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कविता संग्रह

अलंकार-दर्पण
धरीक्षण मिश्र

अनुक्रम 32 प्रौढ़ोक्ति (सम्बन्धारतिशयोक्ति) अलंकार पीछे     आगे

लक्षण (दोहा) :-
यदि केहु के उत्कर्ष के कारन झूठ कहात।
अलंकार प्रौढ़ोक्ति तब उहवाँ मानल जात॥
या
कारण उन्नरति के कुछ का जब कुछ से कुछ सम्बrन्धr कहाला।
यद्यपि झूठ रहेला पूरा किन्तुा कविन में जगह दियाला।
उहे झूठ प्रौढ़ोक्ति नाम से अलंकार एगो बनि जाला।
सम्धाूठ तिशयोक्ति नाम भी ओकर एगो और धराला॥
 
उदाहरण (सवैया) :-
चमड़ा हथिया बघवा के ओढ़ें विष भाँग धतूर के पात चबालें।
रखिया चितवा के मलें देहिया में मसान में बैठल ना अगुतालें।
भइलें न तिवारी न सिंह न गुप्तं महानट केवल मानल जालें।
बड़का अति उज्ज रका घर में भइला से बियाह परन्तुल पुजालें॥
संग में सब बा बउके बकलेल आ यज्ञ विध्वंेशक जानल जालें।
बुधिया अबहीं लरिकाहे हवे क्षण में कबे रुष्टक आ तुष्टज देखालें।
बिनु सोचले आन के दे वरदान कबें परि संकट में पछतालें।
बड़का अति उज्जकरका घर में भइला से वियाह परन्तु‍ पुजालें॥
नर मुण्डि के माल गरे अपना पहिरे में कबे तनिको न घिनालें।
प्रति अंग में साँस सजा के सपेरा के भेस बनावत में न लजालें।
भिखिमंगा त ऊ जरिये के हवें अरू नंगा भी एक पुरान कहालें।
बड़का अति उज्जररका घर के भइला से बियाह परन्तुल पुजालें॥
रचना करे के किछु ढ़ंग न जानें विनाश करें में बड़ा अगरालें।
भकसावन भेस भदेश महा देखते सब जीव ले जीव परालें।
ससुरारि से ना टकसे कबहूँ अतएव सथाणु या खुत्थे कहालें।
बड़का अति उज्जटर का घर में भइला से वियाह परन्तु पुजालें॥
 
 
 

 


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