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म्यूजिकल चेयर -  पद्मा राय
(सेरिब्रल पाल्सी (स्पैस्टिक-एक प्रकार की मानसिक विकलांगता) से पीड़ित बच्चों की कहानियाँ)
 

1.म्यूजिकल चेयर


लाल ईंटों से बनी इमारत सामने दिखाई दे रही है। मुख्य द्वार के गेट से अंदर प्रवेश करते ही - एक कतार में थोडे-थोडे दूर पर खडी पीले रंगों की बसों पर लिखी इबारत पर यूं ही नजर चली गयी।बडे-बडे एवं साफ सुथरे अक्षरों से उन पर लिखा था _
''चेतावनी''
''विकलांग बच्चों की बस''
''कृपया दूरी बनाए रखें''
यहां आने वाले बच्चों मे से ज्यादातर के चेहरे,मेरे दिमाग में किसी फिल्मी रील की तरह घूम गये। बहुत ज्यादा सोचने का समय नहीं था।रिसेप्शन पर निवाड से बंधा पंकज हाथ में कलम लेकर रजिस्टर में कुछ लिख रहा था। मुझे देखकर हमेशा की तरह मुस्कुराया।
''गुड मार्निंग , दीदी।''
''गुड मार्निंग पंकज।'' मुस्कुराकर उसका जवाब देते हुए मैं आगे बढ ली।
 कुछ देर तक उसका मुस्कुराता चेहरा भी मेरे साथ-साथ चलता रहा। उस समय पंकज क्या लिख रहा होगा ? शायद अपना सिग्नेचर कर रहा हो। यह भी कोई बात हुयी? मैं भी क्या फालतू की बातों मे अपने दिमाग को उलझाये रहतीं हूं। मैं पंकज को छोडक़र ,उससे आगे निकल गयी।
रास्ते मे कई बच्चे और मिले। कुछ टीचर्स ,हेल्परस एवं वालण्टियर भी आते जाते दिखाई दिये। इस समय किसी को फुर्सत नहीं थी। हां परिचित चेहरों को देखकर फार्मेलिटी वश मुस्कुराते जरूर थे।कुछ बच्चे अपने हाथों से अपने व्हील चेयर के पहिये को घुमाते हुये क्लासरूम की तरफ बढ रहे थे तो कुछ को मदद की जरूरत पड रही थी। कइयों के हाथ में क्वाड्रीपैड्स थे जो उन्हें आगे बढने मे सहायता कर रहे थे तो कुछ गेटर्स के सहारे धीरे धीरे ही सही अपने गन्तव्य की ओर बढ रहे थे।यह समय ऐसा था जिस समय ज्यादातर लोग यहां चल रहे थे।उनमें एक मैं भी थी।सब जल्दी मे थे।किसी को किसी से बात करने की फुर्सत नहीं थी।खडड़-ख़डड़,ख़ट्,-खट् जैसी आवाजों , जो या तो व्हील चेयर्स की थीं या फिर बैसाखियों की - को ही सुना जा सकता था।इस समय इसके अलावा और किसी दूसरी आवाज को सुनना जरा मुश्किल था।
जल्दी थी मुझे भी।मेरे कदम अपने आप तेज हो गये।
आज 'ग्रास मोटर सेशन' है। क्लास रूम के ठीक बगल में ,इस इमारत के सबसे पीछे वाले कमरे मे या यूं कहिए हॉल में ये सेशन चलता है। फिजिओथैरेपी भी इसी कमरे में होती है।बारी-बारी से एक-एक बच्चे को वहां लाया जाता है और उसकी जरूरत के मुताबिक उसकी थैरेपी होती है। रास्ते में पडने वाले ज्यादातर क्लासरूमस में करीब-करीब,सभी बच्चे पहुंच गये थे या बस पहुंचने वाले थे।
'ग्रास मोटर सेशन' जिस कमरे मे होता है ,अच्छा खासा बडा है।बीस बाई पचीस का जरूर होगा।ज्यादा बडा भी हो सकता है।अगला एक घंटा खासा मशक्कत वाला तो है लेकिन मनोरंजक है।
वहां लगभग सारे बच्चे,टीचर्स,हेल्पर्स एवम् वालेण्टियर्स पहले से मौजूद थे। कमरे मे पहुंची। बायीं तरफ मौजूद एक बडी सी मेज पर अपना पर्स रख दिया।देखा उस पर हमेशा की तरह ढेरों चीजें पहले से रखी हुयीं थीं।बच्चों के नी पैड्स,गेटर्स, लंच बाक्सेस, पानी की बोतलें और कुछ दुपट्टे वहां थे। ये सब चीजें तो वहां हमेशा ही रखी हुयी दिखाई दे जाती थी किन्तु आज एक नया सामान भी था जो पहले मैने कभी नहीं देखा था।फिलिप्स का एक 'म्यूजिक सिस्टम'- जिसका प्लग मेज के पीछे दीवाल पर लगे स्विच बोर्ड में लगा हुआ था- की मौजूदगी से मुझे आश्चर्य हुआ।
 ''वहां इसका क्या काम हो सकता है?''
 शायद ग्रास मोटर सेशन के दौरान इसकी जरूरत पडे।लेकिन किसी से कुछ पूछने की कोशिश नहीं की। पर्स रखकर मुडी तब माथे पर पसीने की बूंदों का अहसास हुआ।गर्मी थी। पंखा चलाने की याद किसी को नहीं आयी थी।पट्-पट्-पट् ,एक साथ सभी पंखे चलने लगे।अब ठीक है। पंखे की घरर,घरर में दूसरी सभी आवाजें मद्धिम पडने लगीं।
 नेहा अभी ब्रेकफास्ट कर रही है। शीतल ने उसे सहारा देकर अपने साथ बैठाया है। केला छील कर नेहा को खिलाने का काम आज उसने अपने जिम्मे ले लिया है। नेहा खा रही है।उसका मुंह आहिस्ता-आहिस्ता चल रहा है। मैंने उसके सामने पहुंचकर उसकी आंखों मे झांकने की कोशिश की। उसने मुझे देख लिया था।किसी परिचित चेहरे को देखते ही उसकी आंखों मे दुनियां भर का उजाला आ जाता है। चमकीली आंखों की पुतलियों की चमक और बढ ज़ाती है।
प्रार्थना अभी-अभी समाप्त हुयी है। आज मोमबत्ती साहिल ने बुझायी है।मुझे वहां देखकर साहिल ने ऊंची आवाज में कहा,
''दीदी, गुड मार्निंग। पता है मैने आज मोमबत्ती बुझायी है।'' आज दिन भर मिलने वालों से साहिल और कुछ शेयर करे न करे यह बात जरूर शेयर करेगा।
इस बडे क़मरे की पीछे की दीवार से सटाकर दो बडे-बडे ग़द्दे बिछे हैं।उन पर बच्चे चुपचाप बैठे हैं और हमेशा की तरह खेल आरम्भ होने का इंतजार कर रहें हैं।वे बार-बार घडी देख रहें हैं।इंतजार लम्बा खिंच रहा है।आखिर कितनी देर इस तरह से मुंह बन्द करके बैठा जायेगा इनसे ? धैर्य थोडा कम जो है उनमें। अनायास मेरी निगाहें भी घडी क़ी तरफ घूम गयीं।
पौने दस बजने को हैं यानि कि बस अब खेल शुरू होने ही वाला है। दाहिनी तरफ की दीवार पर टंगी घडी बिना रूके टिक-टिक करती हुयी अपने काम में मुस्तैद। पृथ्वी और पी। कुमार एक-एक करके कुर्सियां कमरे में लाकर बीचों बीच एक पंक्ति में लगाने में व्यस्त।
 घडी क़े ठीक नीचे एक खूबसूरत घर का चित्र। पीछे की दीवार पर कई तरह के मोटीवेशन चार्टस्। स्पैस्टिक बच्चों के लिए अनेकों हिदायतों से भरे हुए ढेरों चार्ट्स से लगभग सभी दीवारें भरी हुयीं हैं।उनमे कहीं कैटर पिलर्स बने हैं तो कहीं उम्र के लिहाज से डवलपमेन्टल स्टेजेस के बारे में बताया गया है।
 बांयीं तरफ एक खूबसूरत चार्ट टंगा है जिसमें गेट ट्रेनिंग के बारे मे बडे विस्तार से समझाया गया है।डिजाइनर का नाम 'मंजू' है।
कुर्सियां लगायीं जा चुकीं हैं।पी कुमार को मौका मिल गया ,खिसक लिया।अब कम से कम आधे घंटे तो लगेगा ही उसे लौटने में और इस बीच पृथ्वी उसके हिस्से का काम बिना किसी शिकवा शिकायत के करता जायेगा, लगातार।ऐसे ही चलता है हमेशा।पी। कुमार कुछ खास लोगों की बातों पर ही तवज्जो देता हुआ दिखायी देता है। ज्यादातर लोगों की बातों को कोई न कोई बहाना बनकर टाल जाता है। बहाना ऐसा बनाता है कि भी विश्वास हो जाता है।लेकिन है नम्बर एक का आलसी।
 'ग्रास मोटर सेशन' एक तरह का गेम पीरिएड है।इस दौरान इन बच्चों को कोई न कोई ऐसा गेम खिलाया जाता है जिससे उनके शरीर की एक्सरसाइज भी होती रहती। इस सेशन की इंचार्ज है 'अमित'।उम्र यही कोई छब्बीस वर्ष, अपनी उम्र से कुछ ज्यादा शोख,हर दिन एक नये अंदाज मे ,हमेशा ऐक्शन से लबालब दिखायी देती।अपनी तरफ सबको आकर्षित करती हुयी जिन्दगी से भरपूर अमित दी बच्चों की चहेती और बच्चों मे ही मगन।
एक घंटे का यह समय है तो इन बच्चों का ग्रास मोटर सेशन किन्तु हम बडे भी इसमें उसी दिलचस्पी से भाग लेतें हैं जिस तरह ये बच्चे।उस समय दिमाग से यह गायब हो जाता है कि अपनी उम्र अब इस तरह के क्रिया कलापों को झेलने मे उतनी सक्षम नहीं है। जब थोडी देर झुक कर खडे होने के बाद सीधा खडे होने मे दो तीन मिनट लग जातें हैं ,तब उम्र का अहसास जोर मारने लगता है।जीवन के ढलान पर खडे होने के बावजूद मन तो जैसे ठहरा हुआ है उसी पुरानी अवस्था में -सच्चाई को समझने मे अभी वक्त लगेगा।
आज कौन सा गेम खेलना है ? निर्णय अमित को करना है।खेल जल्दी आरम्भ होना चाहिए। कभी घडी पर टंगती निगाहे तो कभी अमित पर।वक्त की पाबंद हैं अमित दी।अब ग्रास मोटर सेशन आरम्भ होने को है ,सबको मालूम है।अमित दी की ओर सबकी उत्सुकता भरी आंखें।
उन्होने निराश नहीं किया।सबको बारी-बारी देखा।देर हो गयी है आज।कुछ देर तक चुपचाप खडे होकर सबकी उत्सुकता को बढावा देती हुयी अमित के अंत में होंठ हिले।
''आज हम एक नया खेल खलेंगे।''
सब एकाग्रचित्त होकर सुन रहें हैं। तानिश की आंखों की पुतलियां नाचती हुयी अमित दी के चेहरे पर अटक सी गयीं।अपनी भंवें हिलाते हुए इशारे से ही उसने पूछना चाहा -
 ''कौन सा गेम दीदी?'' लेकिन किसी ने भी नहीं सुना।अमित ने भी नहीं।
''आज हम 'म्यूजिकल चेयर' नाम का गेम खेलेंगे।''
अप्रत्याशित था।एक दम अनूठा चयन। आज का यह खेल इनको एक अनोखा अनुभव देने वाला है। अभी तक इन्होने यह खेल दूसरों को ही खेलते हुये देखा था।अब उनकी बारी आयी है। मजा आयेगा।तरह-तरह के भाव उनके चेहरों पर अपना रंग दिखाने लगे।इशिता विनयना की तरफ देख कर हंस रही थी तो साहिल अपने बगल मे बैठे जतिन को यह समझाने मे लगा हुआ था कि वह इस खेल के बारे मे सब कुछ अच्छी तरह जानता है।मीनू अपने आपको संभालने मे नाकाम अपनी खुशी का इजहार बखूबी कर रही थी।खुश थे सभी।उनकी हरकतें इस बात की गवाह थीं। कुछ आंखों से तो कुछ धीमे स्वर मे इस खेल के विषय में थोडी बहुत जो भी जानकारी उनके पास उपलब्ध थी एक दूसरे को बताने लगे। कमरे के अंदर इन सबकी मिली जुली आवाजें गड्ड मड्ड हो गयीं थीं।कुछ भी साफ सुनाई नहीं दे रहा था।उत्सुकता अपने चरम पर थी।
वहां कुल ग्यारह बच्चे मौजूद थे। जिसमें से एक - नेहा खेलने मे असमर्थ थी। दस कुर्सियां कमरे के बीचोंबीच एक सीध मे रख दी गयीं।नेहा अपनी जगह पर बैठ कर खेलते हुए बच्चों को देखेगी।कुल दस बच्चे खेलेंगे।दीपक, इशिता, सनी,विनयना,सुनील, सोनी, सुनील वर्मा, जतिन, क्षितिज, तानिश, और मीनू। बडें हैं कुल सात।चार टीचर्स, एक वालण्टीयर यानि कि मैं और दो हेल्पर्स। वैसे पी। कुमार तो अभी तक लौटा नहीं है। वह बाहर गया है।काफी देर हो चुकी है उसे गये हुए क्या पता खेल समाप्त होने तक लौटेगा भी या नहीं ? मुझे इसमें सन्देह है।
 नेहा खेल नहीं सकती।इसलिये गद्दे पर उठंग कर शीतल के सहारे बैठी हुयी है।सब खेल की तैयारी में जुट गये। छटपटाती नजरों से नेहा ने हम लोगों को देखा , कुछ जानना चाह रही थी।उन बडी-बडी आँखों मे हलचल साफ दिखायी दे रही थी। कौन कहता है ,नेहा बोल नहीं सकती। मैं देख रही थी कि उसके होंठ थरथरा रहे थे जैसे कुछ कह रहें हों। मैं सुन पा रही थी नेहा की आवाज ,मेरे अलावा दूसरे किसी ने नहीं सुना। नेहा भी खेल का हिस्सा बनना चाह रही थी पर ........उसकी आंखें भर आयीं हैं।लेकिन उस छोटी सी लडक़ी को अच्छी तरह से यह मालूम था कि वह इस खेल का आनन्द, सिर्फ उसे सब बच्चों को खेलते हुए देखकर ही उठा सकती है। मजबूरन उसने अब अपने मन पर काबू करीब-करीब कर ही लिया है किन्तु उसकी बेचैनी कभी-कभार उसके चेहरे से जाहिर हो जा रही है। अभी अपने मन के भावों को छिपाना उसे नहीं आया है।
 मैने अपनी आंखें उसकी तरफ से हटा लीं क्योंकि मुझे लगने लगा था कि अगर मैं कुछ देर और उसे इसी तरह एक लगातार देखती रहती तो जो आंसू उसकी पलकों पर अटके थे उन्हें बाहर आने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।
सायास मैने अपनी आंखों को नेहा की तरफ से हटाया और कहीं और देखने लगी। उसके नजदीक जाकर कुछ देर बैठने की भी इच्छा मन मे उठने लगी , किन्तु नहीं। समय कम है और खेल शुरू होने वाला है।
बच्चों में कुलबुलाहट बढने लगी।खेल आरम्भ होने तक जाने क्या हाल होगा? एक दूसरे की आवाज सुनना भी मुश्किल था।खेल जल्दी शुरू हो जाय तब इन्हें संभालना शायद आसान हो जायेगा। लेकिन अमित की हिदायतें हैं कि समाप्त होने का नाम नहीं ले रहीं हैं।एक के बाद दूसरी हिदायत लगातार।अपने अनोखे अंदाज में कुछ कहे बिना भी हरदम बोलती हुयीं आंखों के साथ करीब-करीब आदेश देती हुयी उसकी आवाज ने सबको थोडी देर के लिए शांत होने के लिए मजबूर कर दिया। अकेले अमित की आवाज कमरे मे सुनायी पड रही थी।ध्यानपूर्वक सब उसे सुन रहे थे।खेल मे अगर जीतना था तो ध्यान से सुनना जरूरी था।
''तानिश के अलावा सभी बच्चों के पैरों मे आप लोग नी पैड्स बांध दीजिए।'' अंजना से संबोधित था यह वाक्य।
''तानिश को अब नी पैड्स की जरूरत नहीं है।वह अब गेटर्स के सहारे चलने लगा है। क्यों तानिश ठीक कह रहीं हूं न ?''
हमेशा से वाचाल तानिश आश्चर्य शरमाने लगा। उसके हाव भाव देखने लायक थे। मजा आ गया।उसने कहा एक शब्द नहीं लेकिन अपनी बैठने की जगह बार-बार बदलते हुए अमित दी से सहमत है, सिर हिलाकर जता जरूर दिया। होंठ गोल करके सीटी बजाने की कोशिश शुरू कर दी उसने। चार-छः बार सू-सू से मिलती जुलती आवाज उसके मुंह से निकली लेकिन सीटी नहीं बज पायी। अब बाद में कभी सीटी बजाने की प्रैक्टिस की जायेगी।
 ''मीनू और दीपक हेलमेट भी पहनेंगे।'' अमित ने इन्सट्रक्शन दिये।
अंजना और शीतल, दोनो के लिये दिये गये थे ये इन्सट्रक्शन। दो मिनट के अंदर ही वे दोनो हेलमेट पहने और नी पैड्स बांधे सामने तैयार दिखायी दिये।कुर्सियों तक पहुंचने की बेताबी बढती जा रही थी।मै अपनी बारी की उम्मीद करते हुए इन्तजार कर रही थी किन्तु अब लगा कि मुझे इस तरह के किसी काम के लिये नहीं कहा जायेगा। मैं वालण्टियर थी शायद, इसलिए।वालण्टियर्स के लिए कुछ खास काम ही होते होंगे।या फिर किसी और कारण से? क्या पता।
''तानिश को छोडक़र सभी बच्चे घुटनों के बल कुर्सी तक पहुंच जायें।''।
''तानिश,तुम अपने आप चलकर कुर्सी के पास पहुंचो।'' तानिश की अपने तरफ देखते हुए अमित ने देखा तो मुस्कुराकर कर कहा।इतना सुनते ही तानिश जितना हो सकता था उतना तेज चलते हुए कुर्सी की तरफ बढा।
अपने शरीर का पूरा बोझ हाथों पर, और घुटनों के बल लगभग दौडते हुए सभी ने एक-एक कुर्सी हथिया ली।तानिश भी पीछे नहीं रहा।लहराकर चलते हुए कमरे के बीच पहुंचा और एक कुर्सी का पीछे का हिस्सा पकडक़र खडा हो गया।इसके बाद आगे क्या करना है ,अभी तक अमित दी ने नहीं बताया है।ताली बजाकर सबका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करते हुए अमित ने कहा-
 ''सब ध्यान देकर सुनो नहीं तो खेलते समय तुम लोगों को परेशानी होगी। तुम्हारा पूरा ध्यान म्यूजिक पर होना चाहिए।म्यूजिक आरम्भ होते ही तुम लोग अपनी-अपनी कुर्सियो से उठकर उनके चारों तरफ चलना शुरू कर दोगे।तब तक चलते रहना होगा जब तक म्यूसिक बंद न कर दिया जाय।म्यूजिक बंद होने के साथ ही हर बच्चे की ये कोशिश होनी चाहिए कि वह किसी एक कुर्सी तक पहुंच कर उस पर बैठ जाय। बैठने के लिए जिसको कुर्सी नहीं मिलेगी वह अपने आप गेम से बाहर हो जाएगा।'' कहते-कहते अमित ने थोडी देर के लिए चुप होकर सबको देखा और फिर कहा-
''एक बात विशेष रूप से ध्यान देना होगा कि कोई भी बच्चा दौडते-दौडते आधे रास्ते से उल्टा मुडक़र नहीं दौडेग़ा।ऐसा करना खेल के नियम के विरूद्ध है।जो भी ऐसा करता हुआ पाया जाएगा वह बच्चा भी खेल से बाहर कर दिया जायेगा।खेल इसी तरह आगे बढेग़ा और तब तक चलता रहेगा जब तक कि केवल एक कुर्सी नहीं बच जाती।उस कुर्सी पर बैठने वाले बच्चे को ही विजेता कहा जाएगा।''
अमित ने अपनी बात पूरी कर दी थी किन्तु अभी भी सारे बच्चे शांत बैठे थे और एकटक अमित को देख रहे थे।
''तुम लोगों को मेरी बात समझ मे आयी या नहीं ?''
बच्चे जैसे नींद से जागे। बोले - सारे के सारे ,करीब-करीब एक साथ-
''आ गयी दीदी।''
''तब क्या समझूं ,सब तैयार हैं ?''
''हां जी,तैयार हैं।''जल्दी-जल्दी अपनी गोल-गोल आंखें झपकाते हुए तानिश ने कहा।
 उत्सुकता अपने चरम पर थी। अब तक नेहा की उदासी गायब हो चुकी थी। आश्चर्य था उसकी आंखों मे। वह खेल का हिस्सा नहीं थी तो क्या, देख तो सकती है। खेल देखने में भी, कम आनन्द नहीं है।नेहा को देखकर यह बात आसानी से समझी जा सकती है।
 सावधान हैं सब। एक कुर्सी पर बैठे हुए हैं और अपने आगे वाली कुर्सी पर निगाहें हैं।तैयारी पूरी है सबकी। सबकी निगाह कुर्सियों पर टिकी है।।
 स्विच बोर्ड की तरफ अनिता का हाथ बढा और म्यूजिक चालू हो गया।बच्चे चलने लगें हैं।वे सब चल रहें हैं, पैरों से नहीं 'घुटनो' से।एक भजन की पंक्तियां दिमाग में कौंध गयीं।
 ''ठुमक चलत रामचन्द्र ,बाजत पैजनियां ऽऽऽऽ।''
''घुटनो से चलते हुए रामचन्द्र।'' गोस्वामी तुलसी दास ने जिस समय इस गीत की रचना की होगी तब उनके भगवान रामचन्द्र की उम्र साल डेढ साल से ज्यादा तो नहीं ही रही होगी। लेकिन हमारे इन अनेकों रामचन्द्रों की उम्र चार,पांच, ....सात या कुछ ऊपर होगी।उम्र से फर्क भी क्या पडता है।ये हमारे ढेरों रामचन्द्र तुलसी के एक रामचन्द्र से किसी तरह कमतर नहीं।
 उधर तानिश अपने दोनो हाथों को सामने लाकर ,दसों अंगुलियों को एक दूसरे में जकडे, ग़ेटर्स बंधे पैरों से लडख़डाता हुआ दौड में सबसे आगे रहने की हरसंभव कोशिश के बावजूद बीच-बीच में पीछे मुडक़र देखना नहीं चूकता।घुटनों से चलने वाले बच्चे उससे तेज दौड रहें हैं।कम मुसीबत नहीं है।हल्का फुल्का शरीर होता तब ठीक होता। भारी भरकम शरीर के साथ संतुलन बनाना कोई आसान थोडे ही है।
 'साहिल' की स्पीड अच्छी है।घुटनो के बल दौड रहा है किन्तु अपने पर भरोसा नहीं ,इसलिए पहले से ही हारने के लिए तैयार है और दुखी भी।
 'मीनू' बहुत खुश है। नी पैड्स और हेलमेट के साथ समर मे कूद चुकी है। उसके लिए युध्द की तरह ही है यह खेल। पूरे आत्मविश्वास के साथ कुर्सी की तरफ लपकती हुई मीनू।
बच्चों से थोडी दूरी बनाकर हम सब भी लगातार चल रहैं हैं। हमारा सारा ध्यान उन्हीं बच्चों पर केन्द्रित है। न जाने कब उन्हें हमारी जरूरत पड ज़ाय।
इस बीच एक कुर्सी हटा दी गयी थी।कुल मिलाकर खेलने वाले बच्चों की संख्या है 'दस' किन्तु कुर्सियां हैं सिर्फ 'नौ'। म्यूजिक एकाएक बंद हो गया। अपने अपने कब्जे में कम से कम एक कुर्सी करने के चक्कर में भगदड सी मच गयी। मीनू एवं सनी को छोडक़र सभी को कुर्सियां मिल चुकीं हैं। अभी एक कुर्सी खाली पडी है। दोनो मे होड सी लग गयी, कौन पहले पहुंचेगा उस खाली कुर्सी तक। आगे-आगे मीनू और उसके पीछे सनी। लगभग तय था कि मीनू आसानी से खेल मे बनी रहेगी। किन्तु नहीं, अचानक संतुलन बिगडा और मीनू का सिर जमीन पर। सिर से जमीन पर अपने को आगे ढकेलती मीनू उठने की भरपूर कोशिश करने मे जुटी हुयी थी कि तभी शीतल नेहा को दीवार के सहारे बैठा कर उसके पास पहुंची। उसे सहारा देकर उठा लिया। ये तो शुक्र था कि मीनू के सिर पर उस समय 'हैलमेट' था। नहीं तो काफी चोट लग सकती थी। सुनील सोनी को मौका मिल गया। इन सबके दौरान उसे खाली पडी क़ुर्सी आसानी से हासिल हो गयी। कुर्सी पर बैठकर वह बहुत खुश था।
''मीनू , चोट तो नहीं आयी?'' घबराकर अंजना उसके शरीर का मुआयना करने में जुट गयी।
''नहीं।'' खिसियानी हंसी के साथ वह घुटुरन चलते हुए कोने मे बिछे गद्दे पर जाकर चुपचाप बैठ गयी और दर्शकों मे शामिल हो गयी।
''कोई बात नहीं मीनू , तुम्हारी कोशिश अच्छी थी।दोबारा जब यह गेम होगा तब तुम ही इस खेल को जीतोगी।''
अमित ने उसे ढाढस बंधाया। मीनू को चोट लगी थी किन्तु उसका उसे कोई मलाल नहीं था किन्तु खेल से बाहर हो गयी थी इस कारण रोनी सी सूरत बन गयी थी उसकी और अब किसी भी पल रोने वाली थी लेकिन अंजना दीदी की बातों ने उसे ऐसा करने से रोक दिया।एक उम्मीद हो गयी उसे।अगली बार वही जीतेगी। 'बहादुर बच्ची'। अमित अक्सर कहती है-
''अवर मीनू इज ए ग्रेट फाइटर।''
 हमे मालूम है कि योद्धा कभी हारने के लिए युद्ध के मैदान मे नहीं उतरता। सोते जागते हमेशा विजेता बनने का ख्वाब उसके मन मे चलता रहता है। इसके अलावा उसे दूसरा कुछ नहीं सूझता।
 खेल दोबारा आरम्भ हो गया। म्यूजिक स्टार्ट हो गया और बच्चों ने फिर से चलना शुरू किया।ठीक पहले की भांति अपने आगे वाली कुर्सी पर नजरें टिकाये वे कुर्सियों की परिक्रमा कर रहें हैं। एक कुर्सी और कम कर दी गयी।इस बार सुनील वर्मा बाहर हुआ।कुर्सी पहले निकलती फिर बच्चा निकलता और फिर कुर्सी ....। लगातार यही क्रम चलता रहा। दोनो, कम होते जा रहे थे। खेल मे असफल होने पर बच्चे थोडा मायूस होते और फिर गद्दे पर पहुंचकर अपने-अपने अंदाज में बैठते जा रहे थे। कमरे के किनारे बिछे गद्दे पर बैठने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढती जा रही थी। गेम से बाहर निकलने वाले बच्चों की मायूसी कुछ देर रहती लेकिन थोडी देर बाद ही वे भी बाकी बचे बच्चों के खेल का आनन्द उठाने लगते। धीरे-धीरे खेल मे मजा बढता जा रहा था। खेल सबकी उत्सुकता बढाने में समर्थ , किन्तु अंत की ओर अग्रसर था।
 खेल में कुर्सियां बचीं हैं सिर्फ दो और बच्चे रह गयें हैं तीन।इशिता के नी पैड्स ढीले हो गयें हैं और उसके घुटनो का साथ छोड ,फ़िसलते हुए टखने के पास पहुंच गयें हैं। लेकिन नी पैड्स का ध्यान किसे है? उसके चक्कर मे पडी तो पीछे रहने की संभावना बढ ज़ायेगी। जमीन पर घिसटते हुए घुटनो में दर्द तो जरूर हो रहा होगा पर अभी उस बारे मे सोचने का समय नहीं है उसके पास।उसकी परवाह किये बिना दौड रही है इशिता।
 अंजना ने अमित के कान मे कुछ कहा।खेल दो मिनट के लिए रोक दिया गया। अपनी-अपनी जगह पर बच्चे रूक कर खडे हो गये। इशिता का नी पैड ढीला हो गया था उसे दुबारा कस कर बांध दिया गया।
म्यूजिक सिस्टम एक बार फिर ऑन हुआ और एक बार फिर से चलने लगे बच्चे। वे सब चल रहें हैं लगातार।थकान होने लगी है, उन्हें देखकर साफ समझ में आ रहा है। खेल मे बचे हुए बच्चों को अपनी थकान महसूस करने का वक्त शायद अभी नहीं आया है।अपने आगे की कुर्सी पर गिद्ध दृष्टि जमाये चलते जा रहें हैं निरंतर। हाथ ,पैर,मुंह और आंखें सभी कुछ सुर्ख लाल हो चुकें हैं।म्यूजिक चल रहा है। बाहर हवा भी कुछ तेज रफ्तार से चल रही है। यहां इस कमरे मे मौजूद ज्यादातर लोग भी चलते हुये बच्चों के साथ लगातार चलते जा रहें हैं।
''तीन बच्चे खेल मे अभी हैं। इनमे से कौन खेल जीतेगा ? क्या मालूम।'' मैने अपना कंधा झटका।
''कोई तो जीतेगा ही।'' मन मे सोचा।
सनी, शीतल की क्लास का और इशिता एवं विनयना, नर्सरी के- जिसकी क्लास टीचर अंजना है। सभी बच्चे एक बराबर हैं किन्तु न जाने क्यों आज मेरा मन विनयना को ही जीतते हुए देखना चाहता है। ईश्वर को मानती हूं या नहीं ठीक से नहीं जानती तब भी आज अनजाने मे उसी ईश्वर से उसकी जीत की कामना करती मैं भी लगभग उसके साथ-साथ चलती चली जा रही हूं। उसमे कुछ तो ऐसा जरूर है जिसकी वजह से जिस दिन वह स्कूल नहीं आती उस पूरे दिन कहीं कुछ खो जाने का अहसास सा होता है।
वहां उपस्थित सभी लोगों का ध्यान उन तीनो की तरफ लगा है। लेकिन उन के पास फुर्सत नहीं है कि वे हम सबको एक बार देख भी सकें। तीनो कुर्सियां कमरे के बीचोबीच रखी हुयीं थीं।तीनो बच्चे उनसे हट कर किन्तु उनके चारों तरफ चल रहे थे।जब भी उनमे से कोई किसी कुर्सी के नजदीक पहुंचता उसकी रफ्तार धीमी हो जाती। करीब-करीब थम से जाते।उस समय वे दिल से यह मनाते हुए लगते कि म्यूजिक बंद हो जाय। अमित को बार-बार टोकना पडता। बच्चों को उसकी बात मानते हुए अनमने ढंग से ही लेकिन फिर से चलना पडता। कई बार कुर्सी के नजदीक पहुंचे बच्चे और वहां पहुंच कर रूके भी। कई बार अमित को अपनी बात दुहरानी पडी र फिर उन्हें कुर्सी को छोडक़र चलना भी पडा। इस खेल मे जब तक म्यूजिक बजेगा तब तक बच्चों को चलना होगा, ऐसा अमित दीदी ने आरम्भ मे ही कहा था।क्या करते वे? खाली पडी क़ुर्सियों को देखते ही जैसे पिछली सारी हिदायतें उनके दिमाग से गायब हो जातीं और पुरानी हरकत दुबारा करने को वे मजबूर हो उठते।सामने की कुर्सी को छोडक़र आगे बढते समय उनके चेहरे को देखकर ऐसा लगता जैसे किसी कडवी चीज की वजह से उनके मुहं का जायका खराब हो गया हो और उनके चेहरे पर इस तरह का भाव तब तक बना रहता जब तक कि अगली कुर्सी के नजदीक वे नहीं पहुंच जाते।
 एक झटके मे सब कुछ ठहर गया।इशिता हडबडा गयी। सारे नियम कानून उसके दिमाग से गायब हो गये।अभी अभी कुर्सी के पास से आगे बढी थी।मुश्किल से एक कदम आगे।बस क्या था। पीछे घूम कर कुर्सी के नजदीक पहुंची।उसने उसे पकड लिया और विजयी भाव से पीछे आते सनी को देखकर मुस्कुरायी।सनी के पास कुर्सी नहीं थी। किन्तु इशिता गलत थी।उससे फाउल हुआ था।खेल से बाहर होना पडेग़ा इशिता को।कुछ देर तक कमरे मे अफरातफरी मची रही।
 दो बच्चे बच गये थे।दो टीम के बीच खेल चल रहा हो जैसे ,ऐसा माहौल बन गया था वहां।दरअसल दोनो बच्चे अलग-अलग कक्षाओं से थे।विनयना नर्सरी की और सनी पहली कक्षा का छात्र था।वहां उपस्थित सभी लोगों के नजरों के केन्द्र बन चुके थे ये दोनो बच्चे।सबकी निगाहें चिपक सी गयीं थीं उनपर।
 एक अकेली कुर्सी कमरे के बिल्कुल बीच में रखी हुयी थी। इस कुर्सी का महत्व उस समय बहुत बढ ग़या था।बच्चों को एक बार फिर से हिदायतें दीं गयीं।उन्हें चलते रहना है लगातार।रूकना नहीं है।कुर्सी के पास पहुंचकर कोई नहीं रूकेगा और न ही म्यूजिक बंद होने पर वापस लौटकर कुर्सी पर बैठेगा।इस बार उन्हें कुर्सी से दूर दूर चलना होगा। अमित को ध्यान से सुना उन दोनो ने और सब कुछ ठीक उसी तरह से करने के लिए अपने आप को तैयार भी कर लिया।कमरे के बीच मे रखी हुयी कुर्सी को लालसा भरी नजरों से देखते हुए आखिरी बार म्यूजिक सिस्टम ऑन होने का इंतजार करने लगे वे दोनो। अनिता ने हाथ बढाकर अंतिम बार म्यूजिक सिस्टम का स्विच ऑन कर दिया।
 दो टीमो मे लोग विभाजित हो चुके थे। दोनो टीमें अपने-अपने खिलाडी क़ो प्रोत्साहित करते हुए उत्तेजित थे।तानिश की तो हर बात निराली होती है। आंखें मटका-मटका कर विनयना को जोश दिला रहा था। उसकी तल्लीनता देखते ही बन रही थी। इस समय तक सारे नियम बच्चों को अच्छी तरह से याद हो चुके थे।वे उनका बखूबी पालन करते हुये जीतने की पूरी कोशिश कर रहे थे।
''कहीं कोई गलती न हो जाय नहीं तो कुर्सी मिलने के बावजूद इशिता की तरह हार झेलनी पडेग़ी।'' कुर्सी के नजदीक पहुंचकर चाल धीरे भी नहीं कर सकते।मन मसोसकर ही सही किन्तु चल रहें हैं वे लगातार।
''इस खेल मे मुझे ही जीतना है।'' दोनो के मन की यही इच्छा है।
कुर्सी के नजदीक पहुंचने पर मन की यह इच्छा सिर उठाने लगती कि काश म्यूजिक रूक जाये परन्तु जब ऐसा नहीं होता तब आगे बढना पडता और उनके चेहरे तनावग्रस्त हो जाते।
''मुझे लग रहा है कि विनयना जीतेगी।'' मैने फुसफुसाते हुए कहा।
घुटनों चलती विनयना के कांपते हाथों के ऊपर नजरें जमाये हुए मुझे- अंजना देखती रही कुछ देर ,किन्तु उसने कुछ कहा नहीं सिर्फ हल्के से मुस्कुरायी।उसे मालूम है, मेरी कमजोरी है विनयना।
अचानक जैसे समय ठहर गया।अनिता ने इस बार स्विच ऑफ करके प्लग भी निकाल दिया।अब उसे वहां लगे रहने का कोई मतलब नहीं।एक मिनट के लिए सबकी सांस थम सी गयी।भाग रही है विनयना।भाग रहा है सनी।दोनो भाग रहें हैं।प्लग निकाला गया तब जब विनयना ने कुर्सी के आगे मुश्किल से दो कदम बढाया होगा।कुर्सी के बेहद नजदीक किन्तु दो कदम आगे।सनी बहुत पीछे था किन्तु अब आगे पहुंच गया है।पीछे मुडक़र कुर्सी के नजदीक विनयना नहीं पहुंच सकती।फाउल होगा।शीतल उछलने लगी।विनयना की जीत अब नहीं होगी।हम सब को जैसे सन्नाटे ने अपने घेरे मे लपेट लिया।हल्की सी आवाज भी किसी के मुंह से नहीं निकल पा रही है। उधर सनी के कक्षा के बच्चे ताली बजाने मे मगन हो गये।उन लोगो ने उसके नजदीक पहुंचकर उसे चारों तरफ से घेर लिया और शीतल उसकी पीठ थपथपाने लगी।सनी का चेहरा खुशी से सराबोर था लेकिन अपनी खुशी कैसे जाहिर करे उसकी समझ मे नहीं आ रहा था।
 विनयना ने कुछ भी नहीं कहा। न जाने क्या हुआ उसे।अपनी जगह पर रूक गयी।एक दम खामोश।पहले अमित की तरफ देखा फिर अंजना को भी। अपने उम्र के बच्चों मे सबसे ज्यादा आई क्यू है उसका। हार बर्दाश्त करने की आदत नहीं है विनयना को।आंखें भरभरा आयीं उसकी।अब उसे कैसे संभाला जायेगा ? आसान नहीं है ये हममे से किसी के लिए भी।थोडी देर पहले ताली बजाकर खुश होते बच्चों ने भी विनयना को देखा और वे सब भी चुप हो गये।सनी जीतने के बावजूद दुखी हो गया।न जाने क्यों, उसने सोचा कि अच्छा नहीं हुआ।उसे देख कर लग रहा था ,जैसे हार उसी की हुयी है।सबने उसे घेर रखा था ,किन्तु सबकी आंखें अब विनयना की तरफ मुड चुकीं थीं।उस घेरे से बाहर निकल कर वह आगे बढा।उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया।विनयना के पास पहुंचकर उसे सांत्वना देते-देते वह भी रोने लगा।विनयना उसे रोते हुए देखती रही कुछ देर।फिर जाने क्या हुआ और उसने अपनी लडख़डाती जबान में सनी से पूछा-  
''सनी तुम तो जीत गये हो फिर क्यों रो रहे हो ?''
''तुम रो रही हो न,इसलिये मुझे भी रोना आ रहा है।''
उसकी बात सुनकर विनयना हंसने लगी।उसके हंसते ही सब लोग मुस्कुराने लगे।बच्चे एक बार फिर से तालियां बजाने लगे। खेल के ऐसे अंत की तो किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।एक बार फिर सनी की जीत हुयी थी।

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2. विनयना

स्कूल नजदीक आ गया है। घडी देखी।न जाने कब के नौ बज चुके हैं।कितनी भी कोशिश कर लूं लेकिन रोज सवा नौ - साढे नौ हो ही जातें हैं।भागते हुए गेट के अंदर घुसी।क्लास रूम एकदम अंदर की तरफ, आंगन के अंत में है। हमेशा की तरह रास्ते में कई बच्चे - कुछ अपने हाथ से व्हील चेयर को ढकेलते हुये तो कुछ के साथ कोई टीचर या वालंटियर हैं उनकी मदद के लिए - अपने-अपने क्लास की तरफ जाते हुए दिखाई दिए। अभी ज्यादा देर नहीं हुई थी। मेरा क्लास रूम सामने  था।
''गुड मार्निंग एवरी बॉडी।'' कह कर   मुस्कुराते हुये मैंने अन्दर प्रवेश किया।।
वे सब ब्रेकफास्ट कर रहें हैं।तानिश को देखकर हंसी आनी ही थी।वह अपने टिफिन बॉक्स पर झुका हुआ बडे चाव से अपना खाना खा रहा था। हमेशा ऐसे ही मगन होकर खाता है तानिश।उसको इस तरह स्वाद लेकर खाते हुए देखकर सच में अक्सर मेरा भी मन उसका खाना खाने का करने लगता है।उसकी मम्मी बडे मन से उसके उसके लिए टिफिन, पैक करती है।हर दिन कुछ अलग बनाकर उसमे रखती है।उन्हें अच्छी तरह से मालूम है कि उनका बेटा खाने का कितना शौकीन है। तानिश का पूरा ध्यान अपने लंच- बॉक्स की तरफ ही है।लेकिन बावजूद इसके सबसे पहले उसका ध्यान मेरी तरफ गया।उसके हाथ मे पैटीस का एक टुकडा था।
मुंह में पैटी लगभग ठूंसते हुए उसने कहा-
 ''गुड मार्निंग दीदी।''
बाकी बच्चों को भी याद आया कि मुझे विश करने मे उनसे देर हो गई है।सबने मेरी तरफ देखकर शर्माते हुए कहा-
 ''गुड मार्निंग , पद्मा दीदी।''
''हैलो .... पद्मा।''
अमिता हमेशा की तरह लगभग भागती हुई क्लास के अंदर घुसी।अमिता फिजियोथेरीपिस्ट है और हमेशा जल्दी में रहती है।
''कैसी हैं?''
''ठीक हूं।''
''हैलो ,पद्मा दी।''
अंजना की आवाज आलमारी की तरफ से आयी -
''मैं सोच ही रही थी कि आज पता नहीं आप आएंगी भी या नहीं !''
उसने आलमारी बंद कर दी। मैंने देखा - उसके हाथ में कैण्डल और माचिस थी।प्रेयर की तैयारी लगभग पूरी थी।
''आप आ गईं हैं तो अब अच्छा लग रहा है। पता नहीं क्यों हर दिन मुझे आपका इंतजार रहता है।'' उसने अपनी कुर्सी खींचते हुए कहा।
उसको इस तरह बोलते हुए सुन कर मैं समझ नहीं पाई कि मैं इसका क्या जवाब दूं। कुछ कहने को था भी नहीं।केवल मुस्कुरा देतीं हूं।अंजना इस क्लास के बच्चों की क्लास- टीचर है।उसका सारा काम व्यवस्थित और समय से होना ही है।जरा भी इधर -उधर नहीं।बच्चे अपना लंच खत्म कर चुके हैं।उनकी तरफ देखकर बोली -
'' अच्छा बच्चों अब ब्रेक फास्ट ओवर , प्रेयर के लिए सब लोग तैयार हो जाओ।''
मेरा काम अब शुरू हो गया था।मैने बारी-बारी सबके लंच बॉक्स बंद करके उनके बैग के अंदर रख दिया है।नैपकिन्स से सबका मुंह हाथ पोंछ दिए हैं।बच्चे प्रेयर के लिए अब तैयार हैं। मैने भी एक कुर्सी आगे खींच ली और उस पर बैठ गई।सामने की दीवार पर एक चार्ट जिसमें एक से दस तक अंग्रेजी में लिखे हुयें हैं -टंगा है।
अब सब तैयार थे।मोमबत्ती मेज पर बीचों-बीच जल रही थी।बच्चे अपनी-अपनी कुर्सियों में मेज के चारों ओर चुप-चाप बैठें हैं।अंजना की तरफ बहुत ध्यान से, सभी देख रहें हैं।
अब अंजना दीदी बोलीं -
 ''  सब अपनी -अपनी आंखे बन्द कर के अपने हाथ जोड लें।''
बच्चों ने आंखे बन्द करने की हर संभव कोशिश शुरू कर दी।तानिश को कुछ मुश्किल हो रही है।बार-बार आंख दबाकर मूंदने की कोशिश करने के बावजूद उसकी एक आंख खुल जाती है।सबको देखता है-आंखें बंद हैं सबकी।झट से अपनी दोनो आंखें भींचकर बंद कर लेता है।बहुत मेहनत लग रही है उसको इसमें। बेहद कठिन काम है , लेकिन क्या करे करना तो है ही।तानिश ने गलती की- इसका अहसास उसे हो गया है इसलिये गलती करने के बाद क्षमा याचना की मुद्रा में अंजना दीदी की तरफ देखा लेकिन वह ऐसे बैठीं थीं जैसे उन्होंने उसे देखा ही न हो।
 मीनू ने आंखें तो बंद कर लीं हैं ठीक तरह से लेकिन उसके हाथ उसकी बात मानने के लिए तैयार नहीं।एक साथ दोनो हाथ जुड ही नहीं पा रहे हैं।बार-बार एक हाथ दूसरे हाथ से दूर भाग जाता है ,मुश्किल में है पर कोशिश जारी है।
'विनयना' अद्भुत है, हर काम पूरी तन्मयता से करने की कोशिश करते हुए उसे हमेशा ही देखा है मैंने।आई क्यू लेवल काफी हाई , पर अक्सर पूरी कोशिशों के बावजूद असफल रह जाने पर मैंने कई बार उसकी आंखों मे आंसू लहराते देखें हैं।उसका शरीर उसके अपने ही दिमाग का आदेश मानने से इंकार करता है।फिर भी वह बहादुरी के साथ अपनी लडाई लड रही है।अंजना दी ने प्रेयर शुरू कर दी है।मैं भी अपने दोनो हाथ जोडे विनयना के पीछे चुपचाप खडी हूं।
 ''ओऽऽम -ओऽऽम - ओऽऽम लोका समस्ता ,सुखिनो भवन्तु।ओऽऽम....।शान्ति , शान्ति, शान्ति:''।
प्रेयर समाप्त हो चुकी है।
 ''अब धीरे-धीरे सब बच्चे अपने हाथ आपस में रगडक़र आंखों के पास ले जाएंगे और फिर उन्हें आहिस्ता -आहिस्ता खोलेंगे।'' अंजना दी स्वयं भी ठीक उसी तरह से करते हुए कह रहीं थीं।
 ज्यादातर बच्चे जो पहले से ही आंखें खोल कर बैठे थे उन्होंने झट से अपनी आंखें बंद कर लीं हैं और अपनी अंजना दीदी की तरह ही सब करने की कोशिश करने में जुट गएं हैं।मुझे हंसी आ रही है।बमुश्किल हंसी रोक कर उन्हें चुपचाप देख रहीं हूं।अंजना से भी कुछ छिपा नहीं है लेकिन वे गंभीर हैं।बच्चे नहीं जान पाये कि अंजना दीदी ने उन्हें आंखें खोले देखा है।बच्चों के सामने अंजना ज्यादातर गंभीर ही रहतीं हैं।
 ''हां तो बताओ तुममे से आज कैण्डल कौन बुझाएगा?''
''मैं दीदी'' .... ''मैं दीदी'' कई आवाजें एक साथ सुनायी दीं। कैण्डल बुझाकर बच्चे बहुत खुश होतें हैं, लगता है जैसे कोई किला फतह कर लिया हो।अंजना मुझे देख रही है।निर्णय मुझे लेना है।
''आज तो विनयना की बारी है।'' मैंने अंजना की तरफ देखा।
विनयना बहुत खुश है।अंजना ने धीरे से कैण्डल को उठाया और उसके करीब कर दिया।
''मैं कल बुझाऊंगा ,नऽऽ दीदी ?''साहिल ने बडी उम्मीद के साथ मुझसे पूछा।
''हां साहिल, कल तुम्हारी ही बारी है।''
अब पूरी क्लास का ध्यान विनयना की तरफ।मैं उसके पास रखी एक खाली कुर्सी पर बैठ गई।
''अऽफूऽऽऽ .... अऽफूऽऽऽ'' जी जान से लगी है विनयना।उसका 'जॉ मूवमेन्ट' प्रापर नहीं है।मुझे जाने क्यों  बेचैनी होने लगी।अचानक जैसे मुझे कुछ होने लगा।
अभी विनयना की कोशिश चल ही रही थी कि अनजाने में मैने भी ठीक उसी समय फूऽऽऽ किया ,कैण्डल की लौ तेजी से लहराई और फिर.... एक पतली सी धुएं की लकीर में बदल गई।
अंजना मेरी तरफ देख कर हल्के से मुस्कुरायी। बच्चों ने कुछ नहीं देखा।वे ताली बजा रहें हैं।सब खुश हैं।विनयना ने आज कैण्डल जो बुझा ली है।
''वेरी गुड विनयना,'' अंजना दी के बोलते ही उसकी निर्दोष आंखों की चमक दुगनी हो गई।
 आज पूरे दिन मैं मगन हूं।बार-बार उसकी आंखों की चमक मुझे दिखाई दे रही है।मेरी खुशी छिप नहीं पा रही है। दिन भर में कई लोग पूछ चुके कि आखिर मेरे इतना खुश होने के पीछे राज क्या है ?
''ऐसा तो कुछ भी नहीं है।'' कह कर बात टाल दे रही हूं।
 पता नहीं क्यों ,बडे से बडा काम करके भी शायद कभी मुझे इतना सुख नहीं मिल पाया है जितना आज अनजाने में किया हुआ यह ''फूऽऽऽऽ'' दे गया है।

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3.जेरिन ने सिर नहीं हिलाया


 जेरिन बदल गया है। अपनी अलग दुनियां थी उसकी और उसी दुनियां में वह मगन रहता था । वह बात पुरानी हो चुकी है ।
 सिर्फ अपने आप से बातें करता हुआ जेरिन तब किसी से परिचित नहीं था किन्तु अब सबको पहचानता है । बहुत कुछ समझने लगा है। उसकी दुनियां में अब यहां के लोग भी शामिल हो गयें हैं।सबको पहचानने लगा है और सबसे कोआपरेट करता है। अपनी दोनो आंखें मिचमिचाकर हंसता है।हंसता है और साथ में मजे की ताली बजाता है।बिलावजह हंसना उसने अब बंद कर दिया है।
सबकी बातों को ध्यान से सुनता है । अगर कोई कुछ पूछता है तब अपने तरीके से उस प्रश्न का उत्तर भी देता है।जैसे-
'' जेरिन,यहां कुल कितने बच्चें हैं ? क्या तुम बता सकते हो ?''
अचानक उसकी आंखें छत पर टिक जातीं हैं और वह बताने लगता है -
'' एक, दो, तीन ........  दस........।''अपनी ऊंगलियों के सहारे तब तक उसका गिनना जारी रहता है जब तक उसकी याद में बसे सारे नम्बरों की गिनती समाप्त नहीं हो जाती।इससे कोई फर्क नहीं पडता कि बच्चे दो हों ,चार हों ,दस हों या फिर उस नम्बर के बराबर जो नम्बर उसके द्वारा गिने गये नंबरों मे सबसे बडा है या फिर उससे भी ज्यादा ।
इस समय साढे ग्यारह बजें हैं ।प्रतिदिन ठीक साढे ग्यारह बजे जेरिन को स्टैंडिंग पोजीशन में रहने की तैयारी करनी होती है। पढने के अलावा यहां के बच्चों को और बहुत सारे कार्य करने पडतें हैं।फिजियोथेरैपी साथ साथ चलती रहती है ।पढाई की वजह से फिजियोथेरैपी में व्यवधान नहीं पडना चाहिए ।इस बात को सब अच्छी तरह से जानतें हैं।
पृथ्वी ने चटाई पर लिटाकर उसे गेटरस बांध दिया ।उसे सावधानी से खडा करके निवाड से कसकर उसकी स्टैडिंग टेबल से बांध दिया है। जेरिन स्टैंडिंग पोजीशन में है। उसके दोनो हांथ सामने टेबल पर और आंखें सामने वाली दीवार पर टिकीं हैं। दीवार की तरफ मैने देखा और यह जानने की कोशिश की कि आखिर कौन सी वस्तु उसका ध्यान आकर्षित कर रही है किन्तु कुछ ठीक से समझ नहीं पायी।सामने की दीवार पर बच्चों के हाथों से बनी अनगढ क़लाकृतियां -रंग बिरंगे अलग अलग आकारों में जिसकी संख्या में प्रति दिन बढाेतरी होती जाती है -टंगें हैं ।दीवार पर कई तरह के पोस्टर भी टंगें हैं जिन्हें अंजना दीदी ने बनाया है।। कल बच्चों ने ऐक्टीविटी के दौरान जो तितलियां बनाईं थीं वे भी आज दीवार पर टंग गईं हैं और शायद वही उसे आकर्षित कर रहीं हैं।
उसे आधा घंटा इसी पोजीशन में रहना है। बाकी सभी बच्चों का राइटिंग सेशन चल रहा है ।दीदी उनमें व्यस्त हैं ।जेरिन कभी नहीं लिखता क्योंकि वह लिख नहीं सकता हां अक्षरों को पहचान सकता है ।सब लिख रहें हैं उसे भी कुछ करना होगा ।पढाई के समय तो उसे कोई उसे मौका देता नहीं कि वह स्वयं अपने से बात कर सके इसलिए ठीक है , इस समय अपने आप से बातें करना सबसे अच्छा होगा ।वही कर रहा है ।जब कोई दूसरा जेरिन से बातें करने वाला नहीं होता तब जेरिन का सबसे अच्छा साथी जेरिन ही होता है।
''मम्मी हॉस्पीटल गयी है। पापा आयें हैं ।दीदी ने आज मम्मी से यह कहा ........वह कहा।और न जाने क्या क्या ।किसी का ध्यान उसकी तरफ नहीं है।दीदी का भी नहीं । अटेन्शन सीकिंग ऐक्शनस जारी हैं । जेरिन अपनी तरफ से हर संभव कोशिश कर रहा है कि उसकी तरफ कोई देखे या उससे कोई बात करे ।
सभी बच्चे अपनी-अपनी कुसिर्यों से बंधे बैठें हैं ।बंधना जरूरी भी है ।क्योंकि अगर ऐसे न किया जाये तो कुछ पता नहीं वे कब अपनी जगह से फिसल जायें या कि उनके दिमाग और बाकी शरीर का कोआर्डिनेशन गडबडाए और वे कुर्सी पर से मेज पर या नीचे जमीन पर लुढक़ जायें ।इनके हाव भाव से आभास हो रहा है कि यह सेशन अब बोरिंग हो चला है ।बस चुपचाप बैठ कर लिखते जाओ।मजबूरी है सबकी, दीदी के हिसाब से लिखना बहुत जरूरी है।उनकी बात टाली नहीं जा सकती ।थोडी देर तक ठीक लगता है फिर मन घबडाने लगता है ।बहुत लिख चुके, अब कुछ इन्ट्रेस्टिंग होना चाहिए ।स्पैस्टिक हैं तो क्या ,सामान्य बच्चों की तरह ही इनका दिमाग भी कुलांचें मारता है ।दीदी से लिखने से मना करना जरा मुश्किल काम है लेकिन अपने क्रिया कलापों से वे उन्हें महसूस कराकर ही मानेंगे कि अब बस दीदी,लिखना बन्द करने का आदेश दीजिए ।किसी की पेन्सिल बार-बार नीचे गिर रही है , किसी को टॉयलेट जाना है और तानिश की तो हर बात निराली है ,उसे बहुत जोर की भूख लगी है ।दोनो पर्दों के दरार से रोलेटर को ढकेलते हुये सनी दिखायी पड रहा है और उसी दरार में से तानिश अंजना दीदी की नजरें बचाकर उसे देख रहा है ।दोनो की निगाहें मिलीं और मुस्कुराहटों का आदान प्रदान भी हुआ।तानिश की आंखों की पुतलियां नाचने लगीं कि विध्न पडा -
''तानिश कहां ध्यान है तुम्हारा?'' तल्ख आवाज और वह भी अंजना दीदी की ।अचंभित होकर तानिश ने अपनी आंखें सनी पर से हटा लीं ।अंजना दी अभी भी उसे घूर रहीं थीं ।अंजना अपनी जगह से उठीं और पर्दे को खींचकर बीच की दरार को बंद करने की कोशिश की।
पढने में दिल नहीं लग रहा है तब भी पढना है।लेकिन इससे बचने के उपाय तो किये ही जा सकतें हैं ।इसमें हर्ज क्या है? ज्यादा से ज्यादा समय इधर उधर की बातों में जाया करने की कोशिशें जारी हैं ।मीनू की पेन्सिल चौथी बार नीचे गिरी ।तीन बार उठाकर मैं उसे दे चुकीं हूं ।पेन्सिल पकडते समय उसने एक बार भी मुझे नहीं देखा ।इस बार दिया तो इत्तेफाक से उसकी निगाहें मेरी आंखों से टकरा गईं ।मैंने उसे आंख तरेर कर उसे देखा ।हडबडाकर उसने पेन्सिल पकडनी चाही ।ठीक से पेंसिल उसके हाथ में आई नहीं और एक बार फिर नीचे ।मैं हंसी ।मीनू के सारे के सारे दांत बाहर निकल आये ।दीदी के साथ-साथ सभी बच्चे भी हंसने लगे ।
इशिता की जिज्ञासा का समाधान इसी वक्त होना चाहिए ।उसकी दिमागी दौड ज़ारी है।जाने कहां-कहां की सैर करता उसका नन्हा सा दिमाग उसे एकाग्रचित्त नहीं होने दे रहा है ।लिखते -लिखते अचानक उसकी पेन्सिल रूक गयी ।
''दीदी-दीदी ।''
''क्या है ?''
''दीदी एक बात पूछूं ?''
''क्या बात है ?''
''दीदी बताइये ऐसा क्यों होता है? मैं आपको देख रहीं हूं न ?''
''हां तो .... ।'' कुछ पूछना चाहती है इशिता पर क्या ?
''मैं बतातीं हूं ।देखिए मैं आपको भी देख रहीं हूं ,तानिश को भी देख रहीं हूं ,सब कुछ देख रहीं हूं तब फिर मैं अपने आपको क्यों नहीं देख पा रहीं हूं ?''
उसका प्रश्न मुझसे था।आंखे फाडक़र वह एकटक मेरी तरफ देख रही है ।उसे जवाब चाहिए ।अचंभित किया इस प्रश्न ने ।इसका छोटा सा दिमाग कितनी अनोखी समस्या से जूझ रहा है।मैं कैसे और क्या समझाऊं?
अभी मैं इसी उधेडबुन में थी कि उसकी जिज्ञासा का समाधान कैसे करूं तभी साहिल के ठुनकने की आवाज ने ध्यान अपनी तरफ खींचा ।अब इसे क्या हो गया ? मैंने उसकी तरफ देखा ।उसके एक हाथ में पेन्सिल और दूसरे से वह अपनी आंखों को रगड रहा था।
''क्यों रो रहे हो साहिल ? क्या हो गया?''
''दीदी ऽऽऽपैर दुख रहें हैं ।बडी ज़ोर से दुख रहें हैं दीदी ।'' रोनी सी सूरत बनाकर, सूखी आंख लिये साहिल मुझे देख रहा था।
''कहांऽऽऽऽ?''ध्यान से उसके पैरों का मुआयना करते हुए मैंने पूछा ।उसने अपने पैरों पर जिस जगह दर्द होने की बात कही वहां मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया ।उस जगह पर उसे दो महीने पहले इंजेक्शन लगा था।जब भी उसका मन किसी काम में नहीं लगता है तब उसका यह दर्द उभर आता है ।मैंने दर्द की जगह पर धीरे से सहलाया ।पूछा-
 '' अब.... ठीक हो गया ।?''
''नहीं दीदी , अभी भी दुख रहा है ।'' टूअर जैसा मुंह बनाया साहिल ने।यहां से मेरा किसी न किसी बहाने उठना ही मुनासिब होगा ।जितना मैं उसके दर्द को लेकर उससे पूछताछ करूंगी उतना ही उसका दर्द बढता जायेगा ।
''ओह !'' कह कर मैं वहां से उठकर कोने में रखी लाल रंग वाली आलमारी के पास चली गयी ।उसे खोला और उसमें से एक किताब निकालकर उसके पन्ने पलटने में व्यस्त हो गयी या यूं कहिए व्यस्त होने का दिखावा करने लगी ।कुछ देर वहीं खडे होकर उस किताब को उलटती पलटती रही और फिर अपनी जगह पर वापस लौट आयी ,देखा -साहिल का दर्द सिरे से गायब हो चुका है ।
'तानिश' का क्या कहना -वे साहब तो हैं ही लाजवाब ।अपनी किताब कॉपी के अलावा दुनिया जहां की हर वस्तु पर उसकी नजर है ।ग्यारह बजने के बाद से ही -लंच होने में अभी कितना टाईम बाकी बचा है ,कई बार पूछ चुका ।कभी-कभी तो ब्रेकफास्ट होने के पांच दस मिनट बाद से ही लंच टाईम के बारे में उसकी पूछताछ आरम्भ हो जाती है।कमरे की बाहरी दीवार का करीब करीब दो तिहाई हिस्सा तो दरवाजा ही है जिस पर टंगे पर्दे पर बने रंग बिरंगे जानवर कभी उसका ध्यान खींचते तो कभी पर्दा हिलने पर बाहर- कोई न कोई उधर से गुजरते हुये उसे दिखायी दे जाताऔर उसका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर लेता।उसकी कुर्सी भी दरवाजे से सटकर है ।वहां से वह जब चाहे बाहर का मनभावन नजारा देख सकता है।और इसीलिये उसे यह जगह बहुत ज्यादा पसंद भी है।
'जेरिन' स्वयं ही प्रश्न करता है और स्वयं ही उस प्रश्न का उत्तर भी दे देता है ।लगभग हमेशा अपनी ही दुनियां मे मस्त 'जेरिन' अचानक किसी से आंख मिल जाये तो बात दूसरी है नहीं तो जल्दी किसी से भी आंख मिलाकर बात नहीं करता।इस समय उसके साथ के सभी बच्चे अपनी पढाई-लिखाई में लगें हैं ,दीदी उन्हें पढाने में व्यस्त हैं और पृथ्वी को शीतल दीदी अपने साथ कहीं ले गयीं हैं ।जेरिन वहीं खडा है । उससे कोई बात नहीं कर रहा है।दूसरों की कही बातें दुहराने के लिए जेरिन को इससे अच्छा वक्त कहां मिलेगा?सब पढ रहें हैं ।वह भी पढेग़ा ।
''जे फॉर जेरिन ।'' जेरिन ने कहा और फिर खिलखिला कर हंस दिया ।फिर उसका मन किया कि वहा पोयम गाये ।
''दीदी-दीदी जेरिन पोयम सुनायेगा ।''
अंजना दीदी ने घडी देखी ।ग्यारह बजकर पचास मिनट हो रहें हैं ।
''ठीक है जेरिन ।चलो बच्चों अब अपनी अपनी किताब कॉपी बन्द करो ।हम सब पोयम गायेंगे ।जेरिन भी गायेगा ।क्यों जेरिन ?''
जेरिन ने हवा में अपना हाथ लहराया और एक बार फिर हंसा ,खिलखिल-खिलखिल ।कहने लगा -
''जेरिन पोयम सुनायेगा ।''
जेरिन की इस तरह की बातें मुझे बडे ग़हरे छू जातीं हैं ।निराला है हमारा जेरिन ।दीदी का इशारा पाते ही सबकी कापियां फटाफट बन्द हो गयीं जबकि उन्हें खुलने में कम से कम दस मिनट लग गये थे।विनयना ने तो अपनी कॉपी अपने सामने से कुछ इस अंदाज मे हटाने की कोशिश की कि उसकी कॉपी ,पेन्सिल और रबर सब कुछ मेज के ऊपर से फिसलते हुए मेज के नीचे पहुंच गये। पास में खडा पृथ्वी हंसा और झुककर उन्हें बटोरने लगा ।विनयना भी हंसने लगी ।इशिता ने अंजना से कहा ,
''दीदी, विनयना मेरी सबसे अच्छी दोस्त है।मुझे वह बहुत अच्छी लगती है।विनयना अच्छी है न दीदी ?''
अंजना ने अपना सिर हिलाकर हांमी भरी।
 बच्चे देर से लिख रहे थे।लिखना कम पडे ,इसलिए बहाने ढूंढे ज़ा रहे थे ।उबासी रूक नहीं रही थी।लेकिन अब चैतन्य होकर वे सब अपनी -अपनी कुर्सियों में तनकर बैठ गये ।पोयम का नाम सुनते ही ऊबे हुए बच्चों की उकताहट हवा हो गयी ।कौन कौन सी पोयम गायी जायेगी ,इसकी तैयारी होने लगी ।उत्साह आसमान छू रहा है।पढाई की एकरसता टूटने से प्रसन्नता बढ ग़यी है।एक दूसरे की तरफ देख देख कर इशारे बाजी हो रही है ।पढाई लिखाई से कुछ देर के लिए मुक्ति मिली ,प्रसन्न तो होना ही है।
पोयम सेशन शुरू हो गया है।गा रहें हैं सारे बच्चे और गा रहीं हैं अंजना दीदी ।दो,तीन,चार पंक्तियों तक सभी बच्चों का जोश चरम पर था किन्तु फिर ठंडा पडने लगा ।किसी को एक पंक्ति याद थी तो किसी को दूसरी ।पहली पंक्ति से आखिरी पंक्ति तक शायद ही कोई पोयम किसी को याद रही होगी।हर पोयम का पहला और आखिरी शब्द गाते समय ही सारे बच्चों की आवाजें सुनाई दे रहीं है बीच में कभी किसी की आवाज अनुपस्थित होती तो कभी किसी की।बच्चे अंजना दीदी से ग्यादा चालाक निकले ।मैं समझ गयी कि इन बच्चों को पोयम में उतनी दिलचस्पी नहीं है जितनी पढाई से छुटकारा पाने की थी ।हवन करता हुआ पंडित यद आया।पूरा मंत्र वही पढता है और स्वाऽऽहाऽऽऽऽ के समय वहां उपस्थित सभी भक्तजन उसके स्वर में स्वर मिला देतें हैं।करीब-करीब वही स्थिति यहां की भी है।
'जेरिन सबसे अलग है ।ध्यान मग्न होकर पूरी आस्था के साथ पोयम गा रहा है।मस्ती के आलम में झूमता हुआ वह अपने सहपाठियों की स्थिति से अनभिग्य है।उसकी गर्दन लयबद्ध तरीके से झूम रही है ।चश्में के पीछे से झांकती उसकी बडी-बडी दो निर्दोष आंखें ।कभी वे मुस्करातीं तो कभी बंद हो जातीं । बडी-बडी पलकें कभी झुकी होतीं तो कभी ऊपर टंगी दिखायी देतीं ।आंखों की पुतलियों की चमक बढती जातीं ।समा बांध दिया है जेरिन ने ।जब कभी कुछ भूलने की नौबत आती हुयी महसूस करता तब याद करने के प्रयास में उसकी भवें ऊपर उठ जातीं हैं। लेकिन एक पल से ज्यादा ऐसी स्थिति में नहीं रहता है।कमाल है एक बार भी अभी तक बीच में उसे अटकना नहीं पडा।सरगम के सातों सुरों का ज्ञान रखने वालों जैसा ही सुरीला है जेरिन।जितनी सुरीली उसकी आवाज है उतनी ही खूबसूरती से संगत करता उसका सिर ।दोनो मे होड लगी है।उसकी आंखों के भाव अनूठें हैं। जेरिन को पोयम गाते हुए सुनना नृत्य और संगीत दोनों का देखने सुनने जैसा सुख देता है।
''पीपुल्स ऑन द बस गो,अप एन्ड डाऊन , अप एन्ड डाऊन , अप एन्ड डाऊन........  ।''
ठीक इसी समय उसने मेरी तरफ देखा।हमारी नजरें मिलीं ।उसने ध्यान से देखा और समझ गया कि मेरे होंठ नहीं हिल रहें हैं ,मतलब मैं पोयम गा नहीं रहीं हूं।उस समय मैं किसी बच्चे की कॉपी में उसके लिए होमवर्क लिख रही थी ज़ेरिन ने अपनी पोयम बीच में रोक दी और कहा,नहीं आदेश दिया -
''पऽऽदऽऽमाऽऽऽ दीऽऽदीऽऽऽ ,जेरिन पोयम गा रहा है तुम भी गाओ।'' फिर'ऑल थ्रू द वे' कहकर अधूरी पंक्ति पूरी कर दी।
निर्विरोध चल रहा है पोयम सेशन ।पूरे भक्ति भाव से जेरिन एक के बाद दूसरी पोयम सुनाता जा रहा है ।उसका सिर झूम रहा है, पोयम की पंक्तियों के साथ-साथ कभी दायें तो कभी बायें ।आंखें कभी फर्श पर,कभी सामने दीवार पर टंगी किसी तस्वीर पर या फिर छत पर घूमते हुए पंखे पर नाच रहीं हैं ।पलकें झपकाना तक भूल गया है इस समय ।यही जेरिन की पूजा है ।पूजा करते समय सब लोग अपने आराध्य देव की पूजा अर्चना अपनी आंखें बंद करके करतें हैं लेकिन जेरिन की पूजा करने की विधि निराली है ।इस समय वह स्टैंडिंग पोजीशन में बंधा खडा है , उसकी दोनो आंखे खुली हुयीं हैं ,आंखों की पुतलियां ऐक्शन में हैं और सिर लगातार झूम रहा है कभी दायें तो कभी बायें ।पूजा करने का यह अनूठा तरीका सिर्फ जेरिन का ही हो सकता है ।
दरवाजे के पास कुछ हलचल हुई ।अनायास आंखें घूम गयीं ।दरवाजे पर शीतल थी ।उधर से गुजर रही थी ,पल भर के लिए ठिठक गयी ।दरवाजे से उठंग कर खडी ज़ेरिन को गाते हुए सुन रही है ।जेरिन को शाबासी दी ,
''वेरी गुड जेरिन ,ऐक्सिलेण्ट बच्चे।'' मन ही मन उसने जेरिन को ढेरों शुभकामनाएं दीं और फिर जेरिन के करीब जाकर उसकी पीठ थपथपाकर उसे शाबासी भी दी ।
 ''शीतल तुम्हें मालूम है, हमारे जेरिन को उसके सिलेबस की ए से जेड तक सभी पोयमस याद हैं ।पोयम के अलावा इसे सबके एड्डरेस और टेलीफोन नम्बरस भी याद हैं ।कमाल की याददाश्त पायी है इस बच्चे ने ।कुछ भी नहीं भूलता।'' अंजना दीदी की बात शीतल ने सुनी या नहीं ,मालूम नहीं ।क्यों कि उसने कुछ भी कहा नहीं ।वहीं खडी रही, गुम सुम ।
 जेरिन की नजर पर्दे पर जमी थी ।शीतल को उसने वहीं से आते हुए देखा है ।शीतल उसके पास खडी है किन्तु उसकी आंखें पर्दे पर ही हैं ।शीतल के मन में क्या चल रहा है यह जेरिन को नहीं मालूम ।इससे उसे कोई फर्क भी नहीं पडता ।एक बात है जो वह हमेशा याद रखता है ।
''गुड मार्निंग, शीतल दीदी ।''
''गुड मार्निंग, बच्चे ।'' कहा शीतल ने और अपने उमडते हुए मन को संभालते हुए वापस अपने क्लास रूम में लौट गयी ।
एक पोयम के बाद दूसरी फिर तीसरी पोयम लगातार बच्चे गाते जा रहें हैं ।जेरिन-जैसे मेडिटेशन में है।अब उसकी आंखें भी बन्द हो गयीं हैं।सिर को एक तरफ टेढा करके उसे हिलाते हुए , क्रमवार कभी दांयें कभी बांयें ,सारी दुनियां से बेखबर ,पूरी ईमानदारी के साथ बिना अटके जारीं हैं उसकी पोयम्स ।
अपनी जगह से पर्दा हटा ।मैंने मुड क़र देखा।एक हाथ में फाइलें पकडे अौर दूसरे से पर्दा हटाते हुए अमित कमरे में दाखिल हुई।आज शलवार कुर्ते में है ।कत्थई रंग की बडी सी गोल बिन्दी माथे पर सटाए वह हाजिर है ।अच्छी दिख रही है ।बारी बारी से सभी बच्चों ने उसे देखा।वे बच्चे जो हर पोयम का केवल पहला और अंतिम शब्द बोल कर अपना काम पूरा करने का काम कर रहे थे अब उन्होंने वह भी बन्द कर दिया।अमित को खामोशी से देख रहें हैं और मुस्करा रहें हैं।
''मेरी तरफ आप लोग क्यों देख रहें हैं? पोयम गाइये ।मेरे मुंह पर चॉकलेट चिपकी है क्या, जो तुम सबको लालच लग रही है?'' मुंह खट्टा सा बनाया उसने ।बच्चों को बडा मजा आया ।गुदगुदी सी हुयी ।सारे के सारे हंसे एक साथ।खिल-खिल, खिल-खिल।
 अमित ऐसे ही बोलती है।उसके आते ही बच्चे कुछ ज्यादा ही चैतन्य हो उठतें हैं।गाने की इच्छा खात्मे की ओर थी । अनमने भाव से दुबारा सबने गाना शुरू किया । बच्चों ने कब गाना बन्द किया और कब फिर दुबारा गाना शुरू हुआ , जेरिन नहीं जानता ।अमित का आना भी उसने नहीं देखा ।उसके भाव भंगिमा में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया ।अपनी आराधना में मगन है जेरिन।
अमित ने उसे ध्यान से देखा सीधे उसके नजदीक जाकर खडी हुई ।अपने हाथ में ली हुई फाइलें उसने मेज पर रखीं । दोनो हाथों से उसका सिर थामा और बीच में स्थिर कर दिया फिर कहा -
''अपना सिर इस तरह मत हिलाओ ।कितनी बार तुमसे कहा है मैंने जेरिन कि सिर नहीं हिलातें हैं ।इसे इसी तरह बीच में रखो ।''
अमित जिस तरह अचानक अंदर आयी थी उसी तरह एक झटके में चली भी गयी ।वह इन बच्चों की फिजियोथैरिपिस्ट है ।बच्चे उसे बहुत चाहतें हैं ।
जेरिन किसी दूसरी दुनियां में लम्बी उडान पर था।न चाहते हुए भी उसे वापस लौटना पडा।एक झटके में जमीन पर आ गया ।चौंक कर उसने अपने आस पास देखा।बडी बडी अांखें पूरी खुल गयीं ।भवें सिकुड क़र पास पास आ गयीं ।गाना वाना सब दिमाग से नदारद हो गया।आवाज कुछ देर के लिए गायब हो गयी।उसके अलावा वहां उपस्थित सभी लोग पोयम गा रहें हैं।अंजना दीदी के अलावा किसी को भी पूरी पोयम याद नहीं है।
जेरिन की आंखें दरवाजे पर जम गयी है।तनाव ग्रस्त होकर वह सामने टंगे पर्दे का हिलना निहार रहा है । जिस दरवाजे से अमित बाहर गयी थी और उस पर से जेरिन की निगाहें हट नहीं रहीं हैं पोयम में उसकी दिलचस्पी समाप्त हो चुकी है ।उसने अपने दोनो हाथों से अपने सिर को कस कर पकड लिया है । इसी तरह थोडी देर रहने के बाद उसने कहा ,
''जेरिन सिर बीच में रखो।''
स्वयं को इन्सट्रक्शन देते हुए जेरिन ।
उसका सिर कन्धों के बीचोबीच आकर ठहर गया ।पूरी ताकत लगा दी है उसने ।अमित दीदी अभी अभी यही तो कह कर गयीं हैं।उनकी बात माननी पडती है।
''जेरिन ,जेरिन तुम चुप क्यों हो गये ? गाओ न ।तुम्हें तो यह पोयम पूरी याद है।''
मैंने उसे प्रोत्साहित करने की एक कोशिश की ।उसके आवाज की अनुपस्थिति मुझे खटक रही है ।जेरिन ने मेरी बात मान ली और गाना आरम्भ किया ।
''टेन लिटिल फिंगरस् स्टैण्डिग अप टाल....''उसे दिक्कत हो रही है ।गाते समय सिर हिलने लगा था।उसका हाथ अपने आप नीचे आ गया है इस दौरान ,उस बात का उसे जल्दी ही एहसास हो गया ।गाना बंद करके उसने अपने आप को आदेश दिया -
''नोऽऽऽनोऽऽऽ ,जेरिन ,सिर नहीं हिलाते ।इसे बीच में रखो ।तुमसे कितनी बार कहा गया है न सिर नहीं हिलाते।'' कहकर जेरिन के अभी अभी नीचे आये हाथों ने दुबारा ऊपर पहुंचकर हिलते हुए सिर को अपने कब्जे में जकड लिया।जेरिन आश्वस्त हो गया।
''ऐसे ,हां ऽऽऽऽअब ठीक है ।वेरी गुड जेरिन ।''ज़ेरिन ने खुद को शाबासी दी।
अंजना की तरफ उसने देखा और उदास होकर छत पर अपनी नजरें टिका दीं।सब कुछ भूल भाल कर उसकी कोशिश सिर्फ अपने सिर को स्थिर रखने पर ही केन्द्रित हो गयी है ।अब मैंने उम्मीद छोड दी है ।आज तो शायद ही जेरिन की स्वाभाविकता वापस लौटे ।
विनयना की स्पीच थैरेपी का समय हो गया है ।पृथ्वी उसे उसकी टीचर के पास ले जाने आया है।जेरिन ने उसे देखते ही कहा ,
''पृथ्वी भइया ऽऽऽ जेरिन ने सिर नहीं हिलाया ।वेरी गुड जेरिन ,एक्सीलेण्ट ।''
झटके से दोनो हाथ नीचे आये और उसने पूरी ताकत से ताली बजायी । अपने आप को खुद ही शाबासी देते हुए जेरिन को देखकर मन अंदर तक भीग गया ।कितना भोला और निश्छल है यह बच्चा!
 पृथ्वी ने कहा ,
''वेरी गुड , जेरिन भइया !''
अंग्रेजी की कई पोयमस् गायीं जा चुकीं हैं ।अभी तक हिन्दी की एक भी कविता नहीं गायी गयी ।अब उसकी बारी है।बच्चों ने गाना शुरू किया।अभी शुरूआत है ।इसलिए जोश जरा ज्यादा है ।हमेशा ऐसा ही होता है।पूरे एक्शन के साथ सब गा रहें हैं ।
'मछली जल की रानी है,
जीवन उसका पानी है ।
हाथ लगाओगे तो डर जाऊंगी ,
बाहर निकालोगे तो मर जाऊंगी।।'
सामूहिक कविता गान में जेरिन की आवाज का न होने का मतलब है सुर और ताल की अनुपस्थिति ।अलग-अलग सुर और अलग-अलग ताल में कोरस गाया जा रहा है ।कोई द्रुत में है तो कोई बिलम्बित में ।सुनने मे वह मजा नहीं जो जेरिन के शामिल होने से मिलती है ।इस समय भी उसने अपना सिर पूरी ताकत से पकड रखा है । कविता चाहे वह गाये या न गा पाये ,सिर नहीं हिलेगा ।यह उसका दृढ निश्चय है ।कविता सुनाये और सिर न हिले यह कैसे संभव है , यह जेरिन के वश की बात नहीं ।
कविता पाठ हो रहा है ।लंच होने में अभी दस मिनट शेष हैं ।मन उचट गया है ।बैठे-बैठे करवट बदल रहीं हूं ।तभी....।अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ ।लेकिन सच है ।जेरिन के हाथ जिन्होंने उसके सिर को कस कर थाम रखा था वे अचानक नीचे आ गये । अभी तक उसने अमित के आदेश का शब्दशः पालन किया था ।अब शायद उसकी बात का असर समाप्ति की ओर बढ चला है। मेरा दिल तेजी से धडक़ने लगा ।इंतजार कर रहीं हूं ,शायद जेरिन अब शुरू करे ।अनुमान सच होने की उम्मीद कर सकतीं हूं ।वही हुआ ।जेरिन का सिर झूमने लगा ।कविता की पंक्तियां उसकी आवाज में भी सुनायी पडने लगी।आंखें उसी पुराने अंदाज में कभी बंद कभी खुली, चश्मे के पीछे से झांकती हुई ।बेजान होती जा रही कविता मे जैसे जान पड ग़यी।कलाई पर बंधी घडी पर निगाह गयी ।लंच का समय हो गया है ।अपना काम समेटने पृथ्वी वहां आ गया है ।बच्चों के हाथ धुलवाये जायेंगे ।मैं कोई कम पागल नहीं हूं ,नहीं तो क्या सोचती कि कविता पाठ कुछ देर और चलता रहे और मैं जेरिन के द्वारा की जा रही इस अनोखी पूजा मे एकाग्रचित्त होकर थोडी देर और बैठ सकूं।

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