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मंगलसूत्र

1

 

बडे बेटे सन्तकुमार को वकील बनाकर, छोटे बेटे साधु कुमार को बी.ए. की डिग्री दिलाकर और छोटी लडकी पंकजा के विवाह के लिए स्त्री के हाथों में पांच हजार रूपये नकद रखकर देवकुमार ने समझ लिया कि वह जीवन के कर्त्तव्य से मुक्त हो गए और जीवन में जो कुछ शेष रहा है, उसे ईश्वरचिंतन के अर्पण कर सकते हैंआज चाहे कोई उन पर अपनी जायदाद को भोगविलास में उड़ा देने का इलजाम लगाए, चाहे साहित्य के अनुष्ठान में, लेकिन इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि उनकी आत्मा विशाल थी यह असंभव था कि कोई उनसे मदद मांगे और निराश हो भोग-विलास जवानी का नशा था। और जीवन भर वह उस क्षति की पूर्ति करते रहे, लेकिन साहित्य-सेवा के सिवा उन्हें और किसी काम में रूचि न हुई और यहां धन कहां-गया, यश मिला और उनके आत्मसंतोष के लिए इतना काफी था। संचय में उनका विश्वास भी न था। संभव है, परिस्थिति ने इस विश्वास को दृढ किया हो, लेकिन उन्हें कभी संचय न कर सकने का दुख नहीं हुआ सम्मान के साथ अपना निबाह होता जाय इससे ज्यादा वह और कुछ न चाहते थे साहित्य-रसिकों में जो एक अकड होती है, चाहे उसे शेखी ही क्यों न कह लो, वह उनमें भी थी कितने ही रईस और राजे इच्छुक थे कि वह उनके दरबार में जायं, अपनी रचनाएं सुनायें, उनको भेंट करें, लेकिन देवकुमार ने आत्म-सम्मान को कभी हाथ से न जाने दिया किसी ने बुलाया भी तो धन्यवाद देकर टाल गए इतना ही नहीं, वह यह भी चाहते थे कि राजे और रईस मेरे द्वार पर आयें, मेरी खुशामद करें, जो अनहोनी बात थी अपने कई मंदबुध्दि सहपाठियों को वकालत या दूसरे सींगों में धन के ढेर लगाते, जायदादें खरीदते, नये-नये मकान बनवाते देखकर कभी-कभी उन्हें अपनी दशा पर खेद होता था, विशेषकर जब उनकी जन्म-संगिनी शैव्या गृहस्थी की चिंताओं से जलकर उन्हें कटु वचन सुनाने लगती थी, पर अपनी रचना-कुटीर में कलम हाथ में लेकर बैठते ही वह सब कुछ भूल साहित्य-स्वर्ग में पहुंच जाते थे आत्म-गौरव जाग उठता था। सारा अवसाद और विषाद शांत हो जाता था।।

मगर इधर कुछ दिनों से साहित्य-रचना में उनका अनुराग कुछ ठंडा होता जाता था। उन्हें कुछ ऐसा जान पडने लगा था। कि साहित्य-प्रेमियों को उनसे वह पहले की-सी भक्ति नहीं रही इधर उन्होंने जो दो पुस्तकें बडे परिश्रम से लिखी थीं और जिनमें उन्होंने अपने जीवन के सारे अनुभव और कला की सारी प्रौढता भर दी थी उनका कुछ विशेष आदर न हुआ था। इसके पहले उनकी दो रचनाएं निकली थीं उन्होंने साहित्य-संसार में हलचल मचा दी थी हर एक पत्र में उन पुस्तकों की विस्तृत आलोचनाएं हुई थीं, साहित्य-संस्थानों ने उन्हें बधाइयां दी थीं, साहित्य-मर्मज्ञों ने गुणग्राहकता से भरे पत्र लिखे थे यद्यपि उन रचनाओं का देवकुमार की नजर में अब उतना आदर न था, उनके भाव उन्हें भावुकता के दोष से पूर्ण लगते थे, शैली में भी कृत्रिमता और भारीपन था। पर जनता की दृष्टि में वही रचनाएं अब भी सर्वप्रिय थीं इन नयी कृतियों से बिन बुलाये मेहमान का-सा आदर किया गया ।, मानो साहित्य-संसार संगठित होकर उनका अनादर कर रहा हो कुछ तो यों भी उनकी इच्छा विश्राम करने की हो रही थी, इस शीतलता ने उस विचार को और भी दृढ कर दिया उनके दो-चार सच्चे साहित्यिक मित्रों ने इस तर्क से उनको ढारस देने की चेष्टा की कि बड़ी भूख में मामूली भोजन भी जितना प्रिय लगता है, भूख कम हो जाने पर उससे कहीं रूचिकर पदार्थ भी उतने प्रिय नहीं लगते, पर इससे उन्हें आश्वासन न हुआ उनके विचार में किसी साहित्यकार की सजीवता का यही प्रमाण था। कि उसकी रचनाओं की भूख जनता में बराबर बनी रहै जब वह भूख न रहे तो उसको क्षेत्र से प्रस्थान कर जाना चाहिए उन्हें केवल पंकजा के विवाह की चिंता थी और जब उन्हें एक प्रकाशक ने उनकी पिछली दोनों कृतियों के पांच हजार दे दिए तो उन्होंने इसे ईश्वरीय प्रेरणा समझा और लेखनी उठा कर सदैव के लिए रख दी मगर इन छह महीनों में उन्हें बार-बार अनुभव हुआ कि उन्होंने वानप्रस्थ लेकर भी अपने को बंधनों से न छुड़ा पाया शैव्या के दुराग्रह की तो उन्हें कुछ ऐसी परवाह न थी वह उन देवियों में थी जिनका मन संसार से कभी नहीं छूटता उसे अब भी अपने परिवार पर शासन करने की लालसा बनी हुई थी, और जब तक हाथ में पैसे भी न हों, वह लालसा पूरी न हो सकती थी जब देवकुमार अपने चालीस वर्ष के विवाहित जीवन में उसकी तृष्णा न मिटा सके तो अब उसका प्रयत्न करना वह पानी पीटने से कम व्यर्थ न समझते थे दुख उन्हें होता था। सन्तकुमार के विचार और व्यवहार पर जो उनको घर की संपत्ति लुटा देने के लिए इस दशा में भी क्षमा न करना चाहता था। वह संपत्ति जो पचास साल पूर्व दस हजार में गेंक दी गई, आज होती तो उससे दस हजार साल की निकासी हो सकती थी उनकी जिस आराजी में दिन को सियार लोटते थे वहां अब नगर का सबसे गुलजार बाजार था। जिसकी जमीन सौ रूपये वर्ग गुट पर बिक रही थी सन्तकुमार का महत्वाकांक्षी मन रह-रहकर अपने पिता पर कुढता रहता था। पिता और पुत्र के स्वभाव में इतना अंतर कैसे हो गया ।, यह रहस्य था। देवकुमार के पास जरूरत से हमेशा कम रहा, पर उनके हाथ सदैव खुले रहै उनका सौंदर्य भावना से जागा हुआ मन कभी कंचन की उपासना को जीवन का लक्ष्य न बना सका यह नहीं कि वह धन का मूल्य जानते न हों मगर उनके मन में यह धारणा जम गई थी कि जिस राष्ट' में तीन-चौथा।ई प्राणी भूखों मरते हों वहां किसी एक को बहुत सा धन कमाने का कोई नौतिक अधिकार नहीं है, चाहे इसकी उसमें सामर्थ्य हो मगर सन्तकुमार की लिप्सा ऐसे नैतिक आदेश पर हंसती थी कभी-कभी तो निस्संकोच होकर वह यहां तक कह जाता था। कि जब ्आपको साहित्य से प्रेम था। तो आपको गृहस्थ बनने का क्या हक था।- आपने अपना जीवन तो चौपट किया ही, हमारा जीवन भी मिट्टी में मिला दिया और अब आप वानप्रस्थ लेकर बैठे हैं, मानो आपके जीवन के सारेर् ंण चुक गए

जाड़ों के दिन थे आठ बज गए थे सारा घर नाश्ते के लिए जमा हो गया । था। पंकजा तख्त पर चाय और संतरे और सूखे मेवे तश्तरियों में रख दोनों भाइयों को उनके कमरों से बुलाने गई और एक क्षण में आकर साधुकुमार बैठ गया । उंचे कद का, सुगठित, रूपवान्, गोरा, मीठे वचन बोलने वाला, सौम्य युवक था। जिसे केवल खाने और सैर-सपाटे से मतलब था। जो कुछ जुड जाय भरपेट खा लेता था। और यार-दोस्तों में निकल जाता था।

शैव्या ने पूछासंतू कहां रह गया ।- चाय ठंडी हो जायगी तो कहेगा यह तो पानी है बुला ले तो साधु, इसे जैसे खाने-पीने की भी छुट्टी नहीं मिलती ट्टी

साधु सिर झुका कर रह गया । सन्तकुमार से बोलते उनकी जान निकलती थी

शैव्या ने एक क्षण बाद गिर कहाउसे भी क्यों नहीं बुला लेता-

साधु ने दबी जबान से कहानहीं, बिगड जायेंगे सवेरे-सवेरे तो मेरा सारा दिन खराब हो जायेगा

इतने में सन्तकुमार भी आ गया । शक्ल-सूरत में छोटे भाई से मिलता-जुलता, केवल शरीर का गठन उतना अच्छा न था। हां, मुख पर तेज और गर्व की झलक थी, और मुख पर एक शिकायत-सी बैठी हुई थी, जैसे कोई चीज उसे पसंद न आती हो

तख्त पर बैठकर चाय मुंह से लगाई और नाक सिकोड कर बोलेतू क्यों नहीं आती पंकजा- और पुष्पा कहां है- मैं कितनी बार कह चुका कि नाश्ता, खाना-पीना सबका एक साथ होना चाहिए

शैव्या ने आंखें तरेरकर कहातुम लोग खा लो, यह सब पीछे खा लेंगी कोई पंगत थोड़ी है कि सब एक साथ बैठें

सन्तकुमार ने एक घूंट चाय पीकर कहावही पुराना ढाचा कितनी बार कह चुका कि उस पुराने लचर संकोच का जमाना नहीं रहा

शैव्या ने मुंह बनाकर कहासब एक साथ तो बैठें लेकिन पकाये कौन और परसे कौन- एक महाराज रक्खो पकाने के लिए, दूसरा परसने के लिए, तब वह ठाट निभेगा

गतो महात्माजी उसका इंतजाम क्यों नहीं करते या वानप्रस्थ लेना ही जानते हैं

गउनको जो कुछ करना था। कर चुके अब तुम्हें जो कुछ करना हो तुम करो

गजब पुरूषार्थ नहीं था। तो हम लोगों को पढ़ाया-लिखाया क्यों- किसी देहात में ले जाकर छोड देते हम अपनी खेती करते या मजूरी करते और पडे रहते यह खटराग ही क्यों पाला-

गतुम उस वक्त न थे, सलाह किससे पूछते-

सन्तकुमार ने कडवा मुंह बनाये चाय पी, कुछ मेवे खाए, गिर साधुकुमार से बोलेगतुम्हारी टीम कब बम्बई जा रही है जी-

साधुकुमार ने गरदन झुकाए त्रस्त स्वर में कहापरसों

गतुमने नया सूट बनवाया-

गमेरा पुराना सूट अभी अच्छी तरह काम दे सकता है

गकाम तो सूट के न रहने पर भी चल सकता है हम लोग तो नंगे पांव, धोती चढ़ाकर खेला करते थे मगर जब एक आल इण्डिया टीम में खेलने जा रहे हो तो वैसा ठाट भी तो होना चाहिए गटेहालों जाने से तो कहीं अच्छा है, न जाना जब वहां लोग जानेंगे कि तुम महात्मा देवकुमार जी के सुपुत्र हो तो दिल में क्या कहेंगे-

साधुकुमार ने कुछ जवाब न दिया चुपचाप नाश्ता करके चला गया । वह अपने पिता की माली हालत जानता था। और उन्हें संकट मे न डालना चाहता था। अगर सन्तकुमार नये सूट की जरूरत समझते हैं तो बनवा क्यों नहीं देते- पिता के उपर भार डालने के लिए उसे क्यों मजबूर करते हैं-

साधु चला गया । तो शैव्या ने आहत कंठ से कहाजब उन्होंने साग-साग कह दिया कि अब मेरा घर से कोई वास्ता नहीं और सब कुछ तुम्हारे उपर छोड दिया तो तुम क्यों उन पर गृहस्ती का भार डालते हो- अपने सामर्थ्य और बुध्दि के अनुसार जैसे हो सका उन्होंने अपनी उम्र काट दी जो कुछ वह नहीं कर सके या उनसे जो चूकें हुइऊ उन पर गिकरे कसना तुम्हारे मुंह से अच्छा नहीं लगता अगर तुमने इस तरह उन्हें सताया तो मुझे डर है वह घर छोडकर कहीं अंतर्धान न हो जायं वह धन न कमा सके, पर इतना तो तुम जानते ही हो कि वह जहां भी जायेंगे लोग उन्हें सिर और आंखों पर लेंगे

शैव्या ने अब तक सदैव पति की भर्त्सना ही की थी इस वक्त उसे उनकी वकालत करते देखकर सन्तकुमार मुस्करा पडा पडा ।

बोलाअगर उन्होंने ऐसा इरादा किया तो उनसे पहले मैं अंतर्धान हो जाउंगा मैं यह भार अपने सिर नहीं ले सकता उन्हें इसको सीाालने में मेरी मदद करनी होगी उन्हें अपनी कमाई लुटाने का पूरा हक था, लेकिन बाप-दादों की जायदाद को लुटाने का उन्हें कोई अधिकार न था। इसका उन्हें प्रायश्चित करना पडेगा वह जायदाद हमें वापस करनी होगी मैं खुद भी कुछ कानून जानता हूं वकीलों, मैजिस्ट'ेटों से भी सलाह कर चुका हूं जायदाद वापस ली जा सकती है अब मुझे यही देखना है कि इन्हें अपनी संतान प्यारी है या अपना महात्मापन

यह कहता हुआ सन्तकुमार पंकजा से पान लेकर अपने कमरे में चला गया ।

 

 

सन्तकुमार की स्त्री पुष्पा बिल्कुल गूल-सी है, सुंदर, नाजुक, हलकी-गुलकी, लजाधुर, लेकिन एक नंबर की आत्माभिमानिनी है एक-एक बात के लिए वह कई-कई दिन रूठी रह सकती है और उसका रूठना भी सर्वथा। नई डिजाइन का है वह किसी से कुछ कहती नहीं, लडती नहीं, बिगडती नहीं, घर का काम-काज उसी तन्मयता से करती है बल्कि और ज्यादा एकाग्रता से बस जिससे नाराजहोती है उसकी ओर ताकती नहीं वह जो कुछ कहेगा, वह करेगी, वह जो कुछ पूछेगा, जवाब देगी, वह जो कुछ मांगेगा, उठाकर दे देगी, मगर बिना उसकी ओर ताके हुए इधर कई दिन से वह सन्तकुमार से नाराज हो गई है और अपनी गिरी हुई आंखों से उसके सारे आघातों का सामना कर रही है

सन्तकुमार ने स्नेह के साथ कहाआज शाम को चलना है न-

पुष्पा ने सिर नीचा करके कहाजैसी तुम्हारी इच्छा

चलोगी न-

तुम कहते हो तो क्यों न चलूंगी-

तुम्हारी क्या इच्छा है-

मेरी कोई इच्छा नहीं है

आखिर किस बात पर नाराज हो-

किसी बात पर नहीं

खैर, न बोलो, लेकिन वह समस्या यों चुप्पी साधने से हल न होगी

पुष्पा के इस निरीह अस्त्र ने सन्तकुमार को बौखला डाला था। वह खूब झगड कर उस विवाद को शांत कर देना चाहता था। क्षमा मांगने पर तैयार था, वैसी बात अब गिर मुंह से न निकालेगा, लेकिन उसने जो कुछ कहा था। वह उसे चिढ़ाने के लिए नहीं, एक यथा।र्थ बात को पुष्ट करने के लिए ही कहा था। उसने कहा था। जो स्त्रीपुरूष पर अवलंबित है, उसे पुरूष की हुकूमत माननी पडेगी वह मानता था। कि उस अवसर पर यह बात उसे मुंह से न निकालनी चाहिए थी अगर कहना आवश्यक भी होता तो मुलायम शब्दों में कहना था, लेकिन जब एक औरत अपने अधिकारों के लिए पुरूष से लडती है, उसकी बराबरी का दावा करती है तो उसे कठोर बातें सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए इस वक्त भी वह इसीलिए आया था। कि पुष्पा को कायल करे और समझाए कि मुंह गेर लेने से ही किसी बात का निर्णय नहीं हो सकता वह इस मैदान को जीत कर यहां एक झंडा गाड देना चाहता था। जिसमें इस विषय पर कभी विवाद न हो सके तब से कितनी ही नई-नई युक्तियां उसके मन में आ गई थीं, मगर जब शत्रु किले के बाहर निकले ही नहीं तो उस पर हमला कैसे किया जाय

एक उपाय है शत्रु को बहला कर, उसे पर अपने संधि-प्रेम का विश्वास जमाकर, किले से निकालना होगा

उसने पुष्पा की ठुड्डी पकड कर अपनी ओर गेरते हुए कहाअगर यह बात तुम्हें इतनी लग रही है तो मैं उसे वापस लिए लेता हूं उसके लिए तुमसे क्षमा मांगता हूं तुमको ईश्वर ने वह शक्ति दी है कि तुम मुझ से दस-पांच दिन बिना बोले रह सकती हो( लेकिन मुझे तो उसने वह शक्ति नहीं दी तुम रूठ जाती हो तो जैसे मेरी नाडियों में रक्त का प्रवाह बंद हो जाता है अगर वह शक्ति तुम मुझे भी प्रदान कर सको तो मेरी और तुम्हारी बराबर की लड़ाई होगी और मैं तुम्हें छेडने न आउंगा लेकिन अगर ऐसा नहीं कर सकतीं तो इस अस्त्र का मुझ पर वार न करो

पुष्पा मुस्करा पड़ीउसने अपने अस्त्र से पति को परास्त कर दिया था। जब वह दीन बनकर उससे क्षमा माग रहा है तो उसका हृदय क्यों न पिघल जाय

संधि-पत्र पर हस्ताक्षर स्वरूप पान का एक बीड़ा लगाकर सन्तकुमार को देती हुई बोलीअब से कभी वह बात मुंह से न निकालना अगर मैं तुम्हारी आश्रिता हूं तो तुम भी मेरे आश्रित हो मैं तुम्हारे घर में जितना काम करती हूं, इतना ही काम दूसरों के घर में करूं तो अपना निबाह कर सकती हूं या नहीं, बोलो -

सन्तकुमार ने कड़ा जवाब देने की इच्छा को रोककर कहाबहुत अच्छी तरह

गतब मैं जो कुछ कमाउंगी वह मेरा होगा यहां मैं चाहे प्राण भी दे दूं पर मेरा किसी चीज पर अधिकार नहीं तुम जब चाहो मुझे घर से निकाल सकते हो

गकहती जाओ, मगर उसका जवाब सुनने के लिए तैयार रहो

गतुम्हारे पास कोई जवाब नहीं है, केवल हठ-धर्म है तुम कहोगे यहां तुम्हारा जो सम्मान है वह वहां न रहेगा, वहां कोई तुम्हारी रक्षा करने वाला न होगा, कोई तुम्हारे दु:ख-दर्द में साथ देने वाला न होगा इसी तरह की और भी कितनी ही दलीलें तुम दे सकते हो मगर मैंने मिस बटलर को आजीवन क्वांरी रहकर, सम्मान के साथ जिंदगी काटते देखा है उनका निजी जीवन कैसा था, यह मैं नहीं जानतीब संभव है वह हिंदू गृहिण्ाी के आदर्श के अनुकूल न रहा हो, मगर उनकी इज्जत सभी करते थे, और उन्हें अपनी रक्षा के लिए किसी पुरूष का आश्रय लेने की कभी जरूरत नहीं हुई

सन्तकुमार मिस बटलर को जानता था। वह नगर की प्रसिध्द लेडी डाक्टर थी पुष्पा के घर से उसका घराव-सा हो गया । था। पुष्पा के पिता डाक्टर थे और एक पेशे के व्यक्तियों में कुछ घनिष्ठता हो ही जाती है पुष्पा ने जो समस्या उसके सामने रख दी थी उस पर मीठे और निरीह शब्दों में कुछ कहना उसके लिए कठिन हो रहा था। और चुप रहना उसकी पुरूषता के लिए उससे भी कठिन था।

दुविधा में पडकर बोलामगर सभी स्त्रियां मिस बटलर तो नहीं हो सकतीं-

पुष्पा ने आवेश के साथ कहाक्यों- अगर वह डाक्टरी पढकर अपना व्यवसाय कर सकती हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकती-

गउनके समाज में और हमारे समाज में बड़ा अंतर है

गअर्थात् उनके समाज के पुरूष शिष्ट हैं, शीलवान हैं, और हमारे समाज के पुरूष चरित्रहीन हैं, लंपट हैं, विशेषकर जो पढै-लिखे हैं

गयह क्यों नहीं कहतीं कि उस समाज में नारियों में आत्मबल है, अपनी रक्षा करने की शक्ति है और पुरूषों को काबू में रखने की कला है

गहम भी तो वही आत्मबल और शक्ति और कला प्राप्त करना चाहती हैं लेकिन तुम लोगों के मारे जब कुछ चलने पावेब मर्यादा और आदर्श और जाने किन-किन बहानों से हमें दबाने की और हमारे उपर अपनी हुकूमत जमाए रखने की कोशिश करते रहते हो

सन्तकुमार ने देखा कि बहस गिर उसी मार्ग पर चल पड़ी है जो अंत में पुष्पा को असहयोग धारण करने पर तैयार कर देता है, और इस समय वह उसे नाराज करने नहीं, उसे खुश करने आया था।

बोलाअच्छा साहब, सारा दोष पुरूषों का है, अब राजी हुइऊब पुरूष भी हुकूमत करते-करते थक गया । है, और अब कुछ दिन विश्राम करना चाहता है तुम्हारे अधीन रहकर अगर वह इस संघर्ष से बच जाय तो वह अपना सिंहासन छोडने को तैयार है

पुष्पा ने मुस्कराकर कहाअच्छा, आज से घर में बैठो

गबडे शौक से बैठूंगा, मेरे लिए अच्छे-अच्छे कपडे, अच्छी-अच्छी सवारियां ला दो जैसे तुम कहोगी वैसा ही करूंगा तुम्हारी मरजी के खिलाग एक शब्द भी न बोलूंगा

गगिर तो न कहोगे कि स्त्री पुरूष की मुहताज है, इसलिए उसे पुरूष की गुलामी करनी चाहिए-

गकभी नहीं, मगर एक शर्त परµ

गकौन-सी शर्त-

गतुम्हारे प्रेम पर मेरा ही अधिकार रहेगा

गस्त्रियां तो पुरूषों से ऐसी शर्त कभी न मनवा सकीं-

गयह उनकी दुर्बलता थी ईश्वर ने तो उन्हें पुरूषों पर शासन करने के लिए सभी अस्त्र दे दिये थे

संधि हो जाने पर भी पुष्पा का मन आश्वस्त न हुआ सन्तकुमार का स्वभाव वह जानती थी स्त्रीपर शासन करने का जो संस्कार है वह इतनी जल्द कैसे बदल सकता है उपर की बातों में सन्तकुमार उसे अपने बराबर का स्थान देते थे लेकिन इसमें एक प्रकार का एहसान छिपा होता था। महभव की बातों में वह लगाम अपने हाथ में रखते थे ऐसा आदमी यकायक अपना अधिकार त्यागने पर तैयार हो जाय, इसमें कोई रहस्य अवश्य है

बोलीनारियों ने उन शस्त्रों से अपनी रक्षा नहीं की, पुरूषों ही की रक्षा करती रहींब यहां तक कि उनमें अपनी रक्षा करने की सामर्थ्य ही नहीं रही

सन्तकुमार ने मुग्ध भाव से कहायही भाव मेरे मन में कई बार आया है पुष्पा, और इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर स्त्रीने पुरूष की रक्षा न की होती तो आज दुनिया वीरान हो गई होती उसका सारा जीवन तप और साधना का जीवन है

तब उसने उससे अपने मंसूबे कह सुनाये वह उन महात्माओ से अपनी मौरूसी जायदाद वापस लेना चाहता है, अगर पुष्पा अपने पिता से जिद्र करे और दस हजार रूपये भी दिला दे तो सन्तकुमार को दो लाख की जायदाद मिल सकती है सिर्ग दस हजारब इतने रूपये के बगैर उसके हाथ से दो लाख की जायदाद निकली जाती है

पुष्पा ने कहामगर वह जायदाद तो बिक चुकी है

सन्तकुमार ने सिर हिलायाबिक नहीं चुकी है, लुट चुकी है जो जमीन लाख-दो लाख में ीाी सस्ती है, वह दस हजार में कूड़ा हो गई कोई भी समझदार आदमी ऐसा गच्चा नहीं खा सकता और अगर खा जाय तो वह अपने होश-हवास में नहीं है दादा गृहस्थी में कुशल नहीं रहै वह तो कल्पनाओं की दुनिया में रहते थे बदमाशों ने उन्हें चकमा दिया और जायदाद निकलवा दी मेरा धर्म है कि मैं वह जायदाद वापस लूं, और तुम चाहो तो सब कुछ हो सकता है डाक्टर साहब के लिए दस हजार का इन्तजाम कर देना कोई कठिन बात नहीं है

पुष्पा एक मिनट तक विचार में डूबी रही गिर संदेहभाव से बोलीमुझे तो आशा नहीं कि दादा के पास इतने रूपये फालतू हों

जरा कहो तो

कहूं कैसेक्या मैं उनका हाल जानती नहीं- उनकी डाक्टरी अच्छी चलती है, पर उनके खर्च भी तो हैं बीरू के लिए हर महीने पांच सौ रूपये इंगलैंड भेजने पडते हैं तिलोत्तमा की पढ़ाई का खर्च भी कुछ कम नहीं संचय करने की उनकी आदत नहीं है मैं उन्हें संकट में नहीं डालना चाहती

मैं उधार मांगता हूं खैरात नहीं

जहां इतना घनिष्ठ संबंध है वहां उधार के माने खैरात के सिवा और कुछ नहीं तुम रूपये न दे सके तो वह तुम्हारा क्या बना लेंगे- अदालत जा नहीं सकते, दुनिया हंसेगी, पंचायत कर नहीं सकते, लोग ताने देंगे

सन्तकुमार ने तीखेपन से कहातुमने यह कैसे समझ लिया कि मैं रूपये न दे सकूंगा-

पुष्पा मुंह गेरकर बोलीतुम्हारी जीत होना निश्चित नहीं है और जीत भी हो जाय और तुम्हारे हाथ में रूपये आ भी जायं तो यहां कितने जमींदार ऐसे हैं जो अपने कर्ज चुका सकते हों रोज ही तो रियासतें कोर्ट ऑग वार्ड में आया करती हैं यह भी मान लें कि तुम किगायत से रहोगे और धन जमा कर लोगे, लेकिन आदमी का स्वभाव है कि वह जिस रूपये को हजम कर सकता है उसे हजम कर जाता है धर्म और नीति को भूल जाना उसकी एक आम कमजोरी है

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                पकडकर सामने खड़ा कर दिया था। तिलमिलाकर बोलाआदमी को तुम इतना नीच समझती हो, तुम्हारी इस मनोवृत्ति पर मुझे अचरज भी है और दुख भी इस गये-गुजरे जमाने में भी समाज पर धर्म और नीति का ही शासन है जिस दिन संसार से धर्म और नीति का नाश हो जाएगा उसी दिन समाज का अंत हो जाएगा

उसने धर्म और नीति की व्यापकता पर एक लंबा दार्शनिक व्याख्यान दे डाला कभी किसी घर में कोई चोरी हो जाती है तो कितनी हलचल मच जाती है क्यों- इसीलिए कि चोरी एक गैर मामूली बात है अगर समाज चोरों का होता तो किसी का साह होना उतनी ही हलचल पैदा करता रोगों की आज बहुत बढती सुनने में आती है, लेकिन गौर से देखो तो सौ में एक आदमी से ज्यादा बीमार न होगा अगर बीमारी आम बात होती तो तंदुरूस्तों की नुमाइश होती, आदिब पुष्पा विरक्त-सी सुनती रही उसके पास जवाब तो थे, पर वह इस बहस को तूल नहीं देना चाहती थी उसने तय कर लिया था। कि वह अपने पिता से रूपये के लिए न कहेगी और किसी तर्क या प्रमाण का उस पर कोई असर न हो सकता था।

सन्तकुमार ने भाषण समाप्त करके जब उससे कोई जवाब न पाया तो एक क्षण के बाद बोलाक्या सोच रही हो- मैं तुमसे सच कहता हूं, मैं बहुत जल्द रूपये दे दूंगा

पुष्पा ने निश्चल भाव से कहातुम्हें कहना हो जाकर खुद कहो, मैं तो नहीं लिख सकती

सन्तकुमार ने होंठ चबाकर कहाजरा-सी बात तुम से नहीं लिखी जाती, उस पर दावा यह है कि घर पर मेरा भी अधिकार है

पुष्पा ने जोश के साथ कहामेरा अधिकार तो उसी क्षण हो गया । जब मेरी ग़ाठ तुमसे बंधी

सन्तकुमार ने गर्व के साथ कहाऐसा अधिकार जितनी आसानी से मिल जाता है, उतनी ही आसानी से छिन भी जाता है

पुष्पा को जैसे किसी ने धक्का देकर उस विचारधारा में डाल दिया जिसमें पांव रखते उसे डर लगता था। उसने यहां आने के एक-दो महीने के बाद ही सन्तकुमार का स्वभाव पहचान लिया था। उनके साथ निबाह करने के लिए उसे उनके इशारों की लौंडी बनकर रहना पडेगा उसे अपने व्यक्तित्व को उनके अस्तित्व में मिला देना पडेगा वह वही सोचेगी जो वह सोचेंगे, वही करेगी, जो वह करेगे अपनी आत्मा के विकास के लिए यहां कोई अवसर न था। उनके लिए लोक या परलोक में जो कुछ था। वह सम्पत्ति थी यहीं से उनके जीवन को प्रेरणा मिलती थी सम्पत्ति के मुकाबले में स्त्रीया पुत्र की भी उनकी निगाह में कोई हकीकत न थी एक चीनी का प्लेट पुष्पा के हाथ से टूट जाने पर उन्होंने उसके कान ऐंठ लिए थे गर्श पर स्याही गिरा देने की सजा उन्होंने पंकजा से सारा गर्श धुलवाकर दी थी पुष्पा उनके रखे रूपयों को कभी हाथ तक न लगाती थी यह ठीक है कि वह धन को महज जमा करने की चीज न समझते थे धन, भोग करने की वस्तु है, उनका यह सिध्दांत था। फजूलखर्ची या लापरवाही बर्दाश्त न करते थे उन्हें अपने सिवा किसी पर विश्वास न था। पुष्पा ने कठोर आत्मसमर्पण के साथ इस जीवन के लिए अपने को तैयार कर लिया था। पर बार-बार यह याद दिलाया जाना कि यहां उसका कोई अधिकार नहीं है, यहां वह केवल एक लौंडी की तरह है उसे असह्य था। अभी उस दिन इसी तरह की एक बात सुनकर उसने कई दिन खाना-पीना छोड दिया था। और आज तक उसने किसी तरह मन को समझाकर शांत किया था। कि यह दूसरा आघात हुआ इसने उसके रहे-सहे धैर्य का भी गला घोंट दिया सन्तकुमार तो उसे यह चुनौती देकर चले गए वह वहीं बैठी सोचने लगी अब उसको क्या करना चाहिए इस दशा में तो वह अब नहीं रह सकती वह जानती थी कि पिता के घर में भी उसके लिए शांति नहीं है डाक्टर साहब भी सन्तकुमार को आदर्श युवक समझते थे और उन्हें इस बात का विश्वास दिलाना कठिन था। कि सन्तकुमार की ओर से कोई बेजा हरकत हुई है पुष्पा का विवाह करके उन्होंने जीवन की एक समस्या हल ली थी उस पर गिर विचार करना उनके लिए असूझ था। उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी अभिलाषा थी कि अब कहीं निश्ंचित होकर दुनिया की सैर करेंब यह समय अब निकट आता जाता था। ज्योंही लडका इंगलैंड से लौटा और छोटी लडकी की शादी हुई कि वह दुनिया के बंधन से मुक्त हो जायंगे पुष्पा गिर उनके सिर पकडकर उनके जीवन के सबसे बडे अरमान में बाधा न डालना चाहती थी गिर उसके लिए दूसरा कौन स्थान है- कोई नहीं तो क्या इस घर में रहकर जीवन-पर्यंत अपमान सहते रहना पडेगा-

साधुकुमार आकर बैठ गया । पुष्पा ने चौंककर पूछातुम बम्बई कब जा रहे हो-

साधु ने हिचकिचाते हुए कहाजाना तो था। कल लेकिन मेरी जाने की इच्छा नहीं होतीब आने-जाने में सैकड़ों का खर्च है घर में रूपये नहीं हैं, मैं किसी को सताना नहीं चाहता बम्बई जाने की ऐसी जरूरत ही क्या है जिस मुल्क में दस में नौ आदमी रोटियों को तरसते हों, वहां दस-बीस आदमियों का क्रिकेट के व्यसन में पडे रहना मूर्खता है मैं तो नहीं जाना चाहता

पुष्पा ने उत्तेजित कियातुम्हारे भाई साहब तो रूपये दे रहे हैं-

साधु ने मुस्कराकर कहाभाई साहब रूपये नहीं दे रहे हैं, मुझे दादा का गला दबाने को कह रहे हैं मैं दादा को कष्ट नहीं देना चाहता भाई साहब से कहना मत भाभी, तुम्हारे हाथ जोडता हूं

पुष्पा उसकी इस नम्र सरलता पर हंस पड़ी बाईस साल का गर्वीला युवक जिसने सत्याग्रह-संग्राम में पढना छोड, दिया, दो बार जेल हो आया, जेलर के कटु वचन सुनकर उसकी छाती पर सवार हो गया । और इस उप्रंडता की सजा में तीन महीने काल-कोठरी में रहा, वह अपने भाई से इतना डरता है, मानो वह हौवा हों बोलीमैं तो कह दूंगी।

तुम नहीं कह सकतीं इतनी निर्दय नहीं हो।

पुष्पा प्रसन्न होकर बोलीकैसे जानते हो?

चेहरे से।
     झूठे हो।

तो गिर इतना और कहे देता हूं कि आज भाई साहब ने तुम्हें भी कुछ कहा हैथा।,

पुष्पा झेंपती हुई बोलीबिल्कुल गलत वह भला मुझे क्या कहते?

अच्छा मेरे सिर की कसम खाओ।

कसम क्यों खाउफं- तुमने मुझे कभी कसम खाते देखा है?

भैया ने कुछ कहा है जरूर, नहीं तुम्हारा मुंह इतना उतरा हुआ क्यों रहता? भाई साहब से कहने की हिम्मत नहीं पडती वरना समझाता आप क्यों गडे मुर्दे उखाड रहे हैं जो जायदाद बिक गई उसके लिए अब दादा को कोसना और अदालत करना मुझे तो कुछ नहीं जंचता। गरीब लोग भी तो दुनिया में हैं ही, या सब मालदार ही हैं मैं तुमसे ईमान से कहता हूं भाभी, मैं जब कभी धनी होने की कल्पना करता हूं तो मुझे शंका होने लगती है कि न जाने मेरा मन क्या हो जाय। इतने गरीबों में धनी होना मुझे तो स्वार्थान्धता-सी लगती है। मुझे तो इस दशा में भी अपने उपर लज्जा आती है, जब देखता हूं कि मेरे ही जैसे लोग ठोकरें खा रहे हैं। हम तो दोनो वक्त चुपड़ी हुई रोटियां और दूध और सो-संतरे उड़ाते हैं मगर सौ में निन्यानबे आदमी तो ऐसे भी हे जिन्हें इन पदार्थो के दर्शन भी नहीं होते आखिर हममें क्या सुर्खाब के पर लग गये हैं?

पुष्पा इन विचारों की न होने पर भी साधु की निष्कपट सच्चाई का आदर करती थी बोलीतुम इतना पढते तो नहीं, ये विचार तुम्हारे दिमाग में कहां से आ जाते हैं?

साधु ने उठकर कहाशायद उस जन्म में भिखारी था।

पुष्पा ने उसका हाथ पकडकर बैठाते हुए कहामेरी देवरानी बेचारी गहने-कपडे को तरस जायगी।

मैं अपना ब्याह ही न करूंगा।

मन में तो मना रहे होगे कहीं से संदेसा आये।

नहीं भाभी, तुमसे झूठ नहीं कहता शादी का तो मुझे ख्याल भी नहीं आता। जिंदगी इसी के लिए है कि किसी के काम आयेजहां सेवकों की इतनी जरूरत है। वहां कुछ लोगों को तो क्वांरे रहना ही चाहिए। कभी शादी करूंगा भी तो ऐसी लडकी से जो मेरे साथ गरीबी की जिंदगी बसर करने पर राजी हो और जो मेरे जीवन की सच्ची सहगामिनी बने।

पुष्पा ने इस प्रतिज्ञा को भी हंसी में उड़ा दियापहले सभी युवक इसी तरह की कल्पना किया करते हैं लेकिन शादी में देर हुई तो उपद्रव मचाना शुरू कर देते हैं।

साधुकुमार ने जोश के साथ कहामैं उन युवकों में नहीं हूं भाभी अगर कभी मन चंचल हुआ तो जहर खा लूंगा।

पुष्पा ने गिर कटाक्ष कियातुम्हारे मन में तो बीबी (पंकजा) बसी हुई है।

तुम से कोई बात कहो तो तुम बनाने लगती हो, इसी से मैं तुम्हारे पास नहीं आता।

अच्छा सच कहना पंकजा जैसी बीबी पाओ तो विवाह करो या नहीं?

साधुकुमार उठकर चला गया । पुष्पा रोकती रही पर वह हाथ छुड़ाकर भाग गया । इस आदर्शवादी, सरल प्रकृति, सुशील, सौम्य युवक से मिलकर पुष्पा का मुरझाया हुआ मन खिल उठता था। वह भीतर से जितनी भारी थी, बाहर से उतनी ही हल्की थी सन्तकुमार से तो उसे अपने अधिकारों की प्रतिक्षण रक्षा करनी पडती थी, चौकन्ना रहना पडता था। कि न जाने कब उसका वार हो जाय शैव्या सदैव उस पर शासन करना चाहती थी, और एक क्षण भी न भूलती थी कि वह घर की स्वामिनी है और हरेक आदमी को उसका यह अधिकार स्वीकार करना चाहिए देवकुमार ने सारा भार सन्तकुमार पर डालकर वास्तव में शैव्या की गप्री छीन ली थी वह यह भूल जाती थी कि देवकुमार के स्वामी रहने पर ही वह घर की स्वामिनी रही अब वह माने की देवी थी जो केवल अपने आशीर्वादों के बल पर ही पुज सकती है मन का यह संदेह मिटाने के लिए वह सदैव अपने अधिकारों की परीक्षा लेती रहती थी यह चोर किसी बीमारी की तरह उसके अंदर जड पकड चुका था। और असली भोजन को न पचा सकने के कारण उसकी प्रकृति चटोरी होती जाती थी पुष्पा उनसे बोलते डरती थी, उनके पास जाने का साहस न होता था। रही पंकजा, उसे काम करने का रोग था। उसका काम ही उसका विनोद, मनोरंजन सब कुछ था। शिकायत करना उसने सीखा ही न था। बिल्कुल देवकुमार का-सा स्वभाव पाया था। कोई चार बात कह दे, सिर झुकाकर सुन लेगी मन में किसी तरह का द्वेष का मलाल न आने देगी सबेरे से दस-ग्यारह बजे रात तक उसे दम मारने की मोहलत न थी अगर किसी के कुरते के बटन टूट जाते हैं तो पंकजा टांकेगी किस के कपडे कहां रखे हैं यह रहस्य पंकजा के सिवा और कोई न जानता था। और इतना काम करने पर भी वह पढने और बेल-बूटे बनाने का समय भी न जाने कैसे निकाल लेती थी घर में जितने तकिये थे सबों पर पंकजा की कलाप्रियता के चिफ्न अंकित थे मेजों के मेजपोश, कुरसियों के गप्रे, संदूकों के गिलासब उसकी कलाकृतियों से रंजित थे रेशम और मखमल के तरह-तरह के पक्षियों और गूलों के चित्र बनाकर उसने प्रेम बना लिये थे जो दीवानखाने की शोभा बढ़ा रहे थे और उसे गाने-बजाने का शौक भी था। सितार बजा लेती थी, और हारमोनियम तो उसके लिए खेल था। हां, किसी के सामने गाते-बजाते शरमाती थी इसके साथ ही वह स्कूल भी जाती थी और उसका शुमार अच्छी लडकियों में था। पन्द्रह रूपया महीना उसे वजीगा मिलता था। उसके पास इतनी फुर्सत न थी कि पुष्पा के पास घड़ी-दो-घड़ी के लिए आ बैठे और हंसी-मजाक करे उसे हंसी-मजाक आता भी न था। न मजाक समझती थी, न उसका जवाब देती थी पुष्पा को अपने जीवन का भार हल्का करने के लिए साधु ही मिल जाता था। पति ने तो उल्टे उस पर और अपना बोझ ही लाद दिया था।

साधु चला गया । तो पुष्पा गिर उसी ख्याल में डूबीकैसे अपना बोझ उठाए इसीलिए तो पतिदेव उस पर यह रोब जमाते हैं जानते हैं कि इसे चाहे जितना सताओ, कहीं जा नही सकती, कुछ बोल नहीं सकती हां, उनका ख्याल ठीक है उसे विलास वस्तुओं से रूचि है वह अच्छा खाना चाहती है, आराम से रहना चाहती है एक बार वह विलास का मोह त्याग दे और त्याग करना सीख ले, गिर उस पर कौन रोब जमा सकेगा, गिर वह क्यों किसी से दबेगी

शाम हो गई थी पुष्पा खिडकी के सामने खड़ी बाहर की ओर देख रही थी उसने देखा बीस-पच्चीस लडकियो और स्त्रियों का एक दल एक स्वर से एक गीत गाता चला जा रहा था। किसी की देह पर साबित कपडे तक न थे सिर और मुंह पर गर्द जमी हुई थी बाल रूखे हो रहे थे जिनमें शायद महीनों से तेल न पड़ा हो यह मजूरनी थीं जो दिन भर इऊट और गारा ढोकर घर लौट रही थीं सारे दिन उन्हें धूप में तपना पड़ा होगा, मालिक की घुडकियां खानी पड़ी होंगी शायद दोपहर को एक-एक मुट्ठी चबेना खाकर रह गई हों गिर भी कितनी प्रसन्न थीं, कितनी स्वतंत्रब इनकी इस प्रसन्नता का, इस स्वतंत्रता का क्या रहस्य है?

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