हाथ,
जैसा कि होता है- भूत के आसपास भूकम्प था,
फिर क्या, मैने तो अण्टी चढ़ाई मंत्र पढ़ा
और आकाश मार्ग से सीधे अपने आंगन आ खड़ा हुआ,
किन्तु महान आश्चर्य !
कि मेरे सबसे बड़े शत्रु गोपाल भइया ने अगले दिन
अलग से बुला कर मुझे कम्पट दिये
और दिन भर मुझे हंसाने के बहाने ढूंढते रहे 
 
एक क्षयग्रस्त युग के साथ बीत कर भी
बीते नहीं हैं गोपाल भइया
ये क्या खड़े-खड़े मुस्कुरा रहे हैं हमारे दिशाभ्रम पर..
जब भी दुपहर की नींद टूटती है अचानक
तो वक्त लगता है समझने में कि क्या वक्त हुआ होगा
और कभी-कभी तो बीत जाता है ऐसे में ही पूरा जीवन
और पता ही नहीं लगता कि क्या वक्त हुआ होगा,
भंवर में गिरे हुए लोग ही
भंवर को और गहरा करते चले जाते हैं
और गोपाल भइया मुस्काते हैं कि
देखो भाई देखो अब तो क्रम का भी भ्रम !
हम जानते हैं कि ये चीजें यहां हैं
पर छूते ही वो उड़नछू हो जाती हैं
जितना ही करीब जाओ क्षितिज के
वो उतना ही दूर खिसक जाता है
भविष्य भी इसी तरह छुआई नहीं देता
पर दिखता रहता है
यहां तक कि खुद अपने आपको छुओ
तो 'आपा' भी छिटक कर जा बैठता है टीले पर
और वहीं से करता है टिलीलिली,
यही हाल प्रेम का
मिट्टी के प्रतिशोध का भी वही हाल
और गहराती संध्या के भूतों का तो और भी वही हाल
जितने स्निग्ध उतने ही छलन्तू
जितने स्थूल उतने ही सूक्ष्म
जितने निकट उतने ही दूर
 
अंधी गलियों से होकर चक्रव्यूह तोड़ते हुए
प्रमाण की तरह छोड़ते हुए अपने रक्ताक्त पदचिन्ह
सत्य आता है
मिट्टी के रस की सुगन्ध में,  
खतरनाक हंसी हंसते अबोध शिशु-रूप में
सत्य आता है
रिक्ति में, स्मृति में, भ्रम और विस्मृति में भी
आता है सत्य ही
किन्तु वह क्या है जो दिखता है तभी
जब पहनता है भाषा का वस्त्र
और चलता है तब 
जब सवारी करता है हमारी अनुभूति के संवेग पर...
 
वैसे, यह कोई रहस्य नहीं है
कि गोपाल भइया अब भी मुझ अधेड़ के सिरहाने
छोड़ जाते हैं कम्पट
और हमें हंसाने के बहाने अब भी ढंूढते रहते हैं
हंसी भले विद्रूप की ही हो
और कहां जान पाया मैं उस दूसरे के बारे में
जो उस साँझ  
गोपाल भइया के हृदय में गहरा रहा था
बहुत कोमल रात की चूनर-सा
 


 

राग बिलावल
 
गोदा-गादी चील-बिलउवा
लिखो और मुस्काओ
सीधी-साधी बातों में भी
अरथ अबूझ बताओ
परम बैस्नव बनो खेलावन
मार झपट्टा लाओ
जिसे किसी ने कभी न गाया
राग बिलावल गाओ
 
पकनी फुटनी काया लेकर
धरा धाम पर आये
जब देखी सुन्दर अमराई
मन ही मन गदराये
काचे-पाके झोरि गिराये
सुग्गा एक न पाये
बुरा न मानो रामखेलावन
करनी के फल खाओ
बात पित्त में कफ में सानी
बानी ज्ञानी गाओ
राग बिलावल गाओ
 
दास मलूका बने बिजूका
मन ही मन मुस्कावें
चिड़िया चुंगन आवें जावें
दाना चुग्गा पावें
कौन मलूका की ये खेती
जो वो हाँकैं कउवा
तुम्हें पड़ी हो तो तुम जाओ
अपनी फसल बचाओ
राग बिलावल गाओ
 
लाँघो अपनी देहरी दुनिया
लाँघो सात समुन्दर
अपने चप्पू आप चलाओ बूड़ो या तर जाओ
कविता के भौफन्द फँसे हो
उलझी को सुलझाओ
झिटिक फिटिक कर जाल तोड़कर
गगन सात मँडलाओ
राग बिलावल गाओ
 
वो थोड़ा-सा मुस्का देती
तो भादौं आ जाता
ये कीचड़ वाला पोखर भी
ऊपर तक भर आता
लहर-लहर लहराता पानी
सबकी प्यास बुझाता
लेकिन थूथन हिला हिला कर
भैंस खड़ी पगुराये
ज्ञानी से अच्छा अज्ञानी
फिर भी बीन बजाये
 
बना पोटली सत्तू धनियाँ
काँधे पे लटकाओ
बूढ़ बसन्त तरुन भये धावल
(छिमा करो हे विद्यापति कवि)
राग बिलावल गाओ

 
प्रयोगशाला में
 
अमूमन दुपहर के बाद वाले घण्टों में ही
प्रैक्टिकल की कक्षायें लगती हैं
जब दिन बह रहा होता है अनमनी मटमैली मंथर
नदी सा
 
लेकिन प्रयोगशाला में घुसते ही
ओज़ोन, बिजली और स्प्रिटलैम्प की सुगंध में
नदारद हो जाती हैं नींद ऊब जमुहाई
और शरारत भर जाती है बॉडी में -
कई मौलिक आविष्कार ऐसे ही शरारतन हो गये...
लेंस, चुम्बक, मैग्नेटोमीटर और तमाम दूसरे उपकरण
बाहर फैली बेकारी की छाया भी नहीं पड़ने देते
जब तक चलता है प्रैक्टिकल क्लास
 
थोड़ा-थोड़ा घर भी घुस आता है प्रयोगशाला में
कहीं कोने में फ्लास्क में उबलती रहती है
अध्यापकों की चाय, और वे लगते हैं ज्यादा निकट
कभी कभी अचानक ही प्रकट होते हैं
निकिल कोबाल्ट लोहे के हरे नीले लाल गाढ़े रंग
माँ की तहा कर धरी हुई साड़ियों की याद दिलाते,
कभी अमरूद-सी कभी खटमलों-सी फार्मेल्डिहाइड
की गंध
भर देती पूरे वातावरण को, तीखी गैस
आँखों में पानी भर आता
और ऐसे में ही कभी-कभी आँखें उलझ जातीं और फिर
उलझती चलीं जातीं जीवन भर...
 
प्रयोगशालायें यों भी अच्छी लगतीं कि उनके बाद
फिर और कक्षायें नहीं होती थीं - 
सामने फैला खुला मैदान खेलों का
प्रयोगशाला का बड़ा-सा हॉल उनकी भी आज़ादी का 
आँगन था
जिन्हें कॉलेज के बाद
रास्ते की फिकरेबाजियों में भीगते हुए वापस घर लौटना होता था
और घर पहुँचकर फिर ख़ातून-ए-ख़ाना बन जाना होता था...
 
फिर भी प्रयोगशाला की याद
अक्सर सालों बाद रसोई में सूखते होठों पर
आकर फैल जाती थी अकारण मुस्कान-सी  
 
लालसा
 
क्या कहूँ
बस एक लालसा है
जैसे पानी में पानी का स्वाद
जैसे गेहूँ में बाली की चुभन
जैसे मेरी आँखों में तुम,
कोई इतनी बड़ी बात नहीं
बस एक लालसा है
कि अब रहूँ तुम्हारे ही साथ
 
रक्त ने उठा लिया शर-चाप
त्वचा पर दौड़ता है दावानल
ज्वर जैसी कैसी
कैसी यह लालसा है !
 
हँसी आती है
जब तुम इसे
समझती हो आत्मा की प्यास
यह तो सीधीसाधी
यूँ ही बस एक लालसा है
जो कभी-कभी
आँखों से भी छलक पड़ती है 
 
आना भी चाहूँ अब
तो कुछ मिलेगा नहीं इस वक्त
निकल गई आखिरी बस भी
लिफ्ट कोई किसी को देता नहीं
अब इस जमाने में
 
इस अधबसी कालोनी में 
बीच-बीच अब भी बचे हैं
दो चार खेत खरगोश लोमड़ी
बिजली कम आती है
कपड़े साफ़ धुलते नहीं पानी में
आकाश में तारे
आखों में स्वप्न देखे हुए
बीत गये कितने साल
देखा नहीं तुम्हें
 
 
हवा में अभी अभी आई
तुम्हारे खुले बालों की सुगंध
कोई बड़ी बात नहीं कि
मैं उड़ चलूँ इधर
और तुम भी उधर
इधर आने का
बना ही लो मन
हो न हो
इसी लिये है 
है यह लालसा 
उद्दीप्त
दीपक की अंतिम लौ-सी
देह और आत्मा को दीप्त करती हुई
 

एक आम एक नीम
 
अबकी सबकी डालों में देखो फल आये
एक अकेले तुम्हीं खड़े हो बिन बौराये,
बारामासी ओढ़े रहो उदासी
ये तो ठीक नहीं है,
सुनो विटपवर !
एक अकेले तुम्हीं नहीं रह गए अकेले,
 
मुझे याद है कभी तुम्हारी डालों को डालों से छूता
हुआ नीम का पेड़ एक इस जगह खड़ा था
उसको गए बहुत दिन बीते,
पीले-पीले कुछ ललछौंहे स्वाद हींंग का लिए हुए
फल कभी तुम्हारी डालों में झूला करते थे
और चैत में
उसी स्वाद की निंबौरियों के गुच्छे ले कर
नीम टहनियाँ अपनी तुम तक ले आता था,
 
तुम दोनों का साथ याद है
तोता मैना को कोयल को बादल-बूँदों को बिजली को
वृक्ष युग्म की याद अभी तक बची हुई है तूफ़ानों में,
लेकिन
अब सब भूल चले हैं हींग और मिसरी के
दुर्लभ आस्वादन को,
 
मोटी-मोटी धूल जमी रहती है तुम पर
दीमक ने भी अपनी बस्ती फैला दी 
जड़ से फुनगी तक,
बादल तो अबकी भी तुमको नहला देंगे स्वच्छ करेंगे
तुमको बस इतना करना है
ज्ञान बिराग छोड़ कर फिर से बौराना है
धरती के भीतर से वह रस ले आना है
जिसको पीकर डालों के भीतर की पीड़ा
पीली-पीली मंजरियों में फूट पड़ेगी
फिर आयेंगे तोता मैना
फिर आयेंगे लोग तुम्हारे पास
नीम की याद उन्हें बरबस आयेगी,
याद नीम की बनी रहे इस लिए फलो तुम ।
आँखें अक्षर हैं ।
 
थीं कहीं आस-पास ही
प्रगाढ़ता से भरी हुई
बिल्कुल वही आँखें
कपोत-कमल-खंजन या मीन की-सी नहीं
पर ठीक-ठीक कह पाना कठिन था
क्योंकि उचटती-सी भी
नहीं टकराई कहीं कोई नज़र
लेकिन था ठीक वही
वैसा ही आँखों का ताप
पूस की धूप-सा त्वचा पर गुनगुनाता हुआ 
 
बड़ी-बड़ी पलकों का उठना-गिरना
बजता रहा कान के पर्दों पर 
जैसे धड़क रहा हो
आस्वान प्रदेश की
सबसे सुन्दर अधेड़ स्त्री का हृदय
धड़क रहा हो हृदय
नील के जल की कोमल सुगन्ध का,
सहारा मरुस्थल की
लपलपाती मरीचिका का उत्कंठित हृदय...
हृदय मातंगी वनदेवी का ...
ठीक-ठीक कह पाना कठिन था
संसार की सबसे छोटी यात्रा पल भर की
इतने में कुछ भी जान पाना कठिन था
 
नील के इस घाट से उस घाट तक
चार-चप्पू भर यात्रा का साथ
बिना देखे देखे जाने का
बिना छुए छुए जाने का 
जाने बिना जान लिए जाने का साथ ...
पता नहीं कब घाट पर आ लगी नाव
घाट की सीढि़याँ साथ-साथ चढ़ते हुए वर्ष बीतते रहे
पाँच हजार साल पिरामिडों के
पल भर में गुजर गये,
आते रहे लुप्त होते रहे जीव जन्तु,
भेष बदल-बदल कर आते रहे भ्रम और सत्य
बदलती गई तट रेखा
लेकिन चढ़ाई चलती रही
उस अवघट घाट की सीढि़याँ....सीढि़याँ....
 
हाँ हैं, 
हैं कुछ जगहें इसी भूमण्डल पर !
जहाँ समय खिंचता चला जाता है अन्तहीन
इतना... कि आदमी अमर हो जाता है
और अन्त नहीं होता प्रेम का
छूटता नहीं किसी का किसी से साथ 
ऐसी ही जगहों पर
समय बन जाता है जगह
और जगहें बन जाती हैं समय
एक ऐसी ही जगह
कालभित्ति जैसी दीवार पर
चित्रलिपि में लिखी थी गाथा
नेफरतीती के प्रेम की
आँख भी जिसमें एक अक्षर थी
गाथा में अंकित बार-बार
झांकती जीवन और मृत्यु के आर-पार
 
कपोताक्षी पद्माक्षी खंजन-नयन
फाख्ता की-सी आँखों वाली
कौन थीं तुम
ठीक-ठीक कह पाना कठिन था 
अगर तुम्हें देख भी लेता तो भी,
नूबिया भी भारत की तरह
आँखों का देश है आँखें ही आँखें ...



* अफ्रीकी देशों - मिश्र, सेनेगल और मोरक्को की यात्राओं   (वर्ष 2005   और 2006) के समय लिखी गयी कविताएँ।
 
बेली डान्सर ।
 
बमाको शहर के
खण्डहरों में मेरा जन्म हुआ
माली के प्राचीन परास्त राजकुल में ...
माँ के सूखते स्तनों से
मिला मुझे मज्जा का स्वाद,
जब गोद में ही थी मैं
सुनी मैंने मृत्यु की पहली पदचाप
क्षयग्रस्त माँ की मंद होती धड़कन में,
गोद में ही लग गई लत मुझे
जिन्दा बने रहने की 
 
सूखी हुई घास, कटीली नागफनी और
ठुर्राई झाड़ियों की मिट्टी ने पाला पोसा मुझे
सीखा मैंने जहरीले साँपों को भून कर खाना
चट्टानों से पाया मैंने नमक
सहारा की रेत से बनी मेरी हड्डियाँ
ओ हड्डी-की-खाद के सौदागर
तुम मुझे क्यों घूरते हो इस तरह!
 
दास प्रथा का तो अन्त हुए
बीत गये कितने साल
कहते हैं अफ्रीका भी
अब बिल्कुल आज़ाद है
अब मुझे भी गिनती आती है
ओ पेट्रोल के सौदागर
तुम्हारी आँखों में क्यों इतनी आग है
कि हमारी दुनिया ही ख़ाक हुई जाती है
मुझे अपनी सिगरेट के धुएँ में डुबाते हुए
मेरे भाइयों से तुम्हें क्यों नहीं लगता डर !
 
कोई हिरनी क्या दौड़ेगी मुझसे तेज
चने-सा चबा सकती हूँ बंदूक के छर्रे
तड़ित् को तो रोज चकित करती हूँ
अपने चपल नृत्य से
दरअस्ल तुम्हें चीर सकती हूँ मैं शेरनी की तरह
फिर भी तुम
अपनी जन्मांध आँखों से
मुझे निर्वस्त्र किये जाते हो
क्या तुम्हें अपनी जिन्दगी प्यारी नहीं
ओ सभ्यताओं के सौदागर ।
 
कैसे, कैसे हुए तुम इतने निर्द्वन्द !
एक के बाद एक सीमा लाँघते
पृथ्वी और स्त्रियों को
करते हुए पयर्टित पद्दलित
देखते हुए मेरा निर्वस्त्र नाच
पेट के लिए पेट-का-नाच
मेरी देह की थिरकती माँसपेशियाँ
मछलियाँ हैं
जिनकी हलक में धँस गया लोहे का काँटा,
खून के कीचड़ से
भर गया है रंगमंच लथपथ
जुगुप्सा के इतने व्यंजनों के बीच
तुम्हारे सिवा और कौन हो सकता था इतना लोलुप
ओ लोहे बारूद और मृत्यु के सौदागर !
                                                                          
* अफ्रीकी देशों - मिश्र, सेनेगल और मोरक्को की यात्राओं   (वर्ष 2005 और 2006) के समय लिखी गयी कविताएँ।
 
ये रंग हैं क्या 
 
हवा के शीशों में हमने देखा कि दृश्य कैसे बदल रहे हैं
ये अक्स आता वो अक्स जाता इसी में दर्पण दहल रहे हैं
तभी तो पथरा गई हैं आँखें तभी तो सपने पिघल रहे हैं
ज़मी पे रहते तो डूब जाते अभी तो  पानी पे चल रहे हैं
 
बहुत से रंग हैं उधेड़बुन के उन्हीं में दुनिया उलझ रही है
कहीं जो साबुन का बुलबुला है उसी को सूरज समझ रही है
बस एक गंदली-सी धूप भर है उसी में अब सब लगे हैं तपने
विचित्र भाषा का मंत्र है यह उसी को हम सब लगे हैं जपने
 
सभी ने जादू का जल पिया है कृतार्थ जीवन सफल किया है
तो रंग फिर क्यों दहक रहे हैं छली ने छल से भी छल किया है
समय के गिरगिट ने रंग बदला रंगों के रंग भी बदल गए हैं
गुफा से आकर पुराने अजगर तमाम इतिहास निगल गए हैं
 
चलो चलें तब उधर जिधर रंग हज़ारहाँ मुस्कुरा रहे हैं
ये रंग ही है मरुस्थली में जो हँस रहे खिलखिला रहे हैं
हँसी में उनकी गज़ब का जादू मरे हुओं को जिला रहे हैं
ये रंग बिजली पहन के आये सभी को झटके खिला रहे हैं
 
बुरा भी मानो तो क्या करोगे छुओगे बिजली का तार कैसे
बुझे पुराने वो रंग सातों, नये हैं बिल्कुल अँगार जैसे
थे पहले गिनती में सात ही रंग नये तो हैं बेशुमार जैसे
हवा जो चलती तो बहने लगती रंगों की धारा अपार जैसे
 
समय की गति जब कभी बदलती तभी छिटकते हैं रंग इतने
उतार में या चढ़ाव में ही उभरते जीने के ढंग इतने
ये रंग ही हैं अमूर्त की लय, पदार्थ में चेतना की रिमझिम
अपार रचना की वर्णमाला, ये रंग हैं रौशनी का सरगम
 
वो कौन है जो हरी-सी सलवट सपाट ऊसर में डालता है
हरीतिमा में मगर है काँटा घुसा जो आत्मा को सालता है
ये रंग न होते तो कुछ न होता कहाँ पे टिकता प्रकाश आ कर
तो छन्द की लय कहाँ से आती जिसे बुलाता वो गुनगुना कर
 
न होता जीवन का चक्र भी तब, कोई प्रतिध्वनि कहीं न होती
अकेला होता जो कुछ भी होता न जीत होती न हार होती
ये रंग ही हैं जो द्वन्द्व भरते वहीं से रचना का तार आता
वहीं से राजा वहीं से परजा वहीं से माया-बज़ार आता
 
वहीं से उठते हैं भेद सारे वहीं से फिर भी अभेद आता
वहीं से आते हैं अपने साथी वहीं से तगड़ा विरोध आता
वहीं से आती है रश्मि रेखा वहीं से घिर अंधकार आता
वहीं से उठती है भ्रम की आँधी दिया वहीं फिर भी टिमटिमाता 
 
 
अपार के पार 
 
धूल भरी भारी
दुपहर की हवा
जेठ की लपट
लपट में काया-छाया
मेड़-मेड़ पकड़े
लगता है दूर विशाखा निकल गई है
 
ऊर्ध्वाधर समुद्र में
तपती देह
पोत में उठती-गिरती
तीन बकरियाँ साथ
काँख में बच्चा
सिर पर गठरी
 
मृगमरीचिका के समुद्र में
अपना सब कुछ ले कर
आओ तुम भी उतरो
इस समुद्र के पार
नयी दुनिया में रहने चलो
उतारो तुम भी अपनी नाव
विशाखा वहीं गई है
 
अस्ति-नास्ति के इस समुद्र पर
अग्नि और जल
दोनों मिल कर बरस रहे हैं
और विशाखा पाल खोल कर
डाँड़ सँभाले सबको ले कर
पार कर रही है अपार को


 
अफ्रीका की चूनर 
 
ऋतुमती ऋतुओं की
भीग रही थी चूनर
रात-रात भर चलने वाली
रेगिस्तानी कहानियों की ओस में
तालपत्रों पर बजती
अफ्रीकी बसन्त की वर्षा में
विषुवत् रेखा के छलछलाते पसीने में
रक्त के दीटों में
भीग रही थी चूनर
 
चटक गाढे रंग की,
फूलों के बड़े-बड़े छाप वाली,
हवा को तलवार-सी काटती
बाज-सी फड़फड़ाती
पृथ्वी के जलधर पयोधरों के
मातृत्व में भीगती
भारी होती हुई भी
उड़ रही थी चूनर
घहर-घहर-घहर-घहर...
 
विलाप के आँसुओं, फलों के रस
फूलों के पराग
और वनस्पतियों के गोंद से
चट्टानों पर टूटते ज्वार से
चाँदनी के उन्माद में
भीग रही थी चूनर
 
नाच रहे थे दरवेश
भुजाएँ पसार कर
नाच रहे थे
औदुम्बर, बोधिवृक्ष, बाओबाब
वृहदारण्य घूर्णन्त !
 
भीग रही थी चूनर अफ्रीका की...
पृथ्वी के नीले प्रकाश में
ठीक उस घड़ी में जन्म हुआ
अद्वितीय शिशु-कवि का
जब ख़त्म होने ही वाला था इतिहास
 
जन्म से ही कन्धे पर आ पड़ा भार
जन्म से ही भूमिगत होना पड़ा
शिशु-कवि को,
उसे इतिहास की ही नहीं
बहुत कुछ की रक्षा करनी थी,
मुल्तवी करना पड़ा उसे
अपना बचपन और कैशोर्य और कविता
वह फ़िलहाल भूतिगत है
उसे ढूँढ़ रही हैं
अब तक के प्रबलतम साम्राज्य की सेनाएँ
भाषा में भय में भ्रान्ति में
भूति में भावना में खँगोलती हुई -
और शिशु-कवि
पता नहीं
कब कहाँ-से-कहाँ निकल जाता है
भीतर-ही-भीतर मार करता हुआ,
बहुत गहरी है काइनात
बहुत गहरे हैं
माताओं के अन्तःकरण
माताओं के गर्भ बहुत गहरे हैं
भीतर ही भीतर...
चूनर भीग रही हैं माताओं की
अफ्रीका के विशाल प्रांगण में
नाच रही है विपुल पुलकावली...

वह जगह  
जा रही है लहर
पीछे छूटता जाता है पानी
लहर में पानी नहीं 
कुछ और है जो जा रहा है
 
शब्द में टिकती नहीं कविता
न कविता में समाता अर्थ
थमता नहीं है संगीत ध्वनि में
रंग रेखा रूप में रुकता नहीं है चित्र
 
जिया जितना
सिर्फ उतना ही नहीं जीवन,
आ रहा संज्ञान में जो
सिर्फ उतना ही नहीं सब कुछ
 
यहीं बिल्कुल आस-पास है कहीं वह जगह --
जहाँ अपनी सहज लय में गूँजता संगीत
होते हैं तरंगित अर्थ कविता के,
जहाँ साकार होते हैं सभी आकार अपने आप
जहाँ इतनी सघन है अनुभूति
जैसे गर्भ माता का
अँधेरी रात का तारों भरा आकाश
या फिर अधगिरी दीवार पर
फूले अकेले फूल की पीली उदासी ....
सघनता भी जहाँ जा कर विरल हो जाती !
 
किसी को दिख जाय शायद "वह जगह"
वह जगह है आदमी के बहुत पास
कभी शायद कह सके कोई --
"यह रही वह जगह
ठीक बिल्कुल यहाँ, उँगली रख रहा हूँ मैं जहाँ" !  

 

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