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आइए पढ़ते हैं : रसखान की अमर कृति :: सुजान-रसखान
धारावाहिक प्रस्तुति (09 अगस्त 2019), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
मोहनदास करमचंद गांधी

प्रथम खंड : 24. भीतर की और ज्‍यादा मुसीबतें

बाईसवें प्रकरण में हमें अपनी भीतरी मुसीबतों की थोड़ी कल्‍पना हुई थी। जोहानिसबर्ग में मुझ पर पठानों का हमला हुआ उस समय मेरा परिवार फिनिक्‍स में रहता था। हमले के कारण मेरी पत्‍नी और बच्‍चों के मन में चिंता होना स्‍वाभाविक था। मुझे देखने के लिए पैसे खर्च करके फिनिक्‍स से जोहानिसबर्ग तक दौड़ आना उनके लिए संभव नहीं था। इसलिए अच्‍छा होने के बाद मेरा ही उनके पास जाना जरूरी था।

कामकाज के सिलसिले में नेटाल और ट्रान्‍सवाल के बीच मेरा आना-जाना होता ही रहता था। यह बात मेरी जानकारी से बाहर नहीं थीं कि नेटाल में भी सरकार के साथ हुए कौम के समझौते के बारे में भारी गलतफहमी फैली हुई थीं। मुझे और दूसरों को जो पत्र नेटाल से लिखे जाते थे, उनसे मुझे इसका पता चलता था। और 'इंडियन ओपीनियन' के नाम तीखे व्यंग्य से भरे हुए जो पत्र भेजे जाते थे, उनका ढेर भी मेरे पास था ही। यद्यपि अभी तक सत्‍याग्रह की लड़ाई ट्रान्‍सवाल के हिंदुस्‍तानियों तक ही सीमित थीं, फिर भी नेटाल के हिंदुस्‍तानियों की सम्मति प्राप्‍त करना और उनकी भावनाओं का खयाल रखना जरूरी था। ट्रान्‍सवाल के हिंदुस्‍तानी ट्रान्‍सवाल के निमित्त में समस्‍त दक्षिण अफ्रीका के हिंदुस्‍तानियों की लड़ाई लड़ रहे थे। अतः नेटाल में फैली हुई गलतफहमी को दूर करने के लिए भी डरबन जाना मेरे लिए आवश्‍यक था। इसलिए पहले ही मौके से लाभ उठाकर मैं वहाँ पहुँच गया।

डरबन में हिंदुस्‍तानियों की एक सार्वजनिक सभा बुलाई गई। कुछ मित्रों ने पहले से मुझे बता दिया था कि इस सभा में मुझ पर आक्रमण होनेवाला है; इसलिए या तो मैं इस सभा में उपस्थित ही न रहूँ या अपनी रक्षा के कुछ उपाय करूँ। लेकिन दोनों में से एक भी मार्ग मेरे लिए खुला नहीं था। सेवक को उसका स्‍वामी बुलाए और सेवक डर के मारे न जाए, तो उसका सेवाधर्म भंग हो जाता है। और जो सेवक स्‍वामी की सेवा से डरे, वह सेवक कैसा? सेवा के खातिर जनता की सेवा करना तो तलवार की धार पर चलने जैसा है। यदि जनसेवक प्रशंसा को स्‍वीकार करने के लिए तैयार हो, तो निंदा से वह कैसे भाग सकता है? इसलिए मैं निश्चित समय पर सभा में उपस्थित हो गया। वहाँ लोगों को मैंने समझाया कि सरकार के साथ समझौता कैसे हुआ। उनके प्रश्‍नों के उत्तर भी मैंने दिए।

यह सभा रात के लगभग 8 बजे हुई थी...

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मैं कहता आँखिन की देखी...
रजनीश कुमार शुक्‍ल

आधुनिकता की विश्‍व‍ व्‍यवस्‍था ने ऐंद्रिक सुख वाले समाज के जीवन को बेहतर बनाने का जो आश्‍वासन दिया था उसमें मानवीय संवेदना का पक्ष गौण हो गया है। 'स्‍व' और 'स्‍वत्‍व' खोया है इसलिए सारा संकट पहचान का है। पहचान तो करनी होगी, समाज की, परिवेश की, काल की और समाज और परिवेश को आतृप्‍त करने वाले चिरंतन राष्‍ट्र की। आधुनिकता ने जो बुराइयाँ दी हैं उसमें सबसे बड़ी बुराई तात्‍कालिकता की है। पीछे और आगे के मनुष्‍य के विचार न करने की है। राष्‍ट्रीय-राष्‍ट्रीयता का तत्‍व इस विखंडित दृष्टि को चिरंतन आधार देता है। इसे नेशन की अवधारणा से नहीं समझा जा सकता है। नेशन की अवधारणा पर अभी युद्ध जारी है लेकिन राष्‍ट्र हजारों-हजार वर्षों के बाद एक भारतीय मन के विचार में रचा बसा विचार है। राज्‍य और नेशन की अवधारणा से परे मनुष्‍य की सांस्‍कृतिक एकात्‍मकता और विविध प्रकार की बोलियों, भाषाओं और आदतों के बीच भिन्‍नता रखने तथा वैभिन्‍य के साथ भिन्‍न-भिन्‍न भागों में रहनेवाले लोगों के बीच जो एकसूत्रता है उसको प्रकाशित करनेवाला तत्‍व है ।

कहानी
असित गोपाल
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय

आलोचना
संजीव कुमार
कलई के पार देखनेवाली नजर : रवींद्र कालिया की कहानियाँ

परंपरा
शिव शंकर सिंह
प्रबंध गीतिकाव्‍य में राधा

विशेष
राजीव कुमार
विधा के रूप में कहानी की संरचना

व्यंग्य
पल्लवी प्रसाद
मेरा इंटरव्यू ले लो

विमर्श
वंदना चौबे
विमर्शों के समय में ‘अनदेखा अंतस’
कृष्ण कुमार मिश्र
हिंदी साहित्य : काव्य-भाषा और श्रीधर पाठक
विकास कुमार यादव
प्रेमचंद और दलित प्रश्न : एक पुनर्विचार

कविताएँ
अनिल पांडेय

संरक्षक
प्रो. रजनीश कुमार शुक्‍ल
(कुलपति)

 संपादक
प्रो. अवधेश कुमार
फोन - 9926394707
ई-मेल : avadesh006@gmail.com

समन्वयक
अमित कुमार विश्वास
फोन - 09970244359
ई-मेल : amitbishwas2004@gmail.com

तकनीकी सहायक
रविंद्र वानखडे
फोन - 09422905727
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ISSN 2394-6687

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