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अमरेंद्र कुमार शर्मा की कविताएँ

 

अमरेंद्र कुमार शर्मा

हिंदीसमयडॉटकॉम पर उपलब्ध

वैचारिकी
'और तब भी खाता और पीता हूँ!'

जन्म

:

1 जनवरी 1975, पटना, बिहार

भाषा : हिंदी
विधाएँ : कविता, आलोचना
प्रमुख कृतियाँ : आपातकाल : हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता

संप्रति

: सहायक प्रोफेसर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
वर्धा 442001 महाराष्ट्र
संपर्क : सहायक प्रोफेसर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
वर्धा 442001 महाराष्ट्र
फोन : 09422905755

ई-मेल

: amrendrakumarsharma@gmail.com

वह आती थी जैसे माँ आती है

 

1.
मैं प्यार में था
मेरा होना प्यार का होना था
वो घास पर बैठी - - - बुन रही थी मेरा होना
उसके बुनने में बेबीलोनियाई साँझ की उलझन थी
उसके उलझन में मेरा होना था - अनिर्वाय

2.
कश्ती के कागज में मेरा होना लिखा था
भूमध्य सागर , लाल सागर और अरब सागर के नीले पानी ने
मेरे होने को और नीला कर दिया था
मैं नीले प्यार में था
वह सुमैं प्यार में था
कावेरी के मुहाने पर मेरा इंतजार था
नील से बहता पानी
मेसोपोतामिया के कागज की कश्ती को
ले आया था कावेरी के मुहाने तक
कश्ती के कागज में मेरा होना लिखा था
भूमध्य सागर, लाल सागर और अरब सागर के नीले पानी ने
मेरे होने को और नीला कर दिया था
मैं नीले प्यार में था
वह सुर्ख थी --- मेरे होने में

3.
मैं प्यार में था
प्यार का देशज रंग मेरे होने में लिपटा था
जिसे ओढ़कर वह आई थी - कच्चे अमरूद की सुगंध की तरह
अमरूद का पौधा - जिसे रोपा था मेरे पुरखों ने
सिंधु घाटी सभ्यता की नामालूम गली में
मेरे प्यार का जातीय विवेक
इन्हीं गलियों के होने से था
और मेरा होना किसी पुरातत्व का हिस्सा नहीं था

4.
मैं प्यार में था
पुरातत्व से भिन्न - काया का उपस्थित प्यार
जो रोज साँझ के सूरज की डूब से और सुर्ख होता था
और रोज भिनसारे की जाग से लगभग चाँदनी
वह आती थी जैसे माँ आती है
जिम्मेदार, अनुशासित और परवाह के हौले लेकिन मजबूत झोंके की तरह
वह सँवारती थी मेरे होने को
मेरे होने में वह उपस्थित थी
मेरा होना प्यार का उपस्थित होना था ---

5.
मैं प्यार में था
आमेजन अपनी बाँह फैलाये
गा रहा था कोई पौराणिक गीत, कोई आदिम राग
गीत में वह अपने होने को सौंप रही थी
उसके सौपने में मेरा बैंगनी प्यार
और अधिक आदिम और अधिक अभिनव हो रहा था
जो धीरे धीरे घुलता हुआ आमेजन के साथ
समाहित हो रहा था अन्तलान्तिक महासागर में
मेरा बैंगनी प्यार अन्तलान्तिक को और अधिक नीला करता हुआ
समूची दुनिया के समुन्दर में फैल रहा था
मेरे बैंगनी प्यार का होना समूची दुनिया के प्यार का होना था

6.
मैं प्यार में था
और मेरे देश की तमाम नदियाँ चाँद में समा रही थीं
चाँद आबाद हो रहा था - मेरे प्यार के गेंदे फूलों से
पीपल ने अपनी छाँव में भरे-पूरे चाँद को समेट लिया था
और ग्रीस से लिथुआनिया
अरब से चीन के रास्तों पर चलने वाले व्यपारी
जो पूरी धरती पर जरूरतों का सामान पहुँचाते थे
पीपल की छाँव में लेटकर अपनी अंजुरी को गेंदे के फूलों से भर लेते
और अपने-अपने देश के पुरखों के किस्से
अपनी धरती के प्यार की अजीमोशान दास्तान सुनाते
चाँद पर प्यार के दास्तानों के पेड़ उग आये थे
दास्तानो में मेरा होना था
चाँद का होना मेरे प्यार का होना था

7.
मैं प्यार में था
आषाढ़ के बाद की साँझ मेरे होने को और गाढ़ा नीला कर रही थी
सितम्बर की किसी तारीख को वह मुझसे मिली
और एक धुली साँझ को अपने गहरे चुम्बन से
उस पूरी साँझ को इस दुनिया की सबसे खूबसूरत साँझ बना दिया
उसके जिस्म के हर हिस्से में वह धुली साँझ रहा करती थी
वह रोज मुझे अपनी साँझ सौंपती
मैं अपनी लंबी साँसों में समेट लेता
हम रोज इस धरती पर अपनी साँझ रचते थे
मई की किसी तारीख को वह मुझसे दूर जा रही थी
उसका जाना इस धरती की साँझ का जाना था
मैं अब भी
रोम के किसी प्राचीन खम्भों में
उसका होना लिख रहा था
उसका होना --- मेरा होना लिख रहा था
एक साँझ लिख रहा था

...कश्ती के कागज में मेरा होना लिखा था
भूमध्य सागर , लाल सागर और अरब सागर के नीले पानी ने
मेरे होने को और नीला कर दिया था
मैं नीले प्यार में था
वह सुर्ख थी ------ मेरे होने में

 



 

 

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