अध्यापक : चलो चलें अब शाम हो रही
बातें हुई बहुत सारी
तुमको पता चली है कितनी
सारी हैं अच्छी प्यारी
बिन्नी : कहा आपने जो कुछ था वह
बिल्कुल बात पते की है
इन पेड़ों ने ज्ञान दिया है
हमसे जो बातें की हैं
प्रदीप : पौधे सारे उगे बाग में
कितनी सारी व्याधि हरें
हम सबको सुख देते ये ही
दुख हमारे दूर करें
सुनीता : ये औषधियाँ घर में रहती
वहाँ रसोई में रहतीं
करती है चुपचाप काम ये
कभी नहीं कुछ भी कहतीं
चंपा : हुआ सार्थक दिन है अपना
सीखी हैं चीजें कितनी
काम बनेगा ढेरों अपना
आज मिलीं हमको इतनी
अध्यापक : बिन्नी चलो, चलो अलका अब
चलो रमा अब देर हुई
हाथ हिलाकर विदा दे रहे
तुलसी, टेसू, छुईमुई
उधर अश्वगंधा हिलती है
नीम, आँवला, बेल, हरे
ये सनाय है, ये गिलोय है
परिजात के फूल झरे
समीर : चाची ने, नानी, दादी ने
पहले गले लगाया था
लेकर इनकी मदद व्याधि को
घर से दूर भगाया था
अजय : हम उपयोग करेंगे इनका
इनसे रोग भगाएँगे
पौधे अपने संगी साथी
फिर मिलने हम आएँगे।