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कविता

अनर्गल
सुजाता


एक नदी मिली जिसे कहीं नहीं जाना था
आखिर मेरा दिल उसी नदी में डूबेगा
जहाँ सबसे तेज धड़कती होगी धरती
वहीं पड़ेगा मेरा पाँव

वह पेड़ मिला मुझे जो अब और उगना नहीं चाहता था
एक गहरे प्यार में मैंने उसे चूमते हुए कहा -
उगने के अलावा कितना कुछ है करने को
मेरी जड़ें मुझे कब का छोड़ चुकी हैं
टिकने के लिए कम नहीं होता एक भ्रम भी
विश्वास सच्चा हो तो

घोंसले से मैंने कहा -
एक बहुत खूबसूरत प्यार में
धकिया दो चिड़िया को

जमीन तक आते-आते हवा के समुद्र में
कितनी लहरें बनीं होंगी...
मुझे उसकी घबराहट मिली
जिसे मैंने बालों में खोंस लिया है
मेरे सुंदर बाल
मैं कभी नहीं हूँगी बौद्ध भिक्षुणी !


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